Saturday, 3 October 2026

क्षत्रिय पवार ( भोयर या भोयर पवार )

 क्या आप जानते हैं कि मध्य भारत का एक अत्यंत समृद्ध और कुशल कृषक समुदाय कभी मालवा का पराक्रमी राजपूत राजवंश हुआ करता था, जिसे मध्यकालीन संघर्षों के दौरान अपनी पहचान छिपाने के लिए अस्थायी रूप से अपने वंशज नाम तक बदलने पड़े थे? 'क्षत्रिय पवार' (जिन्हें भोयर या भोयर पवार भी कहा जाता है) की कहानी केवल एक समुदाय का इतिहास नहीं है, बल्कि यह स्वाभिमान, विस्थापन, अनुकूलन और अपनी सांस्कृतिक जड़ों को सदियों तक जीवित रखने की एक अद्भुत मिसाल है।

इस पाठ के अंत तक, आप निम्नलिखित कार्य करने में सक्षम होंगे:
  • विश्लेषण करना: मालवा से सतपुड़ा क्षेत्र में क्षत्रिय पवार समुदाय के ऐतिहासिक प्रवासन (migration) के राजनीतिक और सामाजिक कारणों का विश्लेषण।
  • व्याख्या करना: 24 मूल राजपूत वंशों से विकसित समुदाय की 72 बहिविवाही (exogamous) गोत्रों की संरचना को समझना।
  • स्पष्ट करना: 'भोयर' और 'पवार' नामांकनों की उत्पत्ति तथा देवगढ़ के गोंड राजाओं से उनके ऐतिहासिक संबंधों का विवरण।
  • तुलना करना: ब्रिटिश औपनिवेशिक जनगणना की त्रुटिपूर्ण उपजातीय अवधारणाओं और समुदाय के वास्तविक आंतरिक सामाजिक संगठन के बीच अंतर।
  • मूल्यांकन करना: पवार समुदाय की विशिष्ट सांस्कृतिक परंपराओं, भाषा (भोयरी/पवारी) और आधुनिक सामाजिक स्थिति का आकलन।
मालवा से प्रवासन और सतपुड़ा में आगमन
क्षत्रिय पवार समुदाय का इतिहास मालवा क्षेत्र और वहां के प्रसिद्ध परमार (परमार/पवार) राजवंश से गहराई से जुड़ा हुआ है। वर्ष 1305 में अलाउद्दीन खिलजी के हाथों परमार वंश की पराजय के बाद मालवा में राजनीतिक अस्थिरता का दौर शुरू हुआ। आगे चलकर 16वीं और 18वीं शताब्दी के दौरान, विशेषकर मुगलों और स्थानीय शासकों के साथ निरंतर सैन्य संघर्षों के कारण, मालवा के कई राजपूत परिवारों ने सुरक्षा और अपनी धार्मिक-सामाजिक पहचान को बनाए रखने के लिए दक्षिण की ओर रुख किया।
पहचान छिपाने की रणनीति और वंशानुगत भाट प्रवासन के दौरान उत्पीड़न से बचने और अनजाने क्षेत्रों में सुगमता से बसने के लिए, इन राजपूत समूहों ने एक चतुर रणनीति अपनाई। भाट (राव/बड़वा) वंशानुगत वंशावली-रक्षकों के अनुसार, परिवारों ने अस्थायी रूप से अपने प्रसिद्ध राजपूत वंश-नामों को छिपाकर स्थानीय स्तर पर पहचाने जाने वाले नए नाम अपनाए। हालांकि, इन भाटों ने ताड़पत्रों और बही-खातों में उनकी मूल वंशावलियों (Vamshavalis), राजपूत गोत्रों और विवाह संबंधों का अटूट लिखित रिकॉर्ड बनाए रखा।
