पवार/पंवार समुदाय के गौरवशाली इतिहास और गोत्रों के पीछे छिपे 5 चौंकाने वाले तथ्य
अपनी जड़ों और वंशावली को समझना केवल अतीत का स्मरण नहीं है, बल्कि अपनी सामाजिक और सांस्कृतिक पहचान को परिभाषित करने का एक बौद्धिक प्रयास है। मध्य भारत के सतपुड़ा और विदर्भ क्षेत्रों—विशेषकर बैतूल, छिंदवाड़ा और वर्धा जिलों—में निवास करने वाला पवार/पंवार समुदाय एक ऐसी ही समृद्ध विरासत का स्वामी है। राजेश बारंगे पंवार (Rajesh Barange Pawar) के बहुविषयक शोध (Multidisciplinary Research) पर आधारित यह लेख, ऐतिहासिक स्रोतों, भाषाई विश्लेषण और वंशावली डेटा के माध्यम से इस समुदाय के उन तथ्यों को उजागर करता है जो वर्षों से भ्रांतियों के घेरे में रहे हैं। एक सांस्कृतिक इतिहासकार के रूप में, मेरा उद्देश्य इस गौरवशाली वंशावली के वैज्ञानिक और ऐतिहासिक स्वरूप को समाज के सम्मुख रखना है।
1. 72 क्षत्रिय कुलों का परिसंघ—एक अद्वितीय राजपूती विरासत
पंवार समुदाय का उदय केवल एक वंश से नहीं, बल्कि क्षत्रिय कुलों के एक शक्तिशाली 'परिसंघ' (Confederacy) से हुआ है। शोध के अनुसार, इस समुदाय की जड़ें हिंदू वैदिक वर्ण व्यवस्था के क्षत्रिय वर्ण में निहित हैं और इनकी वंशावली सामान्य युग (BCE) से लगभग 2,500 वर्ष पहले की 'अग्निवंश' शाखा से जुड़ी है।
यह समझना महत्वपूर्ण है कि आधुनिक 'पंवार' पहचान वास्तव में 72 विभिन्न राजपूत शाखाओं का एक संगठित स्वरूप है। इनमें परिहार, परमार, सोलंकी, चौहान, राठौड़, कुशवाहा, गहलोत, बड़गूजर, डांगी, गौर, भट्टी, झाला, तंवर और तोमर जैसे प्रतापी राजपूत वंश शामिल हैं। मालवा के परमार राजवंश के दौरान, ये योद्धा सैन्य प्रमुख और सेनापति के रूप में प्रतिष्ठित थे, जिन्होंने साम्राज्य की सीमाओं और प्रतिष्ठा को अक्षुण्ण रखा।
2. पलायन की महागाथा—मालवा से सतपुड़ा तक का सामरिक सफर
पंवार समुदाय का इतिहास वीरता के साथ-साथ संघर्ष और अनुकूलन की एक असाधारण गाथा है। इनके विस्थापन का मुख्य कारण बाहरी आक्रमण थे:
- प्रथम चरण (1305 ई.): सुल्तान अलाउद्दीन खिलजी से पराजित होने के बाद, इन राजपूत योद्धाओं को धारानगरी (धार) छोड़कर पूर्वी मालवा (शाजापुर, शुजालपुर, सीहोर और देवास) में शरण लेनी पड़ी।
- द्वितीय चरण (15वीं से 17वीं शताब्दी): औरंगजेब के आक्रमणों के दौरान, यह 72 सैन्य प्रमुखों का समूह नर्मदा नदी पार कर सतपुड़ा के दुर्गम अंचलों में पहुंचा। ऐतिहासिक प्रमाण बताते हैं कि ये योद्धा पहले भी 'सैनिक अभियानों' (Sainik Expeditions) के दौरान इस क्षेत्र से परिचित थे, इसलिए उन्होंने बैतूल, छिंदवाड़ा और वर्धा जैसे क्षेत्रों को अपने नए निवास के रूप में चुना। यहाँ वे योद्धाओं से कुशल किसान और जमींदार के रूप में परिवर्तित हुए।
3. 72 गोत्रों का अनुक्रम—वंशानुगत वर्गीकरण और भ्रांतियों का अंत
पंवार समुदाय के गोत्रों की संख्या को लेकर सामाजिक स्तर पर व्यापक भ्रम फैलाया गया है। कुछ लोग इनकी संख्या 90 से 100 के बीच बताते हैं, लेकिन राजेश बारंगे पंवार का शोध और प्राचीन वंशावली लेखक मदनसिंह जी मोरसिंह बरवाजी के प्रमाण स्पष्ट करते हैं कि समुदाय में केवल 72 गोत्र (कुल) हैं।
ऐतिहासिक दृष्टि से इन 72 गोत्रों को चार प्रमुख वंशों में वर्गीकृत किया गया है:
- अग्निवंश:
- सूर्यवंश:
- चंद्रवंश:
- ऋषिवंश:
राजेश बारंगे पंवार का शोध स्पष्ट करता है कि गोत्रों की संख्या में कृत्रिम वृद्धि का कारण "भाषाई पर्याय" हैं। अन्य जातियों के कुछ लोगों द्वारा जानबूझकर फैलाए गए भ्रामक प्रचार और समान गोत्रों को अलग-अलग गिनने के कारण यह संख्या 100 तक पहुँच गई, जिससे समाज में अनावश्यक विभाजन पैदा हुआ। समुदाय आज भी इन 72 कुलों के भीतर 'सगोत्र विवाह निषेध' (Endogamy) के कड़े नियमों का पालन कर अपनी विशिष्ट पहचान बनाए हुए है।
Barange/Baranga, Bagwan, Baingane, Barkhede, Barbuhare, Badnagre/Bannagre/Nagre, Bhade/Bhadekar, Bhobhat, Bobde/Bobade, Buwade/Bowade, Birgade, Chopde/Chopda/Chopra, Chaudhary, Chikane/Chiknya, Dandare/Dhandare, Dala/Dahare, Dewase, Deshmukh, Dharpure, Dhote, Dhondi, Dhoble/Dhobare, Dhole, Digarse/Digrase, Dongardiye/Dongre, Dukhi/Durve, Farkade, Gakhre/Gakre, Gadge/Gagre/Agre, Gadre/Katole, Ghagre/Ghagare, Girhare/Girare, Gondiya, Gohite/Gohate, Gore, Hajare, Hingwe/Hingwa, Kalbhut/Kalbhor, Kardate, Kadwe/Kadve, Kamdi, Kasai/Kaslikar, Khausi/Kaushik/Khawse, Khapariya/Khapre, Khargosiya/Kharpuse, Kiranjkar/Kirankar, Kinkar, Kodle/Korde, Labde, Lavri, Ladke, Lokhande, Mate/Matekar, Manmode/Manmude, Munne/Mune, Naditod, Pathade, Parihar/Paradkar, Pathe/Patha/Pathekar, Pinjare/Pinjre, Rawat/Raut, Rabde, Ramdham, Rodle, Sarode, Sawai, Sherke/Cherke, Thawri, Thussi, Tople, Ukar/Omkar, Ukadale.
पुष्टि करने वाले ऐतिहासिक स्रोत:
- डॉ. ज्ञानेश्वर टेम्भरे (2014) - 'पावारी ज्ञानदीप'
- वल्लभ डोंगरे (2013) - 'सीखो सबक पंवारों'
- पन्नालाल बिसेन (1986) - 'भोजपत्र'
4. भाषाई संक्रमण और उपनामों का रूपांतरण
समय और स्थान के परिवर्तन ने मूल राजपूत उपनामों को एक नया भाषाई स्वरूप प्रदान किया है। मालवा से सतपुड़ा और विदर्भ की ओर प्रवास के दौरान, स्थानीय बोलियों के प्रभाव से मूल संज्ञाओं के उच्चारण बदल गए।
- परिहार का उच्चारण बदलकर पराडकर हो गया।
एक विशेषज्ञ के रूप में यह मेरा विश्लेषण है कि ये परिवर्तन भाषाई 'अपभ्रंश' मात्र हैं, न कि नए गोत्रों का उदय। इन विसंगतियों को पहचानना ही समाज की ऐतिहासिक एकता को पुनर्स्थापित करने की पहली सीढ़ी है।
5. 'भोयर' पहचान का रहस्य—भोरगढ़ किले का ऐतिहासिक गौरव
वर्धा और उसके निकटवर्ती क्षेत्रों में प्रचलित 'भोयर पंवार' या 'भोयर' शब्द को लेकर अक्सर जिज्ञासा रहती है। ऐतिहासिक तथ्यों के अनुसार, जब यह समुदाय मालवा से विस्थापित होकर वर्धा पहुँचा, तो उनका प्रथम निवास 'भोरगढ़ किला' (Bhorgarh Fort) था।
भोरगढ़ में बसने के कारण ही इस शाखा को 'भोयर' की पहचान मिली। यद्यपि 20वीं शताब्दी के प्रारंभ में इस वर्ग ने पुनः अपने मूल 'पवार' नाम की ओर लौटने के संगठित प्रयास किए, किंतु 'भोयर' शब्द आज भी उनके प्रथम पड़ाव और जुझारू संघर्ष की याद दिलाता है। यह नाम केवल एक जाति सूचक शब्द नहीं, बल्कि भोरगढ़ की मिट्टी से जुड़ा एक भावनात्मक गौरव है।
निष्कर्ष: विरासत का सम्मान और भविष्य की दृष्टि
पंवार समुदाय का इतिहास केवल युद्धों और पलायन की कहानी नहीं है, बल्कि यह एक 'क्षत्रिय परिसंघ' द्वारा अपनी संस्कृति और वंशावली को संरक्षित करने का प्रमाण है। राजेश बारंगे पंवार का शोध हमें सिखाता है कि सामाजिक एकता के लिए सटीक ऐतिहासिक स्रोतों पर निर्भर रहना कितना अनिवार्य है। जब हम अपनी जड़ों को वैज्ञानिक दृष्टिकोण से पहचानते हैं, तभी हम भ्रांतियों के कुहासे को हटा पाते हैं।
आज की युवा पीढ़ी के लिए मेरा एक विचारोत्तेजक प्रश्न है: "क्या हम अपनी वंशावली के इन भाषाई और ऐतिहासिक परिवर्तनों को गहराई से समझकर अपनी आने वाली पीढ़ियों को उनकी वास्तविक जड़ों और गौरवशाली राजपूती विरासत से जोड़ पा रहे हैं?"

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