देवगढ़ क्षेत्र में भोयर पंवारों की ऐतिहासिक उपस्थिति का प्रमाण (1827)
प्रस्तावना
मध्य भारत के इतिहास में भोयर पंवार समुदाय की उत्पत्ति, प्रवास और बसावट को लेकर अनेक ऐतिहासिक स्रोत उपलब्ध हैं। इन स्रोतों में 1827 ई. में रिचर्ड जेनकिंस द्वारा प्रस्तुत Report on the Territories of the Rajah of Nagpore विशेष महत्व रखती है। इस रिपोर्ट में देवगढ़ राज्य के कृषक वर्गों का वर्णन करते हुए पंवारों का उल्लेख किया गया है, जिनके बारे में कहा गया है कि उनके पूर्वज औरंगज़ेब के शासनकाल में मालवा के धार क्षेत्र से निष्कासित किए गए थे।
यह उल्लेख भोयर पंवार समुदाय के इतिहास के अध्ययन के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है, क्योंकि यह उनके पारंपरिक प्रवास-वृत्तांत और बाद के जनगणना अभिलेखों से मेल खाता दिखाई देता है।
रिचर्ड जेनकिंस (1827) का विवरण
जेनकिंस, रिचर्ड (1827), Report on the Territories of the Rajah of Nagpore में उल्लेख मिलता है:
“सभी कृषक वर्ग मराठा विजय से पहले ही देवगढ़ राज्य में स्थापित थे। क्षत्रिय कृषकों के चार वर्ग मूलतः हिंदुस्तान से बख्त बुलंद के शासनकाल में आए थे। इनमें सबसे अधिक संख्या लोधियों की थी, जिनकी बड़ी आबादी वैंगंगा के आसपास के जिलों में बसी हुई थी। एक अन्य वर्ग पंवारों का था, जो इसी क्षेत्र में स्थापित था। उनका कहना था कि उनके पूर्वज औरंगज़ेब के शासनकाल में मालवा के धार से निष्कासित कर दिए गए थे।”
यहाँ उल्लिखित “पोवार” वास्तव में भोयर पंवार हैं, न कि वैंगंगा पंवार। इसके समर्थन में निम्नलिखित तर्क प्रस्तुत किए जा सकते हैं।
कारण 1 : देवगढ़ एवं छिंदवाड़ा क्षेत्र में भोयर पंवारों की ऐतिहासिक उपस्थिति
छिंदवाड़ा क्षेत्र अथवा देवगढ़ के आसपास वैंगंगा पंवारों की आबादी लगभग नगण्य थी, जबकि भोयर पंवार बड़ी संख्या में पूरे छिंदवाड़ा क्षेत्र तथा देवगढ़ के आसपास निवास करते थे।
आज भी इस क्षेत्र के अनेक गाँवों में भोयर पंवार समुदाय की बस्तियाँ विद्यमान हैं। इसलिए जेनकिंस द्वारा वर्णित पंवारों की पहचान भोयर पंवारों से अधिक मेल खाती है।
कारण 2 : धार (मालवा) से निष्कासन की परंपरा
उक्त विवरण में यह उल्लेख है कि पंवारों के पूर्वजों को औरंगज़ेब के शासनकाल में मालवा के धार से निष्कासित किया गया था।
यह परंपरा भोयर पंवारों से मेल खाती है, क्योंकि पुराने जनगणना अभिलेखों में भी यह उल्लेख मिलता है कि भोयर पंवारों को औरंगज़ेब के समय धार (मालवा) से निष्कासित किया गया था।
इसके विपरीत, वैंगंगा पंवारों के संबंध में यह वर्णित है कि उन्हें गोंड राजाओं द्वारा सैनिक सेवा के लिए आमंत्रित किया गया था। उनका प्रारम्भिक निवास रामटेक के निकट नागरधन किले में था, जहाँ से वे आगे चलकर वैंगंगा घाटी तथा उससे जुड़े क्षेत्रों में फैल गए। उनका देवगढ़ क्षेत्र से प्रत्यक्ष संबंध नहीं बताया जाता।
कारण 3 : जनसंख्या संबंधी संकेत
जेनकिंस के विवरण में पंवारों की जनसंख्या को लोधी जाति से कम बताया गया है।
यह स्थिति तभी संभव प्रतीत होती है जब यहाँ भोयर पंवारों का उल्लेख हो, क्योंकि यदि संदर्भ वैंगंगा पंवारों का होता तो उनकी संख्या स्वाभाविक रूप से लोधियों से अधिक होती।
आज भी अनेक क्षेत्रों में वैंगंगा पंवारों की जनसंख्या लोधियों की तुलना में अधिक पाई जाती है। इसलिए यह संकेत भी भोयर पंवारों की ओर अधिक इंगित करता है।
कारण 4 : भौगोलिक निकटता और बसावट का तर्क
बालाघाट, सिवनी, भंडारा और गोंदिया क्षेत्र देवगढ़ से लगभग 200 किलोमीटर की दूरी पर स्थित हैं, जबकि मुलताई, पांढुर्णा और सौंसर केवल लगभग 50 किलोमीटर दूर हैं।
इसलिए यह अधिक तर्कसंगत प्रतीत होता है कि उक्त पंवार निकटवर्ती मुलताई, पांढुर्णा और सौंसर क्षेत्रों में बसे हुए थे।
संभावना है कि बैतूल के निकट स्थित भंवरगढ़ (भोयरगढ़) दुर्ग के आसपास प्रारम्भिक बसावट के कारण स्थानीय लोगों ने उन्हें आगे चलकर “भोयर पंवार” के नाम से संबोधित करना प्रारम्भ किया।
कारण 5 : कृषक समुदाय के रूप में पहचान
बैतूल, छिंदवाड़ा, पांढुर्णा और वर्धा क्षेत्रों में बसने के बाद भोयर पंवारों ने कृषि को अपना प्रमुख व्यवसाय बना लिया।
परिणामस्वरूप उन्हें परंपरागत रूप से एक कुशल कृषक समुदाय के रूप में जाना गया, जो स्वयं को धारनगरी (धार) के पंवार राजपूतों का वंशज मानता है।
दूसरी ओर, वैंगंगा पंवार भी स्वयं को पंवार राजपूतों की संतति मानते हैं, किन्तु ऐतिहासिक रूप से उनकी पहचान भोयर पंवारों की भाँति मुख्यतः कृषक समुदाय के रूप में नहीं रही।
इसलिए जेनकिंस द्वारा पंवारों को “कृषक वर्ग” के रूप में वर्णित किया जाना भोयर पंवारों के संदर्भ में अधिक उपयुक्त प्रतीत होता है।
निष्कर्ष
भौगोलिक वितरण, प्रवासन परंपराओं, जनगणना अभिलेखों तथा देवगढ़ क्षेत्र में ऐतिहासिक उपस्थिति के आधार पर यह निष्कर्ष अधिक संगत प्रतीत होता है कि जेनकिंस (1827) द्वारा उल्लिखित “पोवार” वास्तव में भोयर पंवार थे, न कि वैंगंगा पंवार।
उनके पूर्वजों को औरंगज़ेब के शासनकाल में मालवा के धार से निष्कासित किए जाने का उल्लेख भोयर पंवारों की पारंपरिक उत्पत्ति-कथा से निकटता से मेल खाता है, जिसका उल्लेख पुराने जनगणना अभिलेखों में भी मिलता है।
इसके विपरीत, वैंगंगा पंवारों को गोंड शासकों द्वारा सैनिक सेवा के लिए आमंत्रित किया गया था और उनका प्रारम्भिक निवास रामटेक के निकट नागरधन दुर्ग में माना जाता है।
इसके अतिरिक्त, देवगढ़ के आसपास के क्षेत्रों में ऐतिहासिक रूप से भोयर पंवारों की उपस्थिति पाई जाती है, जबकि वैंगंगा पंवारों का मुख्य संकेंद्रण पूर्व दिशा में वैंगंगा घाटी में रहा है।
उपलब्ध सभी साक्ष्यों को एक साथ देखने पर यह प्रबल संभावना व्यक्त की जा सकती है कि उक्त विवरण में जिन “पंवारों” का उल्लेख किया गया है, वे भोयर पंवार ही थे।
संदर्भ
Jenkins, Richard. (1827). Report on the Territories of the Rajah of Nagpore.
Central Provinces Census, 1872, Serial No. 38.
Sherring, M. A. (1879). Hindu Tribes and Castes, Vol. II, p. 93.
Russell, R. V., & Hira Lal. (1916). The Tribes and Castes of the Central Provinces of India (Vols. I–IV). London: Macmillan & Co.
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Central Provinces District Gazetteer: Betul District.
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Settlement Report of the Chhindwara District. Central Provinces Administration.
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