प्रवासन मार्ग और 'भोयर' नाम की उत्पत्ति यह ऐतिहासिक प्रवासन धार, सिहोर और होशंगाबाद जैसे प्राकृतिक गलियारों से होता हुआ सतपुड़ा की पहाड़ियों की ओर बढ़ा:
  • पावरखेड़ा: होशंगाबाद के पास पहला अस्थायी पड़ाव, जिसका नाम उन्होंने 'पावरखेड़ा' रखा।
  • धार गांव: आगे बढ़ते हुए एक अन्य गांव में रुके और अपनी मातृभूमि धार (मालवा) की स्मृति में उसका नाम 'धार' रखा।
  • भोयरगढ़ (भंवरगढ़) किला: बैतूल पहुंचने पर, देवगढ़ के गोंड राजाओं ने इन राजपूत शरणार्थियों को संरक्षण दिया और उन्हें बैतूल के पास भोयरगढ़ (भंवरगढ़ या भोरगढ़) किले में रहने की अनुमति दी।




भोयरगढ़ किले में निवास करने के कारण स्थानीय निवासियों ने इन्हें "भोयर" (अर्थात 'भोयरगढ़ किले में रहने वाले पवार') कहना शुरू कर दिया। बाद में, इस समूह का सबसे प्रमुख केंद्र मुलताई बना, जहां से वे धीरे-धीरे छिंदवाड़ा, पांढुर्णा और महाराष्ट्र के वर्धा तथा कारंजा (घाड़गे) क्षेत्रों में फैल गए।

गोत्र संरचना और 24 राजपूत वंश
क्षत्रिय पवार समुदाय का सामाजिक संगठन अत्यंत सुव्यवस्थित और वैज्ञानिक है। समुदाय में कोई आंतरिक उपजातियां (subcastes) नहीं हैं। यह संपूर्ण समुदाय 72 बहिविवाही (exogamous) गोत्रों में विभाजित है, जो 24 मूल राजपूत वंशों से उत्पन्न हुई हैं।
समुदाय अंतरविवाही (endogamous) है—अर्थात विवाह संबंध केवल पवार समुदाय के भीतर ही होते हैं—लेकिन अपने गोत्र के बाहर (exogamy) विवाह किया जाता है।
24 राजपूत वंश और गोत्रों का वितरण सबसे अधिक गोत्र परमार वंश से आते हैं, जिसके कारण इस पूरे समुदाय को सामूहिक रूप से 'पवार' नाम मिला:
  • परमार (12 गोत्र): डाला, ढोले, फरकाड़े, गाखरे, गिरहारे, लबड़े, लावरी, माटे, पठाड़े, सवाई, तोपले, उकार।
  • गहलोत (10 गोत्र): चौधरी, देशमुख, ढोटे, गाड़गे, गोहिते, गोंदिया, हिंगवे, मनमोड़े, पाठा, रोडले।
  • सोलंकी (6 गोत्र): बारंगे, डिगरसे, डोंगरदीये, दुर्वे, खापरिये, किरंजकर।
  • कछवाहा (6 गोत्र): ढोंडी, कालभूत, कामडी, कोडले, मुन्ने, उकाडले।
  • भाटी (5 गोत्र): बागवान, बैंगने, बारखेड़े, बिरगड़े, बुवाड़े।
  • चौहान (5 गोत्र): चिकने, देवासे, धारपुरे, हजारे, रावत।
  • राठौड़ (4 गोत्र): घागरे, किंकर, पिंजारे, रबड़े।
  • चावड़ा (3 गोत्र): चोपड़े, लाड़के, लोखंडे।
  • तोमर (2 गोत्र): बोबड़े, सरोदे।
  • बघेल (2 गोत्र): भोभट, खवासी।
  • गौर (2 गोत्र): गदरे, कसाई।
  • झाला (2 गोत्र): खरपूसे, नाड़ीतोड।
  • टंक (2 गोत्र): ठावरी, ठुस्सी।
  • अन्य 11 वंश (प्रत्येक का 1 गोत्र): बरोदिया (बड़नगरे), बल्ला (बारबुहारे), लबाना (भादे), गर्ग (दांदड़े), दाहिमा (ढोबले), उठेद (कड़वे), जेठवा (कारदाते), परिहार (पारदकर), अंजाना (रामधम), बड़गुजर (गोरे), और कानपुरिया (शेरके)।
विशेष नोट: शोधकर्ताओं के अनुसार, गोंदिया, लावरी और ठुस्सी गोत्र भाटों के अभिलेखों में दर्ज हैं, लेकिन वर्तमान में इनकी जनसंख्या नगण्य है या संभवतः ये प्रवासन के दौरान सतपुड़ा क्षेत्र में नहीं बसे।

भाषा, संस्कृति और जीवनशैली
सतपुड़ा और विदर्भ क्षेत्र में बसने के बाद, क्षत्रिय पवार समुदाय ने कृषि को अपना मुख्य व्यवसाय बनाया और खुद को कुशल, समृद्ध भू-स्वामियों के रूप में स्थापित किया।
बोली और भाषाई अनुकूलन समुदाय की अपनी पारंपरिक बोली भोयरी (या पवारी) है, जो इंडो-आर्यन भाषा परिवार की राजस्थानी-मालवी शाखा से संबंधित है। समय के साथ, भौगोलिक फैलाव के अनुसार इस पर स्थानीय भाषाओं का प्रभाव पड़ा:
  • बैतूल और छिंदवाड़ा में भोयरी पर बुंदेली का प्रभाव दिखा।
  • पांढुर्णा और वर्धा (महाराष्ट्र) में इस पर मराठी का भाषाई प्रभाव पड़ा।
  • बाहरी दुनिया से संवाद के लिए मध्य प्रदेश में हिंदी और महाराष्ट्र में मराठी का प्रयोग किया जाता है।
धार्मिक और सामाजिक परंपराएं
  • राजा भोज और विक्रम की स्मृति: समुदाय मालवा के महान परमार राजाओं—विशेष रूप से राजा भोज, राजा विक्रमादित्य और राजा जगदेव परमार को अपने प्रेरणास्रोत और सांस्कृतिक प्रतीक के रूप में पूजता है।
  • देवी पूजा और प्रसाद: समुदाय में काली माता की विशेष मान्यता है। धार्मिक अवसरों पर बकरे की बलि की प्रथा रही है, जिसका मांस 'प्रसाद' के रूप में वितरित किया जाता है।
  • विवाह संस्कार: विवाह हिंदू रीति-रिवाजों से होते हैं। ब्राह्मण की अनुपस्थिति में समुदाय के सम्मानित बुजुर्ग भी विवाह संपन्न करा सकते हैं। विवाह से दो दिन पूर्व चावल और ज्वार को ब्राह्मण से अभिमंत्रित कराकर हल्दी-कुमकुम में मिलाकर वर-वधू के सिर पर रखने की अनोखी रस्म होती है।
  • शोक की अनूठी परंपरा: मृत्यु के बाद शोक की अवधि अगले आने वाले पहले सोमवार या गुरुवार को समाप्त हो जाती है। यदि मृत्यु शुक्रवार को हुई है, तो शोक 4 दिन चलेगा, लेकिन यदि सोमवार को हुई है, तो उसी दिन समाप्त हो जाएगा।
  • प्रतिष्ठित उपाधियां: आर्थिक और सामाजिक समृद्धि के कारण समुदाय के सदस्यों को स्थानीय स्तर पर 'महाजन' या 'पटेल' की सम्मानजनक उपाधियों से पुकारा जाता है।
औपनिवेशिक नीतियां बनाम वास्तविक सामाजिक संरचना
ब्रिटिश काल के दौरान मानवशास्त्रियों और जनगणना अधिकारियों (जैसे आर.वी. रसेल और हीरालाल) ने भारतीय समाज को समझने के लिए कई वर्गीकरण किए, जिससे पवार (भोयर) समुदाय के संबंध में भारी भ्रांतियां उत्पन्न हुईं।
अंग्रेजों की त्रुटिपूर्ण अवधारणाएं
  1. उपजातियों का गलत वर्गीकरण: ब्रिटिश अधिकारियों ने भोयर समुदाय को चार उपजातियों में बांट दिया—पनवार, ढोलेवार, चौरसिया और डहारिया।
  2. 'निम्न स्थिति' का दावा: औपनिवेशिक लेखकों ने तर्क दिया कि चूंकि ये राजपूत खेती करने लगे थे और स्थानीय समूहों से घुल-मिल गए थे, इसलिए ये "पतनशील" (degraded) राजपूत थे।
समुदाय का ऐतिहासिक खंडन और वास्तविकता समुदाय के अपने वंशावली अभिलेखों और आधुनिक अध्ययनों ने इन औपनिवेशिक दावों का खंडन किया है:
  • कोई उपजाति नहीं: वास्तव में समुदाय में कोई उपजाति है ही नहीं। 72 गोत्रों में से 'पनवार' (परमार) सबसे बड़ा समूह (12 गोत्र) है, जिसके कारण पूरा समुदाय पवार कहलाया। यह कोई अलग उपजाति नहीं है।
  • ढोलेवार, डहारिया और चौरसिया पृथक समुदाय हैं: ये पूरी तरह से अलग सामाजिक इतिहास वाले स्वतंत्र समूह हैं। अंग्रेजों ने प्रशासनिक आसानी के लिए राजपूत दावों वाले इन सभी समूहों को एक ही 'भोयर' श्रेणी में रख दिया था।
  • आरक्षण और वर्तमान स्थिति (OBC): यद्यपि पवार समुदाय ऐतिहासिक रूप से सम्मानित और समृद्ध भूमिधर रहा है, लेकिन मालवा से प्रवासन के दौरान अपनी धन-संपत्ति खोने और कालक्रम में शैक्षणिक-आर्थिक चुनौतियों के कारण, वर्तमान में इन्हें विभिन्न राज्यों में अन्य पिछड़ा वर्ग (OBC) श्रेणी में शामिल किया गया है।
  • Summary
    क्षत्रिय पवार (भोयर पवार) समुदाय मालवा के परमार राजवंश और अन्य राजपूत कुलों का एक प्रत्यक्ष वंशज है, जिसने 16वीं से 18वीं शताब्दी के प्रवासन के बाद सतपुड़ा क्षेत्र में अपनी एक विशिष्ट पहचान बनाई। अपनी 72 गोत्रों की अखंड परंपरा, भोयरी बोली और कृषि आधारित जीवनशैली के माध्यम से इस समुदाय ने अपनी ऐतिहासिक जड़ों को सहेजे रखा है।
    मुख्य बिंदु (Key Takeaways):
    • उत्पत्ति और प्रवासन: 1305 में परमार वंश के पतन और मुगलों के समय राजनीतिक अस्थिरता के कारण मालवा (धार) से बैतूल, छिंदवाड़ा और वर्धा की ओर पलायन।
    • 'भोयर' नाम का इतिहास: गोंड राजाओं द्वारा बैतूल के भोयरगढ़ (भंवरगढ़) किले में शरण मिलने के कारण 'भोयर' नाम प्रचलित हुआ।
    • अद्वितीय गोत्र प्रणाली: कोई उपजाति नहीं; 24 राजपूत वंशों से निकली 72 बहिविवाही गोत्रों का समुदाय। परमार वंश सबसे बड़ा (12 गोत्र) है।
    • सांस्कृतिक विशेषताएं: राजस्थानी-मालवी आधारित भोयरी बोली, राजा भोज व काली माता की पूजा, 
    • औपनिवेशिक भ्रांति का निवारण: अंग्रेजों द्वारा ढोलेवार, डहारिया आदि को उपजाति बताना प्रशासनिक भूल थी; पवार एक एकीकृत राजपूत-कृषक समुदाय है।