पवार समुदाय का समृद्ध इतिहास: उद्भव, वीरता और विरासत की एक यात्रा
नमस्ते प्रिय विद्यार्थियों! एक ऐतिहासिक विरासत विशेषज्ञ के रूप में, आज मैं आपको भारत के एक अत्यंत स्वाभिमानी और साहसी समुदाय—पवार समुदाय—की गौरवशाली यात्रा पर ले चलूँगा। यह केवल एक वंशावली का अध्ययन नहीं है, बल्कि यह समय के साथ स्वयं को ढालने, अपने शौर्य को संरक्षित करने और अपनी जड़ों से अटूट प्रेम करने की एक जीवंत गाथा है।
1. परिचय: पवार समुदाय की पहचान और जड़ें
पवार समुदाय, जिसे विभिन्न भौगोलिक क्षेत्रों में पवार, पंवार, भोयर या भोयर पवार जैसे नामों से संबोधित किया जाता है, अपनी उत्पत्ति हिंदू वैदिक वर्ण व्यवस्था के क्षत्रिय वर्ण से मानता है। ऐतिहासिक साक्ष्यों और वंशावली विशेषज्ञों (भाट/राव) के अनुसार, इनका संबंध क्षत्रियों की 'अग्निवंश' शाखा से है, जिसका अस्तित्व ईसा पूर्व लगभग 2,500 वर्ष पुराना माना जाता है।
ध्यान देने वाली एक महत्वपूर्ण बात यह है कि 'पवार' शब्द का प्रयोग इस समुदाय में दो रूपों में होता है: कुछ परिवारों के लिए यह उनकी जाति की पहचान है, जबकि कई लोग इसे अपने उपनाम (Surname) के रूप में भी गौरव के साथ लगाते हैं।
मध्य भारत के विभिन्न क्षेत्रों में इनकी प्रचलित पहचान को हम इस तालिका के माध्यम से समझ सकते हैं:
क्षेत्र | प्रचलित नाम |
बैतूल और छिंदवाड़ा (मप्र) | क्षत्रिय पवार, पवार, पंवार |
वर्धा और विदर्भ (महाराष्ट्र) | भोयर पवार, भोयर |
सामान्य ऐतिहासिक पहचान | पंवार, अग्निवंशी क्षत्रिय |
इस पहचान की नींव उनके उस गौरवशाली सैन्य इतिहास में छिपी है, जिसने सदियों तक भारत की सीमाओं और संस्कृति की रक्षा की।
2. पूर्वजों की विरासत: परमार राजवंश और सैन्य कौशल
इतिहासकारों का मानना है कि पवारों का अस्तित्व मालवा के प्रसिद्ध परमार राजवंश की शक्ति का मुख्य आधार था। इन्हें केवल एक सामाजिक समूह के रूप में देखना पर्याप्त नहीं होगा; ये मूलतः योद्धा, सैन्य प्रमुख और कुशल सेनापति थे।
इस समुदाय की ऐतिहासिक भूमिका को समझने के लिए हमें इनकी वीरता के प्रभाव का विश्लेषण करना होगा। पवारों के रण-कौशल और सामरिक सूझबूझ ने ही परमार सम्राटों को वह शक्ति प्रदान की, जिससे वे अपने साम्राज्य की सीमाओं को सुरक्षित और विस्तृत कर सके। युद्ध के मैदान में उनकी उपस्थिति ही जीत का विश्वास जगाने के लिए काफी थी। उनकी वीरता केवल युद्धों तक सीमित नहीं थी, बल्कि वे परमार प्रशासन के महत्वपूर्ण स्तंभ थे, जिन्होंने मालवा की प्रतिष्ठा को शिखर पर पहुँचाया।
वीरता की यह राह समय के साथ युद्ध के मैदानों से निकलकर एक नए भौगोलिक गंतव्य की ओर मुड़ गई, जिसका मार्ग संघर्षों ने प्रशस्त किया।
3. महान प्रवास की कहानी: मालवा से सतपुड़ा तक
पवार समुदाय का मालवा से पलायन कोई आकस्मिक घटना नहीं, बल्कि आत्म-सम्मान की रक्षा के लिए किया गया एक दीर्घकालिक प्रवास था। इस यात्रा को हम निम्नलिखित चरणों में देख सकते हैं:
- विदेशी आक्रमण और विस्थापन (1305 ई.): अलाउद्दीन खिलजी द्वारा मालवा विजय के बाद, पवार राजपूतों ने अपनी पहचान सुरक्षित रखने के लिए पूर्वी मालवा (शाजापुर, शुजालपुर, सीहोर और देