Thursday, 21 December 2017

पंवार राजवंश इतिहास



परमार एक राजवंश का नाम है, जो मध्ययुग के प्रारंभिक काल में महत्वपूर्ण हुआ। चारण कथाओं में इसका उल्लेख राजपूत जाति के एक गोत्र और अग्निकुल के सदस्य के रूप में मिलता है। परमार सिंधुराज के दरबारी कवि पद्मगुप्त परिमल ने अपनी पुस्तक 'नवसाहसांकचरित' में एक कथा का वर्णन किया है। ऋषि वशिष्ठ ने ऋषि विश्वामित्र के विरुद्ध युद्ध में सहायता प्राप्त करने के लिये भाबू पर्वत के अग्निकुंड से एक वीर पुरुष का निर्माण किया। इस वीर पुरुष का नाम परमार रखा गया, जो इस वंश का संस्थापक हुआ और उसी के नाम पर वंश का नाम पड़ा। परमार के अभिलेखों में बाद को भी इस कहानी का पुनरुल्लेख हुआ है। इससे कुछ लोग यों समझने लगे कि परमारों का मूल निवासस्थान आबू पर्वत पर था, 

परमार परिवार की मुख्य शाखा नवीं शताब्दी के प्रारंभिक काल से मालव में धारा को राजधानी बनाकर राज्य करती थी और इसका प्राचीनतम ज्ञात सदस्य उपेंद्र कृष्णराज था। इस वंश के प्रारंभिक शासक दक्षिण के राष्ट्रकूटों के सामंत थे। राष्ट्रकूटों के पतन के बाद सिंपाक द्वितीय के नेतृत्व में यह परिवार स्वतंत्र हो गया। सिपाक द्वितीय का पुत्र वाक्पति मुंज, जो 10वीं शताब्दी के अंतिम चतुर्थांश में हुआ, अपने परिवार की महानता का संस्थापक था।

 उसने केवल अपनी स्थिति ही सुदृढ़ नहीं की वरन्‌ दक्षिण राजपूताना का भी एक भाग जीत लिया, और वहाँ महत्वपूर्ण पदों पर अपने वंश के राजकुमारों को नियुक्त कर दिया। उसका भतीजा भोज, जिसने सन्‌ 5000 से 1055 तक राज्य किया और जो सर्वतोमुखी प्रतिभा का शासक था, मध्युगीन सर्वश्रेष्ठ शासकों में गिना जाता था। भोज ने अपने समय के चौलुभ्य, चंदेल, कालचूरी और चालुक्य इत्यादि सभी शक्तिशाली राज्यों से युद्ध किया। बहुत बड़ी संख्या में विद्वान्‌ इसके दरबार में दयापूर्ण आश्रय पाकर रहते थे। वह स्वयं भी महान्‌ लेखक था, और इसने विभिन्न विषयों पर अनेक पुस्तकें लिखी थीं, ऐसा माना जाता है। उसने अपने राज्य के विभिन्न भागों में बड़ी संख्या में मंदिर बनवाए।

भोज की मृत्यु के पश्चात्‌ चोलुक्य कर्ण और कर्णाटों ने मालव को जीत लिया, किंतु भोज के एक संबंधी उदयादित्य ने शत्रुओं को बुरी तरह पराजित करके अपना प्रभुत्व पुन: स्थापित करने में सफलता प्राप्त की। उदयादित्य ने मध्यप्रदेश के उदयपुर नामक स्थान में नीलकंठ शिव के विशाल मंदिर का निर्माण कराया था। 

उदयादित्य का पुत्र जगद्देव बहुत प्रतिष्ठित सम्राट् था। वह मृत्यु के बहुत काल बाद तक पश्चिमी भारत के लोगों में अपनी गौरवपूर्ण उपलब्धियों के लिय प्रसिद्ध रहा। मालव में परमार वंश के अंत अलाउद्दीन खिलजी द्वारा 1305 ई. में कर दिया गया।

परमार वंश की एक शाखा आबू पर्वत पर चंद्रावती को राजधानी बनाकर, 10वीं शताब्दी के अंत में 13वीं शताब्दी के अंत तक राज्य करती रही। इस वंश की दूसरी शाखा वगद (वर्तमान बाँसवाड़ा) और डूंगरपुर रियासतों में उट्ठतुक बाँसवाड़ा राज्य में वर्त्तमान अर्थुना की राजधानी पर 10वीं शताब्दी के मध्यकाल से 12वीं शताब्दी के मध्यकाल तक शासन करती रही। वंश की दो शाखाएँ और ज्ञात हैं। एक ने जालोर में, दूसरी ने बिनमाल में 10वीं शताब्दी के अंतिम भाग से 12वीं शताब्दी के अंतिम भाग तक राज्य किया।

  •     उपेन्द्र ( 800 – 818)
  •     वैरीसिंह प्रथम ( 818 – 843)
  •     सियक प्रथम ( 843 – 893)
  •     वाकपति ( 893 – 918)
  •     वैरीसिंह द्वितीय ( 918 – 948)
  •     सियक द्वितीय ( 948 – 974)
  •     वाकपतिराज ( 974 – 995)
  •     सिंधुराज ( 995 – 1010)
  •     भोज प्रथम ( 1010 – 1055), समरांगन सूत्रधार' के रचयिता
  •     जयसिंह प्रथम ( 1055 – 1060)
  •     उदयादित्य ( 1060 – 1087)
  •     लक्ष्मणदेव ( 1087 – 1097)
  •     नरवर्मन ( 1097 – 1134)
  •     यशोवर्मन ( 1134 – 1142)
  •     जयवर्मन प्रथम ( 1142 – 1160)
  •     विंध्यवर्मन ( 1160 – 1193)
  •     सुभातवर्मन ( 1193 – 1210)
  •     अर्जुनवर्मन I ( 1210 – 1218)
  •     देवपाल ( 1218 – 1239)
  •     जयतुगीदेव ( 1239 – 1256)
  •     जयवर्मन द्वितीय ( 1256 – 1269)
  •     जयसिंह द्वितीय ( 1269 – 1274)
  •     अर्जुनवर्मन द्वितीय ( 1274 – 1283)
  •     भोज द्वितीय ( 1283 – ?)
  •     महालकदेव ( ? – 1305)
  •     संजीव सिंह परमार (1305 - 1327)


वर्तमान

    • वर्तमान में परमार वंश की एक शाखा उज्जैन के गांव नंदवासला,खाताखेडी तथा नरसिंहगढ एवं इन्दौर के गांव बेंगन्दा में निवास करते हैं।धारविया परमार तलावली में भी निवास करते हैंकालिका माता के भक्त होने के कारण ये परमार कलौता के नाम से भी जाने जाते हैं।धारविया भोजवंश परमार की एक शाखा धार जिल्हे के सरदारपुर तहसील में रहती है। इनके ईष्टदेव श्री हनुमान जी तथा कुलदेवी माँ कालिका(धार)है|ये अपने यहाँ पैदा होने वाले हर लड़के का मुंडन राजस्थान के पाली जिला के बूसी में स्थित श्री हनुमान जी के मंदिर में करते हैं। इनकी तीन शाखा और है;एक बूसी गाँव में,एक मालपुरिया राजस्थान में तथा एक निमच में निवासरत् है।11वी से 17 वी शताब्दी तक पंवारो का प्रदेशान्तर सतपुड़ा और विदर्भ में हुआ । सतपुड़ा क्षेत्र में उन्हें भोयर पंवार कहा जाता है धारा नगर से 15 वी से 17 वी सदी स्थलांतरित हुए पंवारो की करीब 72 (कुल) शाखाए बैतूल छिंदवाडा वर्धा व् अन्य जिलों में निवास करती हैं। जो कि राजा भोज को अपना पूर्वज मानते हैं । संस्कृत शब्द प्रमार से अपभ्रंषित होकर परमार/पंवार/पोवार/पँवार शब्द प्रचलित हुए ।पवार समुदाय, जिसे विभिन्न भौगोलिक क्षेत्रों में पवार, पंवार, भोयर या भोयर पवार जैसे नामों से संबोधित किया जाता है,

वर्तमान पवार गोत्र (उदाहरण):

पंवारो के उपनाम

    • पवार (७२ कुल) :

    1.      गिरहारे/गिरारे

    2.      पराड़कर/ परिहार/

    3.      खरपुसे, (केवल छिंदवाड़ा)

    4.      बड़नगरे/ नागरे/ बन्नागरे

    5.      घाघरे,

    6.      छेरके, शेरके (छिंदवाड़ा)

    7.      कडवे

    8.      पाठे, पाठा / पाठेकर

    9.      डोंगरदिये/ डोंगरे

    10.  धारफोड/ धारपूरे

    11.  चौधरी,

    12.  माटे/माटेकर

    13.  फरकाड़े

    14.  गाडगे

    15.  ढोटे/धोटे

    16.  देशमुख,

    17.  खौसी/खावसी/कौशिक/खवसी/खवसे

    18.  डिगरसे/दिगरसे/ दिग्रसे

    19.  भादे/भादेकर

    20.  बारंगा/ बारंगे

    21.  राऊत,

    22.  काटोले/गघड़े/गद्रे

    23.  दुखी/दूर्वे

    24.  किंकर/किनकर

    25.  रबडे,

    26.  कसाई/कसलीकर,

    27.  मनमाडे/मानमुडे

    28.  सवाई,

    29.  गोरे,

    30.  डाला/डहारे

    31.  उकार/ओमकार

    32.  उघडे,

    33.  करदाते/दाते

    34.  करंजकर/किरंजकर

    35.  कामडी,

    36.  कालभूत/कालभोर,

    37.  कोडले/कोरडे

    38.  हिंगवे /हिंगवा

    39.  खपरिये/ खपरे,

    40.  गाडरे,

    41.  गाकरे/गाखरे

    42.  गोहिते/गोहते

    43.  चिकाने,

    44.  चोपडे,

    45.  टोपलें,

    46.  ढोले,

    47.  ढोबले/ढोबारे

    48.  डंढारे,

    49.  देवासे,

    50.  ढोंडी

    51.  नाडीतोड,

    52.  पठाडे,

    53.  पिंजारे/ पिंजरकर

    54.  बरखाडे,

    55.  बिरगाडे,

    56.  बारबोहरे,

    57.  गोंनदिया

    58.  बैगने,

    59.  बोबडे,

    60.  भोभटकर

    61.  बुवाड़े/बोवाड़े

    62.  ठवरी

    63.  मुने/मुन्ने

    64.  रमधम

    65.  ठुस्सी

    66.  रोडले

    67.  लबाड,

    68.  लाडके,

    69.  लोखंडे,

    70.  सवाई,

    71.  सरोदे

    72.  हजारे

    other

    73.  Bisen (in Chhindwada)




    • कुछ लोग अपने उपनाम की जगह पंवार या पवार भी लगााते है।

    ( पंवारो के यह ७२ उपनाम राजपूत सैनिक सरदारों के नाम/पदनाम/पदवी/संकेतित नाम है )


कुलों की इस संगठित संरचना ने उन्हें नए क्षेत्रों में एक नई सामाजिक और आर्थिक शक्ति के रूप में स्थापित किया।

 इस विरासत के तीन सबसे महत्वपूर्ण स्तंभों को सदैव स्मरण रखें:

  • अग्निवंशी क्षत्रिय गौरव: 2,500 ईसा पूर्व से निरंतर चली आ रही प्राचीन वंशावली।
  • 72 कुलों की एकता: विभिन्न राजपूत शाखाओं का एक संगठित और अटूट महासंघ।
  • अनुकूलन की क्षमता: समय के अनुसार स्वयं को योद्धा से कुशल भूमि स्वामी (जमींदार) के रूप में सफलतापूर्वक परिवर्तित करना।

यह इतिहास केवल बीते हुए कल की कथा नहीं है, बल्कि आपकी पहचान और भविष्य की एकता का आधार है। अपनी जड़ों को जानें, ताकि आप एक मजबूत भविष्य का निर्माण कर सकें।

भोयर समाज के इतिहास, वंशावली, भाषा, संस्कृति एवं सामाजिक दस्तावेजीकरण के लिए समर्पित


About the Authors

Shivani Pawar

Researcher – Bhoyari / Pawari Language, Folk Culture and Satpuda Regional Studies
Co-Editor, Writer & Contributor – Maa Tapti Shodh Sansthan, Multai, Betul & Pawari Shodh Patrika

Shivani Pawar works on the documentation and preservation of the Pawari/Bhoyari language, Pawari folk songs, and oral traditions of the Bhoyar Pawar community. Her research focuses on the cultural heritage of the Satpuda region, including Betul traditions, and the historical connections of Pawar lineage with Malwa and Rajputana.

📧 Email: barkhede.shivani@gmail.com


Rajesh Barange Pawar

Independent Researcher | Bhoyari / Pawari Language Researcher | Pawar Community History | Rajasthan–Malwa–Satpuda Regional Studies
Founder & Director – Maa Tapti Shodh Sansthan, Multai, Betul
Chief Editor – Pawari Shodh Patrika

Rajesh Barange Pawar researches the Bhoyari/Pawari language, Pawar community history, the 72 gotras of the Pawar community, and the cultural traditions of the Satpuda region. His work explores the historical connections between the Pawar (Parmar/Panwar) lineage of Malwa and Rajputana and their migration and settlement in Betul and surrounding Satpuda regions, including traditions associated with Maa Tapti.

🌐 Blog: https://rajeshbarange.blogspot.com/
🌐 Pawari Shodh Patrika: https://sites.google.com/view/pawarishodhpatrika/home
📧 Email: rajeshbarange00@gmail.com


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पवारी शोध पत्रिका
माँ ताप्ती शोध संस्थान, मुलताई


Wednesday, 20 December 2017

कहानी राजा भोज

#मूर्ख #के #लक्षण
. कहानी राजा भोज की
राजाभोज की रानी और पंडित माघ की पत्नी दोनों खड़ी-खड़ी बातें कर रही थीं। राजा भोज ने उनके नजदीक जाकर उनकी बातें सुनने के लिए अपने कान लगा दिए। यह देख माघ की पत्नी सहसा बोली- 'आओ मूर्ख! राजा भोज तत्काल वहां से चला गया। हालांकि उसके मन में रोष तो नहीं था, तथापि स्वयं के अज्ञान पर उसे तरस अवश्य आ रहा था। वह जानना चाहता था कि मैंने क्या मूर्खता की है।
राजसभा का समय हुआ। दंडी, भारवि आदि बड़े-बड़े पंडित आए राजा ने हर-एक के लिए कहा-'आओ मूर्ख! पंडित राजा की बात सुनकर हैरान हो गए, पर पूछने का साहस किसी ने नहीं किया। अंत में पंडित माघ आए। राजा ने वही बात दोहराते हुए कहा-'आओ मूर्ख! यह सुनते ही माघ बोले-
खादन्न गच्छामि हसन्न जल्पे,
गतं न शोचामि कृतं न मन्ये।
द्वाभ्यां तृतीयो न भवामि राजन्!
किं कारणं भोज! भवामि मूर्ख:।।
हे राजन्! मैं खाता हुआ नहीं चलता, हँसता हुआ नहीं बोलता, बीती बात की चिंता नहीं करता, कृतघ्न नहीं बनता और जहाँ दो व्यक्ति बात करते हों, उनके बीच में नहीं जाता। फिर मुझे मूर्ख कहने का क्या कारण है?
राजा ने अपनी मूर्खता का रहस्य समझ लिया। अब वह तत्काल बोल उठा- 'आओ विद्वान्!
इस घटना से हम समझ सकते हैं कि केवल शिक्षण या अध्ययन से विद्वत्ता नहीं आती। विद्वत्ता आती है- नैतिक मूल्यों को आत्मगत करने से। वे पुराने मूल्य, जो अच्छे हैं, खोने नहीं चाहिए। नए और पुराने मूल्यों में सामंजस्य होने से ही शिक्षा के साथ नैतिकता पनप सकेगी।
#साभार

राजा भोज

लेखक : सचिन सिंह गौड़, संपादक, "सिंह गर्जना" हिंदी पत्रिका
राजा भोज (Raja Bhoj) जो अपने समय के भारतवर्ष के सर्वश्रेष्ठ सम्राट थे, विलक्षण योद्धा थे, अद्भुत पराक्रमी तथा कुशल प्रशासक थे। जिनका शासन लगभग पूरे भारतवर्ष पर था। राजा भोज की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि उनकी तुलना सम्राट विक्रमादित्य से होती है। राजा भोज एक ऐसे ऐतिहासिक सम्राट हैं जो अपने अद्भुत कृत्यों के कारण ऐतिहासिक होते हुए भी पौराणिक हो गये। क्योंकि साधारण जनमानस के लिये राजा भोज अपने कार्यों, अपने शौर्य अपने प्रभाव के कारण देवता तुल्य हो जाते हैं और उनके साथ अनेक किंवदंतियां भी जुड़ जाती हैं।
भारतीय इतिहास में राजा भोज आज भी सर्वाधिक लोकप्रिय राजा और लोकनायक के रूप में जन-जन में विख्यात हैं। हिन्दी भाषी क्षेत्र में इस कहावत से सभी परिचित हैं कि कहां राजाभोज और कहां गंगूतेली। दसवीं सदी के अंतिम दशक में जन्में राजा भोज ने 1010 ईस्वी से 1055 ईस्वी तक मध्य भारत में राज्य किया। उनकी राजधानी धारा (Dhar, MP) नगरी, जिसे वर्तमान में धार कहा जाता है, थी और उनका राज्य गुजरात तथा मध्यप्रांत के क्षेत्रों में फैला हुआ था।
प्रसिद्ध संस्कृत विद्वान डॉ. रेवा प्रसाद द्विवेदी ने प्राचीन संस्कृत साहित्य पर शोध के दौरान मलयाली भाषा में भोज की रचनाओं की खोज करने के बाद यह माना है, कि राजा भोज का शासन सुदूर केरल के समुद्र तट तक था। राजा भोज ने मध्यप्रदेश की वर्तमान राजधानी भोपाल नगर की स्थापना की थी। लोक विश्वास है कि भोपाल का नाम भोजकाल में भोजपाल था। राजा भोज ने ही भोपाल में विस्तृत और विशाल प्राकृतिक झील को बांधकर तालाब का रूप दिया था, जो आज भी कायम है। राजाभोज द्वारा निर्मित शिवमंदिर, भोपाल के निकट भोजपुर में आज भी अपने विगत वैभव की याद दिलाता है। समस्त भारत के ओज और गौरव का प्रतिबिम्ब हैं राजा भोज। ये महानायक भारत कि संस्कृति में, साहित्य में, लोक-जीवन में, भाषा में और जीवन के प्रत्येक अंग और रंग में विद्यमान है। ये वास्तुविद्या और भोजपुरी भाषा और संस्कृति के जनक है।
‘‘राजा भोज’’ पुस्तक के लेखक एवं राजा भोज पर गहन शोध और अध्ययन कर चुके डॉ. भगवती लाल राजपुरोहित के अनुसार ‘‘भारतीय राजाओं में परमार राजा भोज अद्धितीय है। उनकी राजधानी धारानगरी (धार) होने से घारेश्वर और राज्य का केन्द्र मालवा होने से मालवाधीश भी कहलाते थे। वे परम विद्धान, परम शक्तिशाली और सुयोग्य तथा लोकप्रिय राजा के रूप में अपने समय ही विख्यात हो गये थे। उनके ताम्रपत्र, शिलालेख तथा मुर्तिलेख प्राप्त होते है। अपने असामान्य कर्मो के कारण राजा भोज अपने युग में ही कथा कहानियां के नायक के रूप में प्रसिद्ध होने लगे थे। बाद में तो महाराज विक्रमादित्य के समान महाराज भोज भी भारत के ऐसे लोकनायक के रूप में मान्य हो गये कि उनकी कहानियाँ न केवल भारतीय जनता में, लोक में प्रसिद्ध हो गयी थी अपितु लंका, नेपाल, तिब्बत, मंगोलिया सहित कई देशो में भी फैल गयी थी। मंगोली भाषा मे ‘अराजि बुजि’ पुस्तक राजा भोज सम्बन्धी है। राजा भोज की ‘चाणक्यमाणिक्य’ पुस्तक का एक तिब्बती रूप भी प्राप्त होता है। राजा भोज इतिहास पुरुष होते हुए भी मिथक पुरुष हो गये। उन्होंने अंतर्राष्ट्रीय ख्याति प्राप्त की। वे अपने अपने युग के मित्र राजाओं के समान शत्रु राजाओं के भी अपने विविध वर्णी उदात्त गुणों के कारण आदर्श बन गये थे। यही नहीं सदियों तक परवर्ती अनेक राजा भी स्वयं को लघु भोजराज, अपर भोजराज, नव भोजराज आदि कहने में गौरव का अनुभव करते रहे है। राजा भोज के अभिलेख 1010 से 1034 ई. तक प्राप्त होते है।’’
राजा भोज की आयु
एक परम्परा कहती है कि राजा भोज की आयु 90 वर्ष रही। 1055 में से 90 कम होने पर 965 ई. भोज का जन्म सन प्रतीत होता है। अन्य परम्परा कहती है कि राजा भोज ने 55 वर्ष 7 मास 3 दिन तक राज्य किया। इससे प्रतीत होता है कि 999 ई. में राजा भोज ने राजसिंघासन ग्रहण किया था। और उस समय वे 34 वर्ष 4 मास 27 दिन के हो चुके थे। इस समय तक जिसका 1010 ई. का मोडासा (गुजरात) ताम्रपत्र प्राप्त होते है। दूसरे पुत्र देवराज का किराडू लेक 1002 ई. का प्राप्त होते है। यह राजस्थान के कुछ भाग (भिनमालादि) का राज्यपाल था। इनकी एक बेटी राजमती थी। इसका साँभर के राजा बीसलदेव से विवाह हुआ था। एक भीली लोक कथा के अनुसार राजा भोज के एक पुत्र का नाम वीरसिंघ था। एक जैन ग्रन्थ के अनुसार 1077 (1020ई.) में राजा भोज के पुत्र वीरनारायण ने सेवाणा बसाया। राजा भोज की एक उपाधि त्रिभुवननारायण थी। अतः उनके पुत्र का नाम वीरनारायण होना असंभव नहीं है। इस वीरनारायण को ही भीली कथा में वीरसिंघ कहा गया अथवा ये दोनों मित्र थे- यह प्रमाणाभाव में नहीं कहा जा सकता।
राजा भोज की यों तो सौ पत्नियों का उल्लेख प्राप्त होता है। परन्तु गुणमंजरी, सौभाग्यसुन्दरी, सत्यवती, मदनमंजरी, भानुमति, लीलावती, सुभद्रा आदि रानियों के नाम प्राप्त होते है। इनमें से लीलावती पटरानी बतायी गयी है। जिस प्रकार सम्भवतः अपात्र होने से मुंज ने अपने पुत्रांे को परमारों के मालवा की केन्द्रीय सत्ता नहीं सौपी थी और न भोज के अग्रज को सौंपी, बल्कि सर्वाधिक योग्य होने से भोजदेव को ही राजा बनाया था, यहाँ तक कि उसने अपने अनुज सिन्धुल को भी सत्ता नही सौंपी, उसी प्रकार सम्भवतः पात्रता के आधार पर ही राजा भोज ने अपने किसी भाई-बन्धु या पुत्र को सत्ता न सौंपते हुए पौत्र जयसिंघ को मालवा का अपना उत्तराधिकारी बनाया था।
राजा भोज के पराक्रम को भारतीय जनसाधारण ने जो स्वीकृति दी है। उसका ही परिणाम यह सर्वज्ञात और लोकप्रिय कहावत है ‘कहाँ राजा भोज और कहाँ गंगू तेली (या गांगी तेलन)।’ इस कहावत के द्वारा जनता ने तत्कालीन परम प्रतापी गांगेयदेव और तेलन को एक साथ भोज ने पराजित कर दिया था-इस बात को सदा के लिए जनमन में स्थापित कर दिया। इससे राजा भोज की शक्ति की धाक सब मानने लगे थे। यही कारण है कि यह कहावत भारत की विभिन्न भाषाआंे और बोलियांे में सुप्रचलित और सर्वमान्य है।
राजा भोज की विजय और साम्राज्य
राजा भोज ने चेदि के कलचुरि राजा गांगेयदेव, कर्णाटक के चालुक्य राजा तैलप द्धितीय, आदि-नगर के राजा इन्द्ररथ, लाट के भीमदेव, कान्यकुब्ज के गुर्जर प्रतिहार राजा राज्यपाल, तुरुष्क (तर्क) राजा, शालम्भरी के चैहान राजा वीर्यराम, डुबकुण्ड के राजा अभिमन्यु, विदर्भ के राजा भिल्ल्स (तृतीय) सहित विभित्र राजाओं को पराजित करके अपनी राजशक्ति और राज्यसीमा में पर्याप्त वृद्धि कर ली थी। राजा भोज के बहुमुखी सामथ्र्य के कारण सैकड़ों राजा यशस्वी भोज को अपना राजाधिराज मानते थे। राजा भोज की कृपा अर्जित करने के लिए तथा उनसे सन्धि करने के लिए कन्योपायन आदि के लिए विभिन्न राजा आतुर रहते थे। परिणामः राजा भोज के राज्यक्षेत्र औए प्रभावक्षेत्र में प्रायः पूरा भारत बताया जाता रहा। प्रबन्धचिन्तामणि के अनुसार चोल, आन्ध्र, कर्णाटक, गुर्जर, चोदी, कान्यकुब्ज (कन्नौज का राजा) सहित विभिन्न राजा लोग राजा भोज के प्रभाव क्षेत्र में थे और वे सदा उसका भयभरा आदर करते थे।
पारम्परिक साहित्य में राजा भोज के राज्यक्षेत्र बताने वाले कई श्लोक है जिनकी पुष्टि शिलालेखों से भी होती है। ऐसे ही एक पूर्वाक्त श्लोक से ज्ञात होता है कि राजा भोज ने 55 वर्ष 7 माह और 3 दिन तक राज्य शासन किया।
राजा भोज ने गौड़ सहित दक्षिणापथ पर राज्य किया। उदरपुर प्रशासित नामक प्रसिद्ध शिलालेख में कहा गया है कि कैलास पर्वत (तिब्बत) से मलयगिरि (केरल) तक तथा पूर्व में उदयांचल से पश्चिम में अस्तांचल तक व्याप्त पुरे भारत की पृथ्वी पर राजा पृथु के समान राजा भोज ने शासन किया। राजा भोज के ग्रंथो से भी ज्ञात होता है कि उनके सामन्तों की संख्या सैकड़ों में थी। राजा भोज राजाओं के भी राजा थे।
राजा भोज का जीवन क्रम
965 ई. में राजा भोज का जन्म।
973 ई. में आठ वर्ष की अवस्था में युवराज (राजा?)बनना।
1015-1019 राजा भोज का चालुक्य जयसिंघ से युद्ध।
1019 कोंकण पर अधिकार।
1025 सोमनाथ पर महमूद का आक्रमण।
1030 भोज और भीम द्दारा सोमनाथ मंदिर का पुर्ननिर्माण।
1030 भोज के राज्यकाल में अल्बरुनी का धार आना।
1035 भोज की त्रिपुरी पर विजय।
1036 भोज की कन्नौज पर विजय।
1042 कल्याणी के चालुक्य जयसिंघ को पराजित कर मार देना।

भोयरी पंवारी कविता

*भोयरी पवारी कविता*
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डोरा भर भर जाय, बेटी सासू धर जाय
मायकिसनीकोमन, आज को सीबील भाहे।।
दादा एक टक देखय, मोती टप टप फेकय
जसी नद्दी कुई कुल,अपना नी देखय।।
भैया मन मन सोचय, बहिन अंगना ह्य छोडय
राखी कोन कलाई, बांधेनी अब जाय।।
काका सोच रहा है,मन ख़े कोस रह्या ह्य
कोन र किलकारी मारहे, सुना बाबुल का गांव।।
रचियता, गोपीनाथ कालभोर रोंढा बैतूल
______________________________
*संशोधन आमंत्रित***
आज की नयी पीढ़ी और पढ़ो लिखो लोगो को ये शायद महत्वपूर्ण न लगे पँर हम इन्हें सहेज कर रखने में लगे है आपके सहयोग की आशा है।
*ऐसी कुछ ही वंश / जाति है जिनकी खुद की अपनी बोली, संस्कृति है।*
आओ इसे पवार जनमानस की भाषा बनाये। पवारी भोयरी को बढ़ाये

Monday, 6 November 2017

Powari

 Bhoyari

Primary tabs



A language of India

Alternate Names
Pwari
Population
426,000 (2001 census). Ethnic population: 2,000,000 (1986 All India Powar Council).
Location
Madhya Pradesh state: Balaghat, Betul, Chindwara, and Seoni districts; Maharashtra state: Bhandara, Gondia, and Wardha districts.
Language Maps
Language Status
6b (Threatened).
Dialects
Bhoyar Powari (Bhomiyari, Bhoyari, Bhoyaroo, Bhuiyar, Bhuria, Bohoyeri), Vyneganga Powari, Govari of Seoni, Khalari, Koshti, Kumbhari, Lodhi, Marari. Reported intelligibility between Bhoyar and Vyneganga. Balaghat District dialect considered central among Bhoyar and Vyneganga varieties. Lexical similarity: 60%–87% among dialects; 80%–83% with Koshti, Kumbhari, and Khalari sub-groups; 49%–65% with Bagheli [bfy], 46%–64% with Bundeli [bns].
Language Use
Powari use is decreasing in the Bhoyar and Vyneganga dialect areas. Half the children learn Hindi or Marathi [mar] first. Home. Neutral attitudes. Also use Hindi [hin], Marathi [mar].
Language Development
Literacy rate in L2: 72% for Powari-speaking districts (2001 census).
Writing
Unwritten [Qaax].
Other Comments
Younger generation is getting education. Hindu.



Source https://www.ethnologue.com/language/pwr





Maharashtra Government Gazetteer of Bhandara District says :

Maharashtra Government Gazetteer of Bhandara District says : 

" Ponvars.—The Ponvars originally belonged to Malva. The Ponvar dynasty ruled in Malva from the 9th to the 18th Century. In the twelfth Century Nagpur was included in the Malva kingdom and the first settlement of the Ponvars may probably be attributed to this period. They themselves say that they originally came to Nagardhan near Ramtek and then spread over the surrounding country. Some of the most influential members of the caste accompanied Chimnaji Bhosle on his Cuttack expedition and on their return were rewarded with grants of land in Lanji and other tracts to the west of the Wainganga river which were largely covered with forests "

This is the reason of Ponwar being Patels, Malgujars and Jamindars of Wainganga Valley area .

Saturday, 8 July 2017

कहानी रफ़ कॉपी की📔

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👥जब हम पढ़ते थे तो हर subject की कॉपी अलग थी।
लेकिन एक ऐसी कॉपी📖 थी जो हर subject को संभालती थी।
उसे हम कहते थे "रफ़ कॉपी"📔

यूँ तो रफ़ कॉपी📔 का मतलब खुरदुरा होता है।
लेकिन ये हमारे लिए बहुत ही मुलायम थी..

क्योकि...
1) उसके कवर पर हमारा कोई पसंदीदा चित्र होता था।😛😛
2) उसके पहले पन्ने पर डिजाइन में लिखा हुआ हमारा नाम।😊😊
3) शानदार राइटिंग में लिखा हुआ पहला पेज।😁😁
4) बीच में लिखते तो हिंदी थे पर लगता था जैसे कई भाषाओं का मिश्रण हो।😜😜
5) अपना लिखा खुद नही समझ पाते थे।😂😂

रफ़ कॉपी📔 में हमारी बहुत सी यादें छुपी होती थी🙇
वो अनकहा प्रेम...💑
वो अंजाना सा गुस्सा ...😲
बेमतलब के दर्द...🙁
कुछ उदासी🙇 छुपी होती थी...

हमारे रफ़ कॉपी📔 में कुछ ऐसे code words लिखते थे✍
जो सिर्फ और सिर्फ हम ही समझ सकते थे😂😂

उसके आखिरी पन्नों पर वो राजा, मंत्री, चोर, सिपाही का स्कोर बोर्ड📋
वो दिल💞छू जाने वाली शायरी।
कुछ ऐसे नाम जिन्हें हम मिटने की सोच🤔 भी नहीं सकते थे।

मतलब हमारे बैग🎒में कुछ हो न हो रफ़ कॉपी जरूर रहती थी।

लेकिन अब वो दिन काफी दूर चले गए😥
रफ़ कॉपी📔 हमसे दूर चली गयी😥

शायद पड़ी होगी घर🏠के किसी कोने में...
मेरी यादों को छुपाये हुए..🙁
सबकी नज़रों👀 से बचाये हुए..😥

न जाने कहाँ होंगे वो दोस्त👥
न जाने कहाँ होंगी वो यादें🙁

🤔सोचता हूँ...
जब चार दिन बचेंगे ज़िन्दगी के😓
तब खोलूंगा वो रफ़ कॉपी📔
"देखूंगा चश्मे👓 में छिपे आँखों  से😰"
"पलटूंगा कपकपाती हाथों से😓"
"पढूंगा थरथराती होठों से🙁

क्योंकि अभी तो...
"जो 👀नज़रों-नज़रों👀 से होती थी, वो अल्फ़ाज़ अधूरी है"
"जो दोस्तों 👬 के साथ बिताए, वो याद अधूरी है"
"👲बचपन में जैसे जीता था, वो अंदाज अधूरी है"
"अभी उस रफ़ कॉपी 📔में कई code words, कई सवाल हैं यारों..
जिनकी अभी हिसाब 📝 अधूरी है।"🙇
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अगर आपको भी याद है वो बचपन तो शेयर जरूर करें📲...

Thursday, 6 July 2017

Surnames In Pawar Community Bhoyar Pawar बैतूल छिंदवाड़ा वर्धा पवार गोत्र





Surnames In Pawar (bhoyar) Community 72 gotra

उपरोक्त जानकारी बैतूल छिंदवाड़ा वर्धा पवार (भोयर पवार ) के बारे में दी गयी है 


क्षत्रिय पवार , जिसे पंवार, पवार या भोयर-पवार भी कहा जाता है, एक राजपुत वंश की शाखा है। हिंदू और वैदिक वर्ण व्यवस्था के अनुसार, वे क्षत्रिय वर्ण से हैं [1] [2]। भोयर-पवार मालवा के पंवार राजपूतों के वंशज होने का दावा करते हैं [3] [4]

१५वी से १७वी शताब्दी के बीच, पंवारो की ७२ कुल शाखा का प्रदेशांतर मालवा से होते हुए सतपुड़ा और विदर्भ के क्षेत्रों में हुआ। वे वर्तमान में मुख्य रूप से मध्य भारत के बैतूल, छिंदवाड़ा और वर्धा क्षेत्रों में केंद्रित हैं।

बैतूल, छिंदवाड़ा और वर्धा के क्षेत्रों को स्थानीय रूप से भोयर-पट्टी कहा जाता है, इसलिए यहां रहने वाले पवारों को भोयर-पवार के नाम से जाना जाता है[5]। यह पवार आज भी राजपूताना की मालवी बोली का भ्रष्ट रूप बोलते हैं, जिसे उनके नाम पर भोयरी कहा जाता है [6]

पंवारो के उपनाम

  • पवार (७२ कुल) :

1.      गिरहारे/गिरारे

2.      पराड़कर/ परिहार/

3.      खरपुसे, (केवल छिंदवाड़ा)

4.      बड़नगरे/ नागरे/ बन्नागरे

5.      घाघरे,

6.      छेरके, शेरके (छिंदवाड़ा)

7.      कडवे

8.      पाठे, पाठा / पाठेकर

9.      डोंगरदिये/ डोंगरे

10.  धारफोड/ धारपूरे

11.  चौधरी,

12.  माटे/माटेकर

13.  फरकाड़े

14.  गाडगे

15.  ढोटे/धोटे

16.  देशमुख,

17.  खौसी/खावसी/कौशिक/खवसी/खवसे

18.  डिगरसे/दिगरसे/ दिग्रसे

19.  भादे/भादेकर

20.  बारंगा/ बारंगे

21.  राऊत,

22.  काटोले/गघड़े/गद्रे

23.  दुखी/दूर्वे

24.  किंकर/किनकर

25.  रबडे,

26.  कसाई/कसलीकर,

27.  मनमाडे/मानमुडे

28.  सवाई,

29.  गोरे,

30.  डाला/डहारे

31.  उकार/ओमकार

32.  उघडे,

33.  करदाते/दाते

34.  करंजकर/किरंजकर

35.  कामडी,

36.  कालभूत/कालभोर,

37.  कोडले/कोरडे

38.  हिंगवे /हिंगवा

39.  खपरिये/ खपरे,

40.  गाडरे,

41.  गाकरे/गाखरे

42.  गोहिते/गोहते

43.  चिकाने,

44.  चोपडे,

45.  टोपलें,

46.  ढोले,

47.  ढोबले/ढोबारे

48.  डंढारे,

49.  देवासे,

50.  ढोंडी

51.  नाडीतोड,

52.  पठाडे,

53.  पिंजारे/ पिंजरकर

54.  बरखाडे,

55.  बिरगाडे,

56.  बारबोहरे,

57.  गोंनदिया

58.  बैगने,

59.  बोबडे,

60.  भोभटकर

61.  बुवाड़े/बोवाड़े

62.  ठवरी

63.  मुने/मुन्ने

64.  रमधम

65.  ठुस्सी

66.  रोडले

67.  लबाड,

68.  लाडके,

69.  लोखंडे,

70.  सवाई,

71.  सरोदे

72.  हजारे

other

73.  Bisen (in Chhindwada)




  • कुछ लोग अपने उपनाम की जगह पंवार या पवार भी लगााते है।

( पंवारो के यह ७२ उपनाम राजपूत सैनिक सरदारों के नाम/पदनाम/पदवी/संकेतित नाम है )