Saturday, 6 June 2026

परमार वंश का विशाल विस्तार: मालवा से गढ़वाल तक फैली एक गौरवशाली विरासत

 

परमार वंश का विशाल विस्तार: मालवा से गढ़वाल तक फैली एक गौरवशाली विरासत

इतिहास के पन्नों को जब हम पलटते हैं, तो कुछ राजवंश ऐसे उभरते हैं जिनकी गाथा शताब्दियों की धूल के नीचे दबी होने के बावजूद आज भी अपनी चमक बिखेरती है। परमार (पंवार) वंश एक ऐसा ही नाम है, जो महज़ एक राजनैतिक शक्ति नहीं, बल्कि भारत की सांस्कृतिक चेतना का एक विशाल नेटवर्क है। यह एक ऐसी गौरवगाथा है जो मालवा के राजमहलों से शुरू होकर हिमालय की बर्फीली चोटियों और थार के तपते धोरों तक फैली हुई है। आज के इस लेख में, हम उस अनकही विरासत का अन्वेषण करेंगे जिसने सदियों तक भारत के एक बड़े भू-भाग को अपनी वीरता और विद्वत्ता से सींचा है।

भौगोलिक विविधता: एक वंश, अनेक दिग्विजयी राज्य

परमार वंश का भौगोलिक विस्तार मध्यकालीन भारत के मानचित्र पर किसी विस्मय से कम नहीं है। इस वंश की जड़ें और शाखाएं मध्य प्रदेश के हृदय स्थल मालवा से लेकर राजस्थान के आबू (Mount Abu), गुजरात की समृद्ध भूमि, महाराष्ट्र के पठारों और उत्तराखंड की पहाड़ियों तक फैली हुई हैं। यह देखना अत्यंत विस्मयकारी है कि कैसे एक ही मूल वंश ने हिमालय की वादियों (गढ़वाल) से लेकर थार के रेगिस्तान (अमरकोट) तक अपनी सत्ता स्थापित की। उनकी यह व्याप्ति न केवल उनके सैन्य कौशल को दर्शाती है, बल्कि उनकी उस प्रशासनिक कुशलता का भी प्रमाण है, जिसने भिन्न-भिन्न भौगोलिक परिस्थितियों में भी अपनी पहचान को अक्षुण्ण रखा।

मालवा के 'भोज वंश' का अद्वितीय प्रभाव

जब हम परमारों की बात करते हैं, तो उज्जैन और धार के 'भोज वंश' का उल्लेख स्वतः ही आ जाता है। यह क्षेत्र परमारों की पहचान का मुख्य केंद्र बिंदु रहा है। राजा भोज और उदादित्य जैसे शासकों ने यहाँ शासन किया। विशेषकर राजा भोज का व्यक्तित्व एक दिग्विजयी शासक के साथ-साथ एक महान विद्वान और कला संरक्षक का भी था, जिन्होंने मालवा को ज्ञान और संस्कृति का शिखर बनाया। यहाँ के शासकों ने जो ऐतिहासिक छाप छोड़ी, उसने मालवा को परमारों की प्रतिष्ठा का पर्याय बना दिया।

सोढ़ा और सांखला: भाइयों की विरासत और अंतरराष्ट्रीय सीमाएँ

परमारों की दो शाखाएँ—सोढ़ा और सांखला—भाईचारे और विस्तार की एक अनोखी कहानी कहती हैं। सोढ़ा शाखा नौकोटी मारवाड़ के संस्थापक धरणीवराह के वंशज हैं, जिन्होंने अपनी सीमाओं का विस्तार करते हुए वर्तमान पाकिस्तान के अमरकोट तक शासन किया। वहीं, सांखला शाखा धरणीवराह के भाई 'बाघ' के वंशज माने जाते हैं।

"सांखला शाखा का आध्यात्मिक और सांस्कृतिक अस्तित्व सच्चियाय माता के प्रति उनकी अटूट श्रद्धा में निहित है, जो इस वंश की धार्मिक सुदृढ़ता को रेखांकित करता है।"

यह संबंध दर्शाता है कि कैसे राजनीतिक सीमाओं के पार भी इन शाखाओं ने अपनी सांस्कृतिक जड़ों को जीवित रखा।

'भोयर पंवार' और विदर्भ का प्रवास

परमार वंश का इतिहास केवल महलों तक सीमित नहीं है, बल्कि यह समुदायों के प्रवास और उनके नए स्वरूप में ढलने की एक जीवंत गाथा है। धार (मालवा) से विस्थापित होकर सतपुड़ा की श्रेणियों और विदर्भ के क्षेत्रों की ओर बढ़ा 'भोयर पंवार' समुदाय इसका उत्कृष्ट उदाहरण है। भौगोलिक रूप से विस्थापित होने के बावजूद, इनका अपनी मूल जड़ों—धार और मालवा—से जुड़ाव एक अदृश्य 'नाल' की तरह बना रहा। इस स्थानांतरण ने न केवल नई पहचान को जन्म दिया, बल्कि परमारों की सांस्कृतिक विरासत को और अधिक विविधतापूर्ण और समृद्ध बनाया।

प्राचीन शाखाएँ और विविध उप-नाम

परमार वंश का वृक्ष इतना प्राचीन और विस्तृत है कि इसकी कई शाखाएं 9वीं शताब्दी से भी पहले की मानी जाती हैं। चित्तौड़ के मान मोरी से संबंधित 'मोरी' शाखा और अत्यंत प्राचीन 'डोडिया' शाखा इसके प्रमाण हैं। साथ ही, गढ़वाल साम्राज्य में 'राजा भानु प्रताप' जैसे शासकों ने पंवार वंश की पताका फहराई। इस वंश की व्यापकता को समझने के लिए इसकी शाखाओं और नामों पर दृष्टि डालना आवश्यक है:

  • प्राचीन और क्षेत्रीय शाखाएँ: मोरी, डोडिया, वराह, बारड़, हूण, चन्ना, सुमरा, और ऊमठ।
  • प्रमुख उपाधियाँ / शाखाएँ: पंवार, पवार,  और भोयर।
  • अन्य उप-शाखाएँ: कल्लावत, धोधिंग, बीहल, बूंटा, सांवत, कुंतल, हुरड़, सुजान, रबड़िया, बोया, देहलावत, और भाभा।

यह विविधता यह स्पष्ट करती है कि परमारों ने समय के साथ अलग-अलग क्षेत्रों और शासकों के नाम पर अपनी विशिष्ट उप-पहचानें विकसित कीं।

आध्यात्मिक जुड़ाव: कुलदेवी और कुलदेवता

विशाल भौगोलिक दूरियों के बावजूद, परमारों को उनकी साझा धार्मिक आस्था ने हमेशा एक सूत्र में बांधे रखा। मारवाड़ क्षेत्र की शाखाएं जहाँ 'सच्चियाय माता' के चरणों में शीश नवाती हैं, वहीं धार और मालवा की शाखाएं 'कालिका माता' को अपनी संरक्षिका मानती हैं। अध्यात्म के प्रति उनकी यह निष्ठा भगवान शिव के प्रति उनके समर्पण में भी दिखती है; महाकालेश्वर और ओंकारेश्वर के प्रति उनकी श्रद्धा सदियों से अटल रही है।

निष्कर्ष: एक जीवंत विरासत

परमार वंश का इतिहास केवल विजयों और शिलालेखों का संकलन नहीं है, बल्कि यह भारत की सांस्कृतिक विविधता का एक अभिन्न और जीवंत अंग है। मालवा के राजमहलों से लेकर गढ़वाल की दुर्गम पहाड़ियों तक, इस वंश ने भारत की सामाजिक और ऐतिहासिक बनावट में जो योगदान दिया है, वह आज भी अमिट है। सदियों पुराने इस वंश की शाखाएं आज भी हमारे समाज के गौरव को बढ़ा रही हैं।

क्या आप जानते हैं कि आपके क्षेत्र में परमार वंश की कौन सी शाखा ने इतिहास रचा था?


वर्तमान पवार गोत्र (उदाहरण):

  • पंवारो के उपनाम

    • पवार (७२ कुल) :

    1.      गिरहारे/गिरारे

    2.      पराड़कर/ परिहार/

    3.      खरपुसे, (केवल छिंदवाड़ा)

    4.      बड़नगरे/ नागरे/ बन्नागरे

    5.      घाघरे,

    6.      छेरके, शेरके (छिंदवाड़ा)

    7.      कडवे

    8.      पाठे, पाठा / पाठेकर

    9.      डोंगरदिये/ डोंगरे

    10.  धारफोड/ धारपूरे

    11.  चौधरी,

    12.  माटे/माटेकर

    13.  फरकाड़े

    14.  गाडगे

    15.  ढोटे/धोटे

    16.  देशमुख,

    17.  खौसी/खावसी/कौशिक/खवसी/खवसे

    18.  डिगरसे/दिगरसे/ दिग्रसे

    19.  भादे/भादेकर

    20.  बारंगा/ बारंगे

    21.  राऊत,

    22.  काटोले/गघड़े/गद्रे

    23.  दुखी/दूर्वे

    24.  किंकर/किनकर

    25.  रबडे,

    26.  कसाई/कसलीकर,

    27.  मनमाडे/मानमुडे

    28.  सवाई,

    29.  गोरे,

    30.  डाला/डहारे

    31.  उकार/ओमकार

    32.  उघडे,

    33.  करदाते/दाते

    34.  करंजकर/किरंजकर

    35.  कामडी,

    36.  कालभूत/कालभोर,

    37.  कोडले/कोरडे

    38.  हिंगवे /हिंगवा

    39.  खपरिये/ खपरे,

    40.  गाडरे,

    41.  गाकरे/गाखरे

    42.  गोहिते/गोहते

    43.  चिकाने,

    44.  चोपडे,

    45.  टोपलें,

    46.  ढोले,

    47.  ढोबले/ढोबारे

    48.  डंढारे,

    49.  देवासे,

    50.  ढोंडी

    51.  नाडीतोड,

    52.  पठाडे,

    53.  पिंजारे/ पिंजरकर

    54.  बरखाडे,

    55.  बिरगाडे,

    56.  बारबोहरे,

    57.  गोंनदिया

    58.  बैगने,

    59.  बोबडे,

    60.  भोभटकर

    61.  बुवाड़े/बोवाड़े

    62.  ठवरी

    63.  मुने/मुन्ने

    64.  रमधम

    65.  ठुस्सी

    66.  रोडले

    67.  लबाड,

    68.  लाडके,

    69.  लोखंडे,

    70.  सवाई,

    71.  सरोदे

    72.  हजारे

    other

    73.  Bisen (in Chhindwada)




    • कुछ लोग अपने उपनाम की जगह पंवार या पवार भी लगााते है।

    ( पंवारो के यह ७२ उपनाम राजपूत सैनिक सरदारों के नाम/पदनाम/पदवी/संकेतित नाम है )


कुलों की इस संगठित संरचना ने उन्हें नए क्षेत्रों में एक नई सामाजिक और आर्थिक शक्ति के रूप में स्थापित किया।

5इस विरासत के तीन सबसे महत्वपूर्ण स्तंभों को सदैव स्मरण रखें:

  • अग्निवंशी क्षत्रिय गौरव: 2,500 ईसा पूर्व से निरंतर चली आ रही प्राचीन वंशावली।
  • 72 कुलों की एकता: विभिन्न राजपूत शाखाओं का एक संगठित और अटूट महासंघ।
  • अनुकूलन की क्षमता: समय के अनुसार स्वयं को योद्धा से कुशल भूमि स्वामी (जमींदार) के रूप में सफलतापूर्वक परिवर्तित करना।

यह इतिहास केवल बीते हुए कल की कथा नहीं है, बल्कि आपकी पहचान और भविष्य की एकता का आधार है। अपनी जड़ों को जानें, ताकि आप एक मजबूत भविष्य का निर्माण कर सकें।

भोयर समाज के इतिहास, वंशावली, भाषा, संस्कृति एवं सामाजिक दस्तावेजीकरण के लिए समर्पित


About the Authors

Shivani Pawar

Researcher – Bhoyari / Pawari Language, Folk Culture and Satpuda Regional Studies
Co-Editor, Writer & Contributor – Maa Tapti Shodh Sansthan, Multai, Betul & Pawari Shodh Patrika

Shivani Pawar works on the documentation and preservation of the Pawari/Bhoyari language, Pawari folk songs, and oral traditions of the Bhoyar Pawar community. Her research focuses on the cultural heritage of the Satpuda region, including Betul traditions, and the historical connections of Pawar lineage with Malwa and Rajputana.

📧 Email: barkhede.shivani@gmail.com


Rajesh Barange Pawar

Independent Researcher | Bhoyari / Pawari Language Researcher | Pawar Community History | Rajasthan–Malwa–Satpuda Regional Studies
Founder & Director – Maa Tapti Shodh Sansthan, Multai, Betul
Chief Editor – Pawari Shodh Patrika

Rajesh Barange Pawar researches the Bhoyari/Pawari language, Pawar community history, the 72 gotras of the Pawar community, and the cultural traditions of the Satpuda region. His work explores the historical connections between the Pawar (Parmar/Panwar) lineage of Malwa and Rajputana and their migration and settlement in Betul and surrounding Satpuda regions, including traditions associated with Maa Tapti.

🌐 Blog: https://rajeshbarange.blogspot.com/
🌐 Pawari Shodh Patrika: https://sites.google.com/view/pawarishodhpatrika/home
📧 Email: rajeshbarange00@gmail.com


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पवारी शोध पत्रिका
माँ ताप्ती शोध संस्थान, मुलताई

परमार राजवंश का ऐतिहासिक उद्भव और मालवा की जड़ें: एक बहुआयामी विश्लेषण- राजेश बारंगे पंवार & शिवानी पंवार



परमार राजवंश का ऐतिहासिक उद्भव और मालवा की जड़ें

एक बहुआयामी विश्लेषण


लेखक परिचय (Author Profile)

राजेश बारंगे पंवार

Rajesh Barange Pawar

Chemistry, Pharmacy, History & Linguistics – Independent Researcher
Chief Editor – Pawari Shodh Patrika
Founder – Maa Tapti Shodh Sansthan, Multai


शिवानी पंवार

Shivani Pawar

Pawari writer – Pawari/Bhoyari Language
Independent Researcher – Pawari Bhoyari Studies
Editor – Pawari Shodh Patrika
Editorial Board – Maa Tapti Shodh Sansthan


सारांश (Abstract)

यह शोध आलेख मध्य भारत के 'भोयर पवार' समुदाय के ऐतिहासिक मूल, परमार राजवंश के उद्भव तथा धार (मालवा) क्षेत्र से उनके गहन ऐतिहासिक एवं सांस्कृतिक संबंधों का विश्लेषण प्रस्तुत करता है।

अध्ययन का प्रमुख केंद्र अग्निवंश सिद्धांत का वैज्ञानिक विवेचन, महाराजा भोज के कालखंड की उपलब्धियां, तथा मालवा से सतपुड़ा क्षेत्र की ओर प्रारंभिक प्रवास की ऐतिहासिक प्रक्रिया है।

इस शोध का उद्देश्य समुदाय की वर्तमान भाषाई (पवारी / भोयरी) तथा सामाजिक संरचना को उनके पैतृक क्षेत्र धार नगरी के ऐतिहासिक संदर्भ में पुनः स्थापित करना है।


1. प्रस्तावना (Introduction)

इतिहास केवल बीती घटनाओं का संकलन नहीं है, बल्कि यह उन सांस्कृतिक पदचिह्नों का संग्रह है जो किसी समाज की वर्तमान पहचान को निर्मित करते हैं।

मध्य प्रदेश के
बैतूल, छिंदवाड़ा तथा महाराष्ट्र के वर्धा और नागपुर जिलों में निवासरत भोयर पवार समाज अपनी ऐतिहासिक जड़ों को मालवा के शक्तिशाली परमार राजवंश से जोड़ता है।

शोध की दृष्टि से यह संबंध केवल परंपराओं ( Traditions) तक सीमित नहीं है, बल्कि यह संबंध निम्न तत्वों में भी स्पष्ट रूप से दिखाई देता है:

  • भाषाई संरचना
  • गोत्र व्यवस्था
  • लोकगीत एवं लोकगाथाएँ
  • सामाजिक संरचना

परमार वंश का शासन 9वीं से 14वीं शताब्दी तक मध्यकालीन भारतीय इतिहास का वह कालखंड है जिसमें शस्त्र और शास्त्र का अद्भुत संगम देखने को मिलता है।

प्रस्तुत शोध पत्र इसी गौरवशाली अतीत की उन ऐतिहासिक कड़ियों को जोड़ने का प्रयास है, जो आज के पवार / भोयर पवार समाज की आधारशिला बनीं।


2. परमार वंश की उत्पत्ति

अग्निवंश का वैज्ञानिक एवं प्रतीकात्मक विश्लेषण

भारतीय क्षत्रिय परंपरा में अग्निवंश सिद्धांत अत्यंत महत्वपूर्ण माना जाता है।

पृथ्वीराज रासो,
पद्मगुप्त की नवसाहसांक चरित,
तथा विभिन्न वंशावलियों में परमारों को अग्निकुल क्षत्रिय माना गया है।


2.1 आबू पर्वत का यज्ञीय प्रतीक

पौराणिक कथाओं के अनुसार जब पृथ्वी पर अधर्म और आसुरी शक्तियों का प्रभाव बढ़ गया, तब ऋषि वशिष्ठ ने आबू पर्वत (अर्बुद पर्वत) पर एक महान यज्ञ का आयोजन किया।

इस यज्ञ की अग्नि से चार महान क्षत्रिय वंश उत्पन्न हुए—

  • प्रतिहार
  • चालुक्य (सोलंकी)
  • चौहान
  • परमार

इन चारों वंशों को सामूहिक रूप से अग्निवंशी क्षत्रिय कहा गया।


2.2 स्वतंत्र शोधकर्ता का दृष्टिकोण

(Scientific Interpretation)

एक स्वतंत्र शोधकर्ता के रूप में राजेश बारंगे पंवार ने अपने शोध लेखों में यह प्रतिपादित किया है कि अग्नि से उत्पत्ति का सिद्धांत वास्तव में एक प्रकार की सामाजिक पुनर्गठन प्रक्रिया (Social Re-engineering) का प्रतीक हो सकता है।

संभावना है कि उस समय विभिन्न , राजपुत वंश के योद्धा समूहों को एक संगठित क्षत्रिय व्यवस्था में सम्मिलित करने के लिए इस प्रकार की पौराणिक संरचना विकसित की गई।

“परमार” शब्द का भाषाई विश्लेषण भी इस बात की पुष्टि करता है:

  • पर = शत्रु
  • मार = नाश करने वाला

अर्थात
“परमार = शत्रु का संहार करने वाला”

यह केवल एक सैन्य पहचान नहीं थी बल्कि एक सांस्कृतिक शुद्धिकरण और सामाजिक संगठन का प्रतीक भी थी, जिसने बिखरे हुए योद्धा समूहों को एक वंश और एक लक्ष्य में संगठित किया।


3. धार नगरी (Dhara Nagari)

शिक्षा, शिल्प और शौर्य का केंद्र

परमार वंश ने अपने शासन का केंद्र मालवा क्षेत्र को बनाया।

प्रारंभ में उज्जैन उनकी शक्ति का प्रमुख केंद्र था, परंतु बाद में धार को राजधानी बनाया गया, जिसे इतिहास में धारा नगरी कहा गया।


3.1 ऐतिहासिक और सामरिक महत्व

धार नगरी का चयन परमारों की रणनीतिक दूरदर्शिता का प्रमाण था।

यह क्षेत्र

  • उपजाऊ भूमि से समृद्ध था
  • व्यापार मार्गों के निकट था
  • विंध्य और सतपुड़ा के प्रवेश द्वार के रूप में कार्य करता था

आज भी भोयर पवार समाज के विवाह और संस्कार गीतों में “धार के पवार” शब्द अत्यंत गौरव के साथ प्रयुक्त होता है।

यह तथ्य इस बात का संकेत देता है कि भौगोलिक दूरी के बावजूद धार नगरी आज भी सामूहिक स्मृति में जीवित है।


4. महाराजा भोज

एक ‘पॉलीमैथ’ सम्राट और शोध की परंपरा

परमार वंश के सबसे महान शासकों में महाराजा भोज (1010–1055 ई.) का नाम अत्यंत सम्मान से लिया जाता है।

वे केवल एक योद्धा राजा नहीं थे बल्कि एक

  • वैज्ञानिक
  • वास्तुकार
  • भाषाविद्
  • साहित्यकार

भी थे।


4.1 शोध ग्रंथों का वैज्ञानिक विश्लेषण

महाराजा भोज द्वारा लगभग 84 ग्रंथों की रचना का उल्लेख मिलता है।

विशेष रूप से निम्न ग्रंथ अत्यंत महत्वपूर्ण हैं:

आयुर्वेद सर्वस्व

इस ग्रंथ में जड़ी-बूटियों के गुण तथा उनके औषधीय उपयोगों का विस्तृत विवरण मिलता है।

यह ग्रंथ आज भी फार्मेसी और आयुर्वेदिक चिकित्सा अध्ययन के लिए महत्वपूर्ण स्रोत माना जाता है।


समरांगण सूत्रधार

यह ग्रंथ प्राचीन भारतीय वास्तुकला (Civil Engineering) और यांत्रिक विज्ञान (Mechanics) का अद्भुत उदाहरण है।

इसमें विभिन्न प्रकार के यंत्रों और भवन निर्माण तकनीकों का वर्णन मिलता है।


सरस्वती कंठाभरण

यह ग्रंथ व्याकरण और काव्यशास्त्र का महान ग्रंथ है।

यह सिद्ध करता है कि परमार काल में भाषाविज्ञान (Linguistics) अत्यंत उच्च स्तर पर विकसित था।


4.2 भोजशाला

प्राचीन भारत का “रिसर्च सेंटर”

धार स्थित भोजशाला केवल एक मंदिर या पाठशाला नहीं थी।

यह वास्तव में उस काल का एक शैक्षणिक एवं शोध केंद्र था।

यहाँ देशभर के विद्वान

  • खगोल विज्ञान
  • गणित
  • साहित्य
  • दर्शन

पर अध्ययन और शोध करने आते थे।

शिवानी पंवार के शोध लेखों के अनुसार पवार समाज में शिक्षा के प्रति जो स्वाभाविक झुकाव आज दिखाई देता है, वह संभवतः उसी भोजशाला परंपरा की ऐतिहासिक विरासत का परिणाम है।


5. सामाजिक संरचना और कृषि अभियांत्रिकी

(Agri-Engineering)

परमार काल का समाज केवल युद्धप्रिय नहीं था बल्कि वह एक उत्पादक और संगठित समाज भी था।


5.1 जल प्रबंधन (Hydrology)

भोपाल का विशाल भोज ताल (बड़ा तालाब) महाराजा भोज की इंजीनियरिंग क्षमता का उत्कृष्ट उदाहरण है।

इतने बड़े जलाशय का निर्माण उस समय

  • सिंचाई
  • जल संरक्षण
  • कृषि विकास

के उद्देश्य से किया गया था।

आज का भोयर पवार समाज, जो कृषि कौशल विशेषकर

  • कपास
  • संतरा
  • अनाज उत्पादन

के लिए प्रसिद्ध है, संभवतः अपने पूर्वजों से ही मिट्टी और जल प्रबंधन की तकनीकी समझ विरासत में प्राप्त करता आया है।


6. विस्थापन के प्रारंभिक संकेत

मालवा से सतपुड़ा की ओर

13वीं शताब्दी के उत्तरार्ध से मालवा क्षेत्र पर विदेशी आक्रमणों का दबाव बढ़ने लगा।

विशेष रूप से

  • तुर्क आक्रमण
  • अलाउद्दीन खिलजी के अभियान

ने मालवा की सामाजिक व्यवस्था को प्रभावित किया।


6.1 सांस्कृतिक अस्मिता की रक्षा

इतिहास के विभिन्न स्रोतों तथा माँ ताप्ती शोध संस्थान के अभिलेखों के अनुसार पवारों के एक वर्ग ने अपनी सांस्कृतिक और धार्मिक पहचान की रक्षा के लिए दुर्गम क्षेत्रों की ओर प्रस्थान किया।

यह प्रवास वास्तव में

“अस्मिता की रक्षा का संघर्ष”

था।

मालवा से निकलने के बाद इन योद्धाओं ने सतपुड़ा क्षेत्र के भंवरगढ़ किले फिर मुल्ताई को अपना नया केंद्र बनाया।

यहीं से प्रारंभ हुई

“पवार से भोयर पवार”

बनने की ऐतिहासिक यात्रा।


7. भाषा विज्ञान (Linguistics)

मालवी और पवारी का सेतु

स्वतंत्र भाषा शोधकर्ताओं राजेश बारंगे पंवार एवं शिवानी पंवार के अनुसार पवारी / भोयरी बोली में मालवा क्षेत्र की प्राचीन भाषाई परंपराओं के अनेक अवशेष आज भी सुरक्षित हैं।


ध्वन्यात्मक संरचना

पवारी की ध्वन्यात्मक संरचना आज भी

  • प्राकृत
  • अपभ्रंश

की उस परंपरा के निकट दिखाई देती है जो परमार कालीन मालवा में प्रचलित थी।

यह भाषाई निरंतरता इस शोध को मजबूत आधार प्रदान करती है कि

पवार, / भोयर पवार समाज की ऐतिहासिक जड़ें धार-मालवा राजस्थान से जुड़ी हुई हैं।


8. निष्कर्ष (Conclusion)

परमार राजवंश का इतिहास केवल अतीत का गौरव नहीं बल्कि समाज की भविष्य की बौद्धिक दिशा का आधार भी है।

महाराजा भोज की ज्ञान परंपरा,
धार का सांस्कृतिक वैभव,
और अग्निवंश की संघर्षशील परंपरा

ये तीनों तत्व मिलकर भोयर पवार समाज की ऐतिहासिक पहचान को निर्मित करते हैं।

आज भले ही इस समाज के लोग

  • बैतूल
  • छिंदवाड़ा
  • वर्धा

में हों, लेकिन इसकी ऐतिहासिक जड़ें आज भी धार नगरी और राजस्थान की पवित्र भूमि में गहराई से जुड़ी हुई हैं।


संदर्भ एवं ग्रंथ सूची

(References & Bibliography)

  1. बारंगे, राजेश पंवार
    भोयर पवार समाज: एक ऐतिहासिक और सांस्कृतिक शोध यात्रा
    माँ ताप्ती शोध संस्थान प्रकाशन, मुलताई।

  2. ठाकुर, उपेंद्र
    History of Parmar Dynasty
    दिल्ली यूनिवर्सिटी प्रेस।

  3. पवार, शिवानी
    “पवारी लोक संस्कृति में मालवा के अवशेष”
    पावारी शोध पत्रिका, अंक 07।

  4. G.A. Grierson
    Linguistic Survey of India (Vol. IX)

  5. District Gazetteer
    Betul, Chhindwara, Wardha, Dhar.


कॉपीराइट सूचना

यह आलेख माँ ताप्ती शोध संस्थान, मुलताई तथा पवारी शोध पत्रिका के सौजन्य से शोध उद्देश्यों हेतु प्रकाशित है।



वर्तमान पवार गोत्र (उदाहरण):

  • पंवारो के उपनाम

    • पवार (७२ कुल) :

    1.      गिरहारे/गिरारे

    2.      पराड़कर/ परिहार/

    3.      खरपुसे, (केवल छिंदवाड़ा)

    4.      बड़नगरे/ नागरे/ बन्नागरे

    5.      घाघरे,

    6.      छेरके, शेरके (छिंदवाड़ा)

    7.      कडवे

    8.      पाठे, पाठा / पाठेकर

    9.      डोंगरदिये/ डोंगरे

    10.  धारफोड/ धारपूरे

    11.  चौधरी,

    12.  माटे/माटेकर

    13.  फरकाड़े

    14.  गाडगे

    15.  ढोटे/धोटे

    16.  देशमुख,

    17.  खौसी/खावसी/कौशिक/खवसी/खवसे

    18.  डिगरसे/दिगरसे/ दिग्रसे

    19.  भादे/भादेकर

    20.  बारंगा/ बारंगे

    21.  राऊत,

    22.  काटोले/गघड़े/गद्रे

    23.  दुखी/दूर्वे

    24.  किंकर/किनकर

    25.  रबडे,

    26.  कसाई/कसलीकर,

    27.  मनमाडे/मानमुडे

    28.  सवाई,

    29.  गोरे,

    30.  डाला/डहारे

    31.  उकार/ओमकार

    32.  उघडे,

    33.  करदाते/दाते

    34.  करंजकर/किरंजकर

    35.  कामडी,

    36.  कालभूत/कालभोर,

    37.  कोडले/कोरडे

    38.  हिंगवे /हिंगवा

    39.  खपरिये/ खपरे,

    40.  गाडरे,

    41.  गाकरे/गाखरे

    42.  गोहिते/गोहते

    43.  चिकाने,

    44.  चोपडे,

    45.  टोपलें,

    46.  ढोले,

    47.  ढोबले/ढोबारे

    48.  डंढारे,

    49.  देवासे,

    50.  ढोंडी

    51.  नाडीतोड,

    52.  पठाडे,

    53.  पिंजारे/ पिंजरकर

    54.  बरखाडे,

    55.  बिरगाडे,

    56.  बारबोहरे,

    57.  गोंनदिया

    58.  बैगने,

    59.  बोबडे,

    60.  भोभटकर

    61.  बुवाड़े/बोवाड़े

    62.  ठवरी

    63.  मुने/मुन्ने

    64.  रमधम

    65.  ठुस्सी

    66.  रोडले

    67.  लबाड,

    68.  लाडके,

    69.  लोखंडे,

    70.  सवाई,

    71.  सरोदे

    72.  हजारे

    other

    73.  Bisen (in Chhindwada)




    • कुछ लोग अपने उपनाम की जगह पंवार या पवार भी लगााते है।

    ( पंवारो के यह ७२ उपनाम राजपूत सैनिक सरदारों के नाम/पदनाम/पदवी/संकेतित नाम है )


कुलों की इस संगठित संरचना ने उन्हें नए क्षेत्रों में एक नई सामाजिक और आर्थिक शक्ति के रूप में स्थापित किया।

5. जीवन शैली में परिवर्तन: तलवार से हल तक (योद्धा से भूमि स्वामी)

सतपुड़ा और विदर्भ की धरती पर बसने के बाद, इस योद्धा समुदाय ने अपनी ऊर्जा को सृजन की ओर मोड़ा। उन्होंने अपनी संगठित शक्ति और अनुशासन का उपयोग कृषि और भूमि प्रबंधन में किया।

  • योद्धा से जमींदार: वे न केवल साहसी सैनिक बने रहे, बल्कि अपनी मेहनत से कुशल किसान और शक्तिशाली जमींदार बनकर उभरे।
  • 'भोयर' पहचान का रहस्य: वर्धा क्षेत्र में प्रचलित 'भोयर' नाम उनके प्रथम बसावट स्थल 'भोरगढ़ किले' से उत्पन्न हुआ है। यद्यपि 20वीं शताब्दी के आरंभ में समुदाय ने अपने मूल नाम 'पवार' की ओर लौटने के लिए आंदोलन किए, लेकिन 'भोयर' आज भी उनकी ऐतिहासिक पहचान का एक अभिन्न हिस्सा बना हुआ है।

आज यह समुदाय अपनी क्षत्रिय विरासत को आधुनिक कृषि और उद्यमिता के साथ जोड़कर प्रगति कर रहा है।

6. निष्कर्ष: अपनी जड़ों को समझना

पवार समुदाय का इतिहास हमें सिखाता है कि कठिन परिस्थितियों में भी अपनी एकता और संस्कृति को कैसे जीवित रखा जाता है। मालवा के राजमहलों से सतपुड़ा की कंदराओं तक की यह यात्रा उनके अडिग आत्मविश्वास का प्रतीक है।

विद्यार्थियों, इस विरासत के तीन सबसे महत्वपूर्ण स्तंभों को सदैव स्मरण रखें:

  • अग्निवंशी क्षत्रिय गौरव: 2,500 ईसा पूर्व से निरंतर चली आ रही प्राचीन वंशावली।
  • 72 कुलों की एकता: विभिन्न राजपूत शाखाओं का एक संगठित और अटूट महासंघ।
  • अनुकूलन की क्षमता: समय के अनुसार स्वयं को योद्धा से कुशल भूमि स्वामी (जमींदार) के रूप में सफलतापूर्वक परिवर्तित करना।

यह इतिहास केवल बीते हुए कल की कथा नहीं है, बल्कि आपकी पहचान और भविष्य की एकता का आधार है। अपनी जड़ों को जानें, ताकि आप एक मजबूत भविष्य का निर्माण कर सकें।

भोयर समाज के इतिहास, वंशावली, भाषा, संस्कृति एवं सामाजिक दस्तावेजीकरण के लिए समर्पित


About the Authors

Shivani Pawar

Researcher – Bhoyari / Pawari Language, Folk Culture and Satpuda Regional Studies
Co-Editor, Writer & Contributor – Maa Tapti Shodh Sansthan, Multai, Betul & Pawari Shodh Patrika

Shivani Pawar works on the documentation and preservation of the Pawari/Bhoyari language, Pawari folk songs, and oral traditions of the Bhoyar Pawar community. Her research focuses on the cultural heritage of the Satpuda region, including Betul traditions, and the historical connections of Pawar lineage with Malwa and Rajputana.

📧 Email: barkhede.shivani@gmail.com


Rajesh Barange Pawar

Independent Researcher | Bhoyari / Pawari Language Researcher | Pawar Community History | Rajasthan–Malwa–Satpuda Regional Studies
Founder & Director – Maa Tapti Shodh Sansthan, Multai, Betul
Chief Editor – Pawari Shodh Patrika

Rajesh Barange Pawar researches the Bhoyari/Pawari language, Pawar community history, the 72 gotras of the Pawar community, and the cultural traditions of the Satpuda region. His work explores the historical connections between the Pawar (Parmar/Panwar) lineage of Malwa and Rajputana and their migration and settlement in Betul and surrounding Satpuda regions, including traditions associated with Maa Tapti.

🌐 Blog: https://rajeshbarange.blogspot.com/
🌐 Pawari Shodh Patrika: https://sites.google.com/view/pawarishodhpatrika/home
📧 Email: rajeshbarange00@gmail.com


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पवारी शोध पत्रिका
माँ ताप्ती शोध संस्थान, मुलताई

Monday, 30 March 2026

🌿 सतपुड़ा भोयरी पंवारी लोक-गीत 🌿

🌿 सतपुड़ा भोयरी पंवारी लोक-गीत 🌿

इं धरती के बांट-बांट मा, भात-भात की कला मिलै
आव भैया मीठी मनवारा, मनखा इहाँ के भला मिलै

डोंगर-टीला, नदिया-झिरिया, जंगल अउ सतपुड़ा देखौ
सतपुड़ा के रंग घना रे, आंख खोल के सावन देखौ

धिन रंग-रूढ़ी धरती मइया, सतपुड़ा मइया न्यारी
आव भैया अपने देस मा, लागै सबला प्यारी

तोर मान बढ़ावन खातिर, दिल से द्वार खोल देन
आव भैया सतपुड़ा मा, मया की धार बोल देन

म्हारी धरती वीरन की, गाथा पुरखन की भारी
जंगल, नदिया, पहाड़ बचावन, यही रीत हमरी सारी

तापी मइया, सतपुड़ा धरती, असीस सबपे डालै
म्हारो सतपुड़ा देस निराला, सुख-शांति घर-घर पालै

🙏 सतपुड़ा की माटी को नमन 🙏

✍️ राजेश बारंगे पंवार

Friday, 20 March 2026

Pawar Community History: Origin, 72 Gotras, Rajput Lineage & Migration from Malwa to Satpura -Rajesh barange Pawar पवार समुदाय का समृद्ध इतिहास: उद्भव, वीरता और विरासत की एक यात्रा

 

पवार समुदाय का समृद्ध इतिहास: उद्भव, वीरता और विरासत की एक यात्रा

एक ऐतिहासिक विरासत विशेषज्ञ के रूप में, आज मैं आपको भारत के एक अत्यंत स्वाभिमानी और साहसी समुदाय—पवार समुदाय—की गौरवशाली यात्रा पर ले चलूँगा। यह केवल एक वंशावली का अध्ययन नहीं है, बल्कि यह समय के साथ स्वयं को ढालने, अपने शौर्य को संरक्षित करने और अपनी जड़ों से अटूट प्रेम करने की एक जीवंत गाथा है।



1. परिचय: पवार समुदाय की पहचान और जड़ें

पवार समुदाय, जिसे विभिन्न भौगोलिक क्षेत्रों में पवार, पंवार, भोयर या भोयर पवार जैसे नामों से संबोधित किया जाता है, अपनी उत्पत्ति हिंदू वैदिक वर्ण व्यवस्था के क्षत्रिय वर्ण से मानता है। ऐतिहासिक साक्ष्यों और वंशावली विशेषज्ञों (भाट/राव) के अनुसार, इनका संबंध क्षत्रियों की 'अग्निवंश' शाखा से है, जिसका अस्तित्व ईसा पूर्व लगभग 2,500 वर्ष पुराना माना जाता है।

ध्यान देने वाली एक महत्वपूर्ण बात यह है कि 'पवार' शब्द का प्रयोग इस समुदाय में दो रूपों में होता है: कुछ परिवारों के लिए यह उनकी जाति की पहचान है, जबकि कई लोग इसे अपने उपनाम/गोत्र (Surname) के रूप में भी गौरव के साथ लगाते हैं।

मध्य भारत के विभिन्न क्षेत्रों में इनकी प्रचलित पहचान को हम इस तालिका के माध्यम से समझ सकते हैं:

क्षेत्र

प्रचलित नाम

बैतूल और छिंदवाड़ा (मप्र)

क्षत्रिय पवार, पवार, पंवार

वर्धा और विदर्भ (महाराष्ट्र)

भोयर पवार, 

सामान्य ऐतिहासिक पहचान

पंवार, पवार, अग्निवंशी क्षत्रिय 

इस पहचान की नींव उनके उस गौरवशाली सैन्य इतिहास में छिपी है, जिसने सदियों तक भारत की सीमाओं और संस्कृति की रक्षा की।

2. पूर्वजों की विरासत: परमार राजवंश और सैन्य कौशल

इतिहासकारों का मानना है कि पवारों का अस्तित्व मालवा के प्रसिद्ध परमार राजवंश की शक्ति का मुख्य आधार था। इन्हें केवल एक सामाजिक समूह के रूप में देखना पर्याप्त नहीं होगा; ये मूलतः योद्धा, सैन्य प्रमुख और कुशल सेनापति थे।

इस समुदाय की ऐतिहासिक भूमिका को समझने के लिए हमें इनकी वीरता के प्रभाव का विश्लेषण करना होगा। पवारों के रण-कौशल और सामरिक सूझबूझ ने ही परमार सम्राटों को वह शक्ति प्रदान की, जिससे वे अपने साम्राज्य की सीमाओं को सुरक्षित और विस्तृत कर सके। युद्ध के मैदान में उनकी उपस्थिति ही जीत का विश्वास जगाने के लिए काफी थी। उनकी वीरता केवल युद्धों तक सीमित नहीं थी, बल्कि वे परमार प्रशासन के महत्वपूर्ण स्तंभ थे, जिन्होंने मालवा की प्रतिष्ठा को शिखर पर पहुँचाया।

वीरता की यह राह समय के साथ युद्ध के मैदानों से निकलकर एक नए भौगोलिक गंतव्य की ओर मुड़ गई, जिसका मार्ग संघर्षों ने प्रशस्त किया।

3. महान प्रवास की कहानी: मालवा से सतपुड़ा तक

पवार समुदाय का मालवा से पलायन कोई आकस्मिक घटना नहीं, बल्कि आत्म-सम्मान की रक्षा के लिए किया गया एक दीर्घकालिक प्रवास था। इस यात्रा को हम निम्नलिखित चरणों में देख सकते हैं:

  1. विदेशी आक्रमण और विस्थापन (1305 ई.): अलाउद्दीन खिलजी द्वारा मालवा विजय के बाद, पवार राजपूतों ने अपनी पहचान सुरक्षित रखने के लिए पूर्वी मालवा (शाजापुर, शुजालपुर, सीहोर और देवास) की ओर प्रस्थान किया।
  2. पूर्वी मालवा में स्थिरता (300 वर्ष): यहाँ यह समुदाय लगभग तीन शताब्दियों तक रहा। यही वह महत्वपूर्ण समय था जब 72 राजपूत सैन्य प्रमुखों ने एक अत्यंत संगठित 'जाति संघ' (Caste Confederation) का रूप लिया।
  3. नर्मदा पार और सतपुड़ा आगमन: 17वीं शताब्दी में औरंगजेब के शासनकाल के दौरान हुए आक्रमणों के कारण, यह समुदाय नर्मदा नदी पार कर सतपुड़ा के दुर्गम पहाड़ों (बैतूल, छिंदवाड़ा) और वर्धा के मैदानों में बस गया।
  4. भौगोलिक परिचय का कारण:  रोचक तथ्य यह है कि वे इन अनजान क्षेत्रों में क्यों आए? ऐतिहासिक शोध बताते हैं कि अपनी प्रथम सैनिक यात्रा (First Sanik Expedition) के दौरान वे इस भूगोल से पहले ही परिचित हो चुके थे, जिसने उन्हें यहाँ बसने का आत्मविश्वास दिया।

इस प्रवास के दौरान ही उन 72 कुलों का संगठन और अधिक सुदृढ़ हुआ, जो आज इस समुदाय की रीढ़ है।

4. 72 क्षत्रिय कुलों का संघ और गोत्र व्यवस्था

पवार समुदाय की सबसे विशिष्ट पहचान उनका '72 गोत्र' का अटूट संगठन है। विशेषज्ञों के अनुसार, यह वास्तव में विभिन्न महान क्षत्रिय कुलों का एक 'महासंघ' है, जिसमें परिहार, परमार, सोलंकी, चौहान, राठौर और तोमर जैसे वंश शामिल हैं।

भाषाई बदलाव और भ्रम का निवारण: अक्सर गोत्रों की संख्या को लेकर 80, 90 या 100 तक के भ्रम फैलाए जाते हैं। एक शिक्षक के रूप में मैं स्पष्ट कर दूँ कि यह भ्रम केवल क्षेत्रीय बोलियों के प्रभाव और उच्चारण में आए बदलावों के कारण है। जैसे:

स्त्रोतों के अनुसार, अन्य जातियों के कुछ लोगों ने जानबूझकर इन पर्यायवाची नामों को अलग-अलग गोत्र बताकर समुदाय में विभाजन और भ्रामक जानकारी फैलाने का प्रयास किया। वास्तविकता यही है कि मूल रूप से केवल 72 गोत्र ही प्रमाणित हैं।

वर्तमान पवार गोत्र (उदाहरण):

  • पंवारो के उपनाम

    • पवार (७२ कुल) :

    1.      गिरहारे/गिरारे

    2.      पराड़कर/ परिहार/

    3.      खरपुसे, (केवल छिंदवाड़ा)

    4.      बड़नगरे/ नागरे/ बन्नागरे

    5.      घाघरे,

    6.      छेरके, शेरके (छिंदवाड़ा)

    7.      कडवे

    8.      पाठे, पाठा / पाठेकर

    9.      डोंगरदिये/ डोंगरे

    10.  धारफोड/ धारपूरे

    11.  चौधरी,

    12.  माटे/माटेकर

    13.  फरकाड़े

    14.  गाडगे

    15.  ढोटे/धोटे

    16.  देशमुख,

    17.  खौसी/खावसी/कौशिक/खवसी/खवसे

    18.  डिगरसे/दिगरसे/ दिग्रसे

    19.  भादे/भादेकर

    20.  बारंगा/ बारंगे

    21.  राऊत,

    22.  काटोले/गघड़े/गद्रे

    23.  दुखी/दूर्वे

    24.  किंकर/किनकर

    25.  रबडे,

    26.  कसाई/कसलीकर,

    27.  मनमाडे/मानमुडे

    28.  सवाई,

    29.  गोरे,

    30.  डाला/डहारे

    31.  उकार/ओमकार

    32.  उघडे,

    33.  करदाते/दाते

    34.  करंजकर/किरंजकर

    35.  कामडी,

    36.  कालभूत/कालभोर,

    37.  कोडले/कोरडे

    38.  हिंगवे /हिंगवा

    39.  खपरिये/ खपरे,

    40.  गाडरे,

    41.  गाकरे/गाखरे

    42.  गोहिते/गोहते

    43.  चिकाने,

    44.  चोपडे,

    45.  टोपलें,

    46.  ढोले,

    47.  ढोबले/ढोबारे

    48.  डंढारे,

    49.  देवासे,

    50.  ढोंडी

    51.  नाडीतोड,

    52.  पठाडे,

    53.  पिंजारे/ पिंजरकर

    54.  बरखाडे,

    55.  बिरगाडे,

    56.  बारबोहरे,

    57.  गोंनदिया

    58.  बैगने,

    59.  बोबडे,

    60.  भोभटकर

    61.  बुवाड़े/बोवाड़े

    62.  ठवरी

    63.  मुने/मुन्ने

    64.  रमधम

    65.  ठुस्सी

    66.  रोडले

    67.  लबाड,

    68.  लाडके,

    69.  लोखंडे,

    70.  सवाई,

    71.  सरोदे

    72.  हजारे

    other

    73.  Bisen (in Chhindwada)




    • कुछ लोग अपने उपनाम की जगह पंवार या पवार भी लगााते है।

    ( पंवारो के यह ७२ उपनाम राजपूत सैनिक सरदारों के नाम/पदनाम/पदवी/संकेतित नाम है )


कुलों की इस संगठित संरचना ने उन्हें नए क्षेत्रों में एक नई सामाजिक और आर्थिक शक्ति के रूप में स्थापित किया।

 इस विरासत के तीन सबसे महत्वपूर्ण स्तंभों को सदैव स्मरण रखें:

  • अग्निवंशी क्षत्रिय गौरव: 2,500 ईसा पूर्व से निरंतर चली आ रही प्राचीन वंशावली।
  • 72 कुलों की एकता: विभिन्न राजपूत शाखाओं का एक संगठित और अटूट महासंघ।
  • अनुकूलन की क्षमता: समय के अनुसार स्वयं को योद्धा से कुशल भूमि स्वामी (जमींदार) के रूप में सफलतापूर्वक परिवर्तित करना।

यह इतिहास केवल बीते हुए कल की कथा नहीं है, बल्कि आपकी पहचान और भविष्य की एकता का आधार है। अपनी जड़ों को जानें, ताकि आप एक मजबूत भविष्य का निर्माण कर सकें।

भोयर समाज के इतिहास, वंशावली, भाषा, संस्कृति एवं सामाजिक दस्तावेजीकरण के लिए समर्पित


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Shivani Pawar

Researcher – Bhoyari / Pawari Language, Folk Culture and Satpuda Regional Studies
Co-Editor, Writer & Contributor – Maa Tapti Shodh Sansthan, Multai, Betul & Pawari Shodh Patrika

Shivani Pawar works on the documentation and preservation of the Pawari/Bhoyari language, Pawari folk songs, and oral traditions of the Bhoyar Pawar community. Her research focuses on the cultural heritage of the Satpuda region, including Betul traditions, and the historical connections of Pawar lineage with Malwa and Rajputana.

📧 Email: barkhede.shivani@gmail.com


Rajesh Barange Pawar

Independent Researcher | Bhoyari / Pawari Language Researcher | Pawar Community History | Rajasthan–Malwa–Satpuda Regional Studies
Founder & Director – Maa Tapti Shodh Sansthan, Multai, Betul
Chief Editor – Pawari Shodh Patrika

Rajesh Barange Pawar researches the Bhoyari/Pawari language, Pawar community history, the 72 gotras of the Pawar community, and the cultural traditions of the Satpuda region. His work explores the historical connections between the Pawar (Parmar/Panwar) lineage of Malwa and Rajputana and their migration and settlement in Betul and surrounding Satpuda regions, including traditions associated with Maa Tapti.

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पवारी शोध पत्रिका
माँ ताप्ती शोध संस्थान, मुलताई


Thursday, 19 March 2026

5 Shocking Facts About Pawar/Panwar History, 72 Gotras & Bhoyar Identity Explained- rajesh barange Pawar पवार/पंवार समुदाय के गौरवशाली इतिहास और गोत्रों के पीछे छिपे 5 चौंकाने वाले तथ्य -राजेश बारंगे पंवार

 

पवार/पंवार समुदाय के गौरवशाली इतिहास और गोत्रों के पीछे छिपे 5 चौंकाने वाले तथ्य

अपनी जड़ों और वंशावली को समझना केवल अतीत का स्मरण नहीं है, बल्कि अपनी सामाजिक और सांस्कृतिक पहचान को परिभाषित करने का एक बौद्धिक प्रयास है। मध्य भारत के सतपुड़ा और विदर्भ क्षेत्रों—विशेषकर बैतूल, छिंदवाड़ा और वर्धा जिलों—में निवास करने वाला पवार/पंवार  समुदाय एक ऐसी ही समृद्ध विरासत का स्वामी है। राजेश बारंगे पंवार (Rajesh Barange Pawar) के बहुविषयक शोध (Multidisciplinary Research) पर आधारित यह लेख, ऐतिहासिक स्रोतों, भाषाई विश्लेषण और वंशावली डेटा के माध्यम से इस समुदाय के उन तथ्यों को उजागर करता है जो वर्षों से भ्रांतियों के घेरे में रहे हैं। एक सांस्कृतिक इतिहासकार के रूप में, मेरा उद्देश्य इस गौरवशाली वंशावली के वैज्ञानिक और ऐतिहासिक स्वरूप को समाज के सम्मुख रखना है।


Bhoyar Pawar Betul Rajesh barange Pawar Shivani Pawar


1. 72 क्षत्रिय कुलों का परिसंघ—एक अद्वितीय राजपूती विरासत

पंवार समुदाय का उदय केवल एक वंश से नहीं, बल्कि क्षत्रिय कुलों के एक शक्तिशाली 'परिसंघ' (Confederacy) से हुआ है। शोध के अनुसार, इस समुदाय की जड़ें हिंदू वैदिक वर्ण व्यवस्था के क्षत्रिय वर्ण में निहित हैं और इनकी वंशावली सामान्य युग (BCE) से लगभग 2,500 वर्ष पहले की 'अग्निवंश' शाखा से जुड़ी है।

यह समझना महत्वपूर्ण है कि आधुनिक 'पंवार' पहचान वास्तव में 72 विभिन्न राजपूत शाखाओं का एक संगठित स्वरूप है। इनमें परिहार, परमार, सोलंकी, चौहान, राठौड़, कुशवाहा, गहलोत, बड़गूजर, डांगी, गौर, भट्टी, झाला, तंवर और तोमर जैसे प्रतापी राजपूत वंश शामिल हैं। मालवा के परमार राजवंश के दौरान, ये योद्धा सैन्य प्रमुख और सेनापति के रूप में प्रतिष्ठित थे, जिन्होंने साम्राज्य की सीमाओं और प्रतिष्ठा को अक्षुण्ण रखा।

2. पलायन की महागाथा—मालवा से सतपुड़ा तक का सामरिक सफर

पंवार समुदाय का इतिहास वीरता के साथ-साथ संघर्ष और अनुकूलन की एक असाधारण गाथा है। इनके विस्थापन का मुख्य कारण बाहरी आक्रमण थे:

  • प्रथम चरण (1305 ई.): सुल्तान अलाउद्दीन खिलजी से पराजित होने के बाद, इन राजपूत योद्धाओं को धारानगरी (धार) छोड़कर पूर्वी मालवा (शाजापुर, शुजालपुर, सीहोर और देवास) में शरण लेनी पड़ी।
  • द्वितीय चरण (15वीं से 17वीं शताब्दी): औरंगजेब के आक्रमणों के दौरान, यह 72 सैन्य प्रमुखों का समूह नर्मदा नदी पार कर सतपुड़ा के दुर्गम अंचलों में पहुंचा। ऐतिहासिक प्रमाण बताते हैं कि ये योद्धा पहले भी 'सैनिक अभियानों' (Sainik Expeditions) के दौरान इस क्षेत्र से परिचित थे, इसलिए उन्होंने बैतूल, छिंदवाड़ा और वर्धा जैसे क्षेत्रों को अपने नए निवास के रूप में चुना। यहाँ वे योद्धाओं से कुशल किसान और जमींदार के रूप में परिवर्तित हुए।

3. 72 गोत्रों का अनुक्रम—वंशानुगत वर्गीकरण और भ्रांतियों का अंत

पंवार समुदाय के गोत्रों की संख्या को लेकर सामाजिक स्तर पर व्यापक भ्रम फैलाया गया है। कुछ लोग इनकी संख्या 90 से 100 के बीच बताते हैं, लेकिन राजेश बारंगे पंवार का शोध और प्राचीन वंशावली लेखक मदनसिंह जी मोरसिंह बरवाजी के प्रमाण स्पष्ट करते हैं कि समुदाय में केवल 72 गोत्र (कुल) हैं।

ऐतिहासिक दृष्टि से इन 72 गोत्रों को चार प्रमुख वंशों में वर्गीकृत किया गया है:

  1. अग्निवंश: 
  2. सूर्यवंश: 
  3. चंद्रवंश: 
  4. ऋषिवंश: 

राजेश बारंगे पंवार का शोध स्पष्ट करता है कि गोत्रों की संख्या में कृत्रिम वृद्धि का कारण "भाषाई पर्याय" हैं। अन्य जातियों के कुछ लोगों द्वारा जानबूझकर फैलाए गए भ्रामक प्रचार और समान गोत्रों को अलग-अलग गिनने के कारण यह संख्या 100 तक पहुँच गई, जिससे समाज में अनावश्यक विभाजन पैदा हुआ। समुदाय आज भी इन 72 कुलों के भीतर 'सगोत्र विवाह निषेध' (Endogamy) के कड़े नियमों का पालन कर अपनी विशिष्ट पहचान बनाए हुए है।

Barange/Baranga, Bagwan, Baingane, Barkhede, Barbuhare, Badnagre/Bannagre/Nagre, Bhade/Bhadekar, Bhobhat, Bobde/Bobade, Buwade/Bowade, Birgade, Chopde/Chopda/Chopra, Chaudhary, Chikane/Chiknya, Dandare/Dhandare, Dala/Dahare, Dewase, Deshmukh, Dharpure, Dhote, Dhondi, Dhoble/Dhobare, Dhole, Digarse/Digrase, Dongardiye/Dongre, Dukhi/Durve, Farkade, Gakhre/Gakre, Gadge/Gagre/Agre, Gadre/Katole, Ghagre/Ghagare, Girhare/Girare, Gondiya, Gohite/Gohate, Gore, Hajare, Hingwe/Hingwa, Kalbhut/Kalbhor, Kardate, Kadwe/Kadve, Kamdi, Kasai/Kaslikar, Khausi/Kaushik/Khawse, Khapariya/Khapre, Khargosiya/Kharpuse, Kiranjkar/Kirankar, Kinkar, Kodle/Korde, Labde, Lavri, Ladke, Lokhande, Mate/Matekar, Manmode/Manmude, Munne/Mune, Naditod, Pathade, Parihar/Paradkar, Pathe/Patha/Pathekar, Pinjare/Pinjre, Rawat/Raut, Rabde, Ramdham, Rodle, Sarode, Sawai, Sherke/Cherke, Thawri, Thussi, Tople, Ukar/Omkar, Ukadale.

पुष्टि करने वाले ऐतिहासिक स्रोत:

  • डॉ. ज्ञानेश्वर टेम्भरे (2014) - 'पावारी ज्ञानदीप'
  • वल्लभ डोंगरे (2013) - 'सीखो सबक पंवारों'
  • पन्नालाल बिसेन (1986) - 'भोजपत्र'

4. भाषाई संक्रमण और उपनामों का रूपांतरण

समय और स्थान के परिवर्तन ने मूल राजपूत उपनामों को एक नया भाषाई स्वरूप प्रदान किया है। मालवा से सतपुड़ा और विदर्भ की ओर प्रवास के दौरान, स्थानीय बोलियों के प्रभाव से मूल संज्ञाओं के उच्चारण बदल गए।

  • परिहार का उच्चारण बदलकर पराडकर हो गया।

एक विशेषज्ञ के रूप में यह मेरा विश्लेषण है कि ये परिवर्तन भाषाई 'अपभ्रंश' मात्र हैं, न कि नए गोत्रों का उदय। इन विसंगतियों को पहचानना ही समाज की ऐतिहासिक एकता को पुनर्स्थापित करने की पहली सीढ़ी है।

5. 'भोयर' पहचान का रहस्य—भोरगढ़ किले का ऐतिहासिक गौरव

वर्धा और उसके निकटवर्ती क्षेत्रों में प्रचलित 'भोयर पंवार' या 'भोयर' शब्द को लेकर अक्सर जिज्ञासा रहती है। ऐतिहासिक तथ्यों के अनुसार, जब यह समुदाय मालवा से विस्थापित होकर वर्धा पहुँचा, तो उनका प्रथम निवास 'भोरगढ़ किला' (Bhorgarh Fort) था।

भोरगढ़ में बसने के कारण ही इस शाखा को 'भोयर' की पहचान मिली। यद्यपि 20वीं शताब्दी के प्रारंभ में इस वर्ग ने पुनः अपने मूल 'पवार' नाम की ओर लौटने के संगठित प्रयास किए, किंतु 'भोयर' शब्द आज भी उनके प्रथम पड़ाव और जुझारू संघर्ष की याद दिलाता है। यह नाम केवल एक जाति सूचक शब्द नहीं, बल्कि भोरगढ़ की मिट्टी से जुड़ा एक भावनात्मक गौरव है।

निष्कर्ष: विरासत का सम्मान और भविष्य की दृष्टि

पंवार समुदाय का इतिहास केवल युद्धों और पलायन की कहानी नहीं है, बल्कि यह एक 'क्षत्रिय परिसंघ' द्वारा अपनी संस्कृति और वंशावली को संरक्षित करने का प्रमाण है। राजेश बारंगे पंवार का शोध हमें सिखाता है कि सामाजिक एकता के लिए सटीक ऐतिहासिक स्रोतों पर निर्भर रहना कितना अनिवार्य है। जब हम अपनी जड़ों को वैज्ञानिक दृष्टिकोण से पहचानते हैं, तभी हम भ्रांतियों के कुहासे को हटा पाते हैं।

आज की युवा पीढ़ी के लिए मेरा एक विचारोत्तेजक प्रश्न है: "क्या हम अपनी वंशावली के इन भाषाई और ऐतिहासिक परिवर्तनों को गहराई से समझकर अपनी आने वाली पीढ़ियों को उनकी वास्तविक जड़ों और गौरवशाली राजपूती विरासत से जोड़ पा रहे हैं?"


वर्तमान पवार गोत्र (उदाहरण):

  • पंवारो के उपनाम

    • पवार (७२ कुल) :

    1.      गिरहारे/गिरारे

    2.      पराड़कर/ परिहार/

    3.      खरपुसे, (केवल छिंदवाड़ा)

    4.      बड़नगरे/ नागरे/ बन्नागरे

    5.      घाघरे,

    6.      छेरके, शेरके (छिंदवाड़ा)

    7.      कडवे

    8.      पाठे, पाठा / पाठेकर

    9.      डोंगरदिये/ डोंगरे

    10.  धारफोड/ धारपूरे

    11.  चौधरी,

    12.  माटे/माटेकर

    13.  फरकाड़े

    14.  गाडगे

    15.  ढोटे/धोटे

    16.  देशमुख,

    17.  खौसी/खावसी/कौशिक/खवसी/खवसे

    18.  डिगरसे/दिगरसे/ दिग्रसे

    19.  भादे/भादेकर

    20.  बारंगा/ बारंगे

    21.  राऊत,

    22.  काटोले/गघड़े/गद्रे

    23.  दुखी/दूर्वे

    24.  किंकर/किनकर

    25.  रबडे,

    26.  कसाई/कसलीकर,

    27.  मनमाडे/मानमुडे

    28.  सवाई,

    29.  गोरे,

    30.  डाला/डहारे

    31.  उकार/ओमकार

    32.  उघडे,

    33.  करदाते/दाते

    34.  करंजकर/किरंजकर

    35.  कामडी,

    36.  कालभूत/कालभोर,

    37.  कोडले/कोरडे

    38.  हिंगवे /हिंगवा

    39.  खपरिये/ खपरे,

    40.  गाडरे,

    41.  गाकरे/गाखरे

    42.  गोहिते/गोहते

    43.  चिकाने,

    44.  चोपडे,

    45.  टोपलें,

    46.  ढोले,

    47.  ढोबले/ढोबारे

    48.  डंढारे,

    49.  देवासे,

    50.  ढोंडी

    51.  नाडीतोड,

    52.  पठाडे,

    53.  पिंजारे/ पिंजरकर

    54.  बरखाडे,

    55.  बिरगाडे,

    56.  बारबोहरे,

    57.  गोंनदिया

    58.  बैगने,

    59.  बोबडे,

    60.  भोभटकर

    61.  बुवाड़े/बोवाड़े

    62.  ठवरी

    63.  मुने/मुन्ने

    64.  रमधम

    65.  ठुस्सी

    66.  रोडले

    67.  लबाड,

    68.  लाडके,

    69.  लोखंडे,

    70.  सवाई,

    71.  सरोदे

    72.  हजारे

    other

    73.  Bisen (in Chhindwada)




    • कुछ लोग अपने उपनाम की जगह पंवार या पवार भी लगााते है।

    ( पंवारो के यह ७२ उपनाम राजपूत सैनिक सरदारों के नाम/पदनाम/पदवी/संकेतित नाम है )


कुलों की इस संगठित संरचना ने उन्हें नए क्षेत्रों में एक नई सामाजिक और आर्थिक शक्ति के रूप में स्थापित किया।

इस विरासत के तीन सबसे महत्वपूर्ण स्तंभों को सदैव स्मरण रखें:

  • अग्निवंशी क्षत्रिय गौरव: 2,500 ईसा पूर्व से निरंतर चली आ रही प्राचीन वंशावली।
  • 72 कुलों की एकता: विभिन्न राजपूत शाखाओं का एक संगठित और अटूट महासंघ।
  • अनुकूलन की क्षमता: समय के अनुसार स्वयं को योद्धा से कुशल भूमि स्वामी (जमींदार) के रूप में सफलतापूर्वक परिवर्तित करना।

यह इतिहास केवल बीते हुए कल की कथा नहीं है, बल्कि आपकी पहचान और भविष्य की एकता का आधार है। अपनी जड़ों को जानें, ताकि आप एक मजबूत भविष्य का निर्माण कर सकें।

भोयर समाज के इतिहास, वंशावली, भाषा, संस्कृति एवं सामाजिक दस्तावेजीकरण के लिए समर्पित


About the Authors

Shivani Pawar

Researcher – Bhoyari / Pawari Language, Folk Culture and Satpuda Regional Studies
Co-Editor, Writer & Contributor – Maa Tapti Shodh Sansthan, Multai, Betul & Pawari Shodh Patrika

Shivani Pawar works on the documentation and preservation of the Pawari/Bhoyari language, Pawari folk songs, and oral traditions of the Bhoyar Pawar community. Her research focuses on the cultural heritage of the Satpuda region, including Betul traditions, and the historical connections of Pawar lineage with Malwa and Rajputana.

📧 Email: barkhede.shivani@gmail.com


Rajesh Barange Pawar

Independent Researcher | Bhoyari / Pawari Language Researcher | Pawar Community History | Rajasthan–Malwa–Satpuda Regional Studies
Founder & Director – Maa Tapti Shodh Sansthan, Multai, Betul
Chief Editor – Pawari Shodh Patrika

Rajesh Barange Pawar researches the Bhoyari/Pawari language, Pawar community history, the 72 gotras of the Pawar community, and the cultural traditions of the Satpuda region. His work explores the historical connections between the Pawar (Parmar/Panwar) lineage of Malwa and Rajputana and their migration and settlement in Betul and surrounding Satpuda regions, including traditions associated with Maa Tapti.

🌐 Blog: https://rajeshbarange.blogspot.com/
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