भोयरी (पवारी) बोली: एक भाषाई एवं सांस्कृतिक अनुशीलन
निवास स्थान: देवरी, मुलताई
संस्था से संबद्धता: माँ ताप्ती शोध संस्थान, मुलताई
(An Anthropological and Linguistic Study)
प्रस्तावना (Introduction)
भाषा केवल संवाद का माध्यम नहीं होती, बल्कि वह किसी समुदाय के ऐतिहासिक प्रवास, भौगोलिक परिस्थितियों और सामाजिक संरचना का एक प्रकार का पुरातात्विक प्रमाण (Archaeological Evidence) होती है। मध्य भारत के सतपुड़ा अंचल में निवासरत भोयर पवार समुदाय की मातृभाषा ‘भोयरी’—जिसे पवारी भी कहा जाता है—इस तथ्य का एक सजीव उदाहरण प्रस्तुत करती है।
भाषावैज्ञानिक दृष्टिकोण से भोयरी को एक सेतु बोली (Bridge Dialect) के रूप में देखा जा सकता है, जो पश्चिमी भारत की राजस्थानी भाषिक परंपरा और मध्य भारत की मराठी एवं हिंदी भाषाओं के बीच एक सांस्कृतिक एवं भाषाई पुल का निर्माण करती है। यह बोली न केवल शब्द-संपदा के स्तर पर, बल्कि ध्वन्यात्मक संरचना, क्रिया-रूपों और सामाजिक प्रयोगों में भी इस संक्रमणशील स्वरूप को स्पष्ट रूप से प्रदर्शित करती है।
प्रस्तुत आलेख का उद्देश्य ‘चनुक-झुनुक’ (पवारी शब्दकोश) तथा ऐतिहासिक तथ्यों के आधार पर भोयरी बोली की भाषिक संरचना, शब्दावली, व्युत्पत्ति और सामाजिक-सांस्कृतिक महत्व का एक गंभीर एवं शोधपरक विश्लेषण प्रस्तुत करना है।
1. ऐतिहासिक पृष्ठभूमि एवं प्रवास का सिद्धांत
(Historical Background & Migration Theory)
भोयरी बोली के उद्भव और विकास को समझने के लिए पंवार वंश के ऐतिहासिक प्रवासन (Migration) को समझना अनिवार्य है। उपलब्ध ऐतिहासिक और भाषाई शोध यह संकेत देते हैं कि भोयर पवार समुदाय का मूल स्थान धार और मालवा क्षेत्र रहा है, जिसे परमार शासक राजा भोज का केंद्र भी माना जाता है।
मध्य उत्तर और मध्य भारत में हुए राजनीतिक संघर्षों, सत्ता परिवर्तन और अस्थिरता के कारण यह समुदाय मालवा क्षेत्र से विस्थापित होकर धीरे-धीरे सतपुड़ा की घाटियों—बैतूल, छिंदवाड़ा, सिवनी और वर्धा—की ओर अग्रसर हुआ। इस दीर्घकालिक प्रवास ने न केवल समुदाय की सामाजिक संरचना को प्रभावित किया, बल्कि उसकी भाषा को भी नए भाषिक परिवेश में ढाल दिया।
भाषाई रूपांतरण
जब यह समुदाय मालवा क्षेत्र में निवासरत था, तब उनकी भाषा पर मालवी और निमाड़ी बोलियों का गहरा प्रभाव था। जैसे-जैसे यह समुदाय दक्षिण की ओर बढ़ा और विदर्भ (महाराष्ट्र) की सीमाओं पर आकर बसा, वैसे-वैसे उनकी बोली में मराठी शब्दावली, ध्वनियाँ और वाक्य संरचनाएँ सम्मिलित होती चली गईं।
निष्कर्ष
इस प्रकार वर्तमान भोयरी बोली संस्कृत-निष्ठ हिंदी, राजस्थानी (विशेषतः मालवी/मारवाड़ी) और मराठी भाषिक परंपराओं का एक अनूठा त्रिवेणी संगम प्रतीत होती है।
2. भौगोलिक विस्तार एवं भाषाई वर्गीकरण
(Geographical Spread & Classification)
भोयरी बोली का प्रयोग मुख्यतः मध्य प्रदेश और महाराष्ट्र के सीमावर्ती जिलों में किया जाता है। भाषाविज्ञान की दृष्टि से इसे इंडो-आर्यन भाषा परिवार की मध्य भारतीय बोलियों के समूह में रखा जा सकता है।
प्रमुख क्षेत्र
भोयरी बोली का सक्रिय प्रयोग बैतूल, छिंदवाड़ा, पांढुर्णा (मध्य प्रदेश) तथा वर्धा, नागपुर और अमरावती (महाराष्ट्र) जिलों में पाया जाता है।
उच्चारण शैली (Phonology)
इस बोली में ‘ण’ और ‘ळ’ ध्वनियों का प्रचुर प्रयोग देखने को मिलता है—जैसे ‘न’ के स्थान पर ‘ण’ तथा ‘ल’ के स्थान पर ‘ळ’—जो मराठी और राजस्थानी दोनों भाषाओं की साझा विशेषता है। इसके अतिरिक्त क्रियाओं के अंत में ‘नूं’ या ‘ना’ का प्रयोग (जैसे—जानूं, करनूं) गुजराती और राजस्थानी भाषिक प्रभाव की ओर संकेत करता है।
3. शब्द-संपदा एवं व्युत्पत्ति विश्लेषण
(Lexical Analysis & Etymology)
वल्लभ डोंगरे द्वारा संकलित ‘चनुक-झुनुक’ शब्दकोश के विश्लेषण से यह स्पष्ट होता है कि भोयरी शब्दावली को तीन प्रमुख श्रेणियों में विभाजित किया जा सकता है—
(क) कृषि एवं पर्यावरण (Agrarian Vocabulary)
चूंकि भोयर पवार समुदाय मूलतः एक कृषक समाज रहा है, इसलिए उनकी भाषा में कृषि और पर्यावरण से संबंधित शब्द अत्यंत समृद्ध और विशिष्ट हैं—
बक्खर (Bakkhar): खेत जोतने का उपकरण; मालवी प्रभाव स्पष्ट।
दावन (Daavan): बैलों द्वारा फसल की मड़ाई की प्रक्रिया।
रास (Raas): अनाज का ढेर।
पनोची (Panochi): मटकों को रखने का लकड़ी का स्टैंड; यह शब्द नितांत स्थानीय और मौलिक (Indigenous) प्रतीत होता है।
(ख) पारिवारिक संरचना (Kinship Terms)
भोयरी बोली में रिश्तों के नामकरण में एक विशिष्ट सामाजिक मनोविज्ञान (Social Psychology) परिलक्षित होता है—
लोग–लोगनी (Log–Logni): पति-पत्नी के लिए प्रयुक्त शब्द। यहाँ ‘लोग’ का अर्थ केवल व्यक्ति नहीं, बल्कि ‘समूह’ या ‘समाज’ बन जाता है, जो यह दर्शाता है कि विवाह के बाद व्यक्ति ‘मैं’ से ‘हम’ में रूपांतरित हो जाता है।
(ग) अमूर्त अवधारणाएँ (Abstract Concepts)
सुखवाड़ा (Sukhwada): इसका अर्थ केवल ‘समाचार’ नहीं, बल्कि ‘सुख का वाड़ा’ अर्थात ऐसा संदेश जिसमें केवल मंगलकामनाएँ निहित हों।
लुहयड़ी (Luhyadi): यह पंजाबी शब्द ‘लोहड़ी’ (अग्नि-पूजन) का सजातीय (Cognate) प्रतीत होता है। भोयरी में इसका अर्थ अलाव या जलती लकड़ी है, जो व्यापक भाषाई संपर्क और सांस्कृतिक आदान-प्रदान को दर्शाता है।
4. लोकोक्तियाँ और सामाजिक दर्शन
(Idioms & Socio-Cultural Philosophy)
किसी भी बोली की वास्तविक समृद्धि उसकी लोकोक्तियों और मुहावरों में निहित होती है। भोयरी लोकोक्तियाँ समाज के व्यावहारिक ज्ञान और जीवन-दर्शन को प्रतिबिंबित करती हैं—
“नद्दी कोदी जानूं”
विश्लेषण: शाब्दिक अर्थ ‘नदी की ओर जाना’ है, किंतु लाक्षणिक अर्थ ‘शौच के लिए जाना’ होता है। यह मुहावरा उस ऐतिहासिक काल का द्योतक है जब मानव जीवन जल स्रोतों के निकट केंद्रित था और स्वच्छता की अवधारणा प्रकृति से जुड़ी हुई थी।
“तीन ताल, चौदा भुवान”
विश्लेषण: यह लोकोक्ति अत्यधिक परिश्रम, व्यापक संघर्ष और ब्रह्मांडीय प्रयास की भावना को अभिव्यक्त करती है।
5. सांस्कृतिक पर्व और उनका भाषाई महत्व
भोयरी बोली में पर्व-त्योहारों के नामकरण के पीछे गहरा अर्थशास्त्र और धर्मशास्त्र निहित है—
पोला और कर (Pola & Kar): ‘पोला’ बैलों का पर्व है, जो कृषि-प्रधान अर्थव्यवस्था का प्रतीक है। इसके अगले दिन मनाया जाने वाला ‘कर’ (जुआ खेलना) केवल मनोरंजन नहीं, बल्कि नियतिवाद (Fatalism) और कर्म-सिद्धांत का व्यावहारिक प्रशिक्षण है—जिसमें जीवन की हार-जीत को खेल भावना से स्वीकार करना सिखाया जाता है।
अखाड़ी और अखेजी: यह ‘अक्षय तृतीया’ का अपभ्रंश है, जिसे कृषि वर्ष के शुभारंभ के रूप में देखा जाता है।
6. निष्कर्ष (Conclusion)
समग्र विश्लेषण के आधार पर यह कहा जा सकता है कि भोयरी (पवारी) केवल एक बोली नहीं, बल्कि एक जीवंत ऐतिहासिक दस्तावेज है। इसमें मालवा के परमारों का शौर्य, निमाड़ का अल्हड़पन और महाराष्ट्र की सामाजिक व्यवस्था का सामंजस्यपूर्ण समावेश दिखाई देता है।
वैश्वीकरण के वर्तमान दौर में, जब अनेक छोटी बोलियाँ विलुप्ति के कगार पर हैं, ‘चनुक-झुनुक’ जैसे शब्दकोशों का निर्माण और भोयरी बोली का संरक्षण केवल भोयर समाज के लिए ही नहीं, बल्कि भारतीय भाषाविज्ञान के लिए भी अत्यंत आवश्यक है। यह बोली प्रमाणित करती है कि संस्कृति स्थिर नहीं होती, बल्कि नदी की भाँति प्रवाहमान रहती है—जो अपने मार्ग में आने वाले प्रत्येक क्षेत्र के रंगों और शब्दों को आत्मसात करती चलती है।
शोध संदर्भ
चनुक-झुनुक (पवारी शब्दकोश) — वल्लभ डोंगरे, सतपुड़ा संस्कृति संस्थान, भोपाल।
मध्य भारत की जनजातीय एवं जातीय बोलियों का तुलनात्मक अध्ययन।
भोयरी बोली, पवारी भाषा, Bhoyari language, Pawari language, भोयर पवार समुदाय, Bhoyar Pawar community, पवारी लोकभाषा, मध्य भारत की बोलियाँ, भोयरी पवारी भाषा का इतिहास, पवारी बोली का भाषावैज्ञानिक अध्ययन, Bhoyari Pawari linguistic study, भोयरी भाषा और संस्कृति, पवारी लोकसंस्कृति, भोयरी शब्दावली, पवारी शब्दकोश चनुक झुनुक, Bhoyari Pawari dictionary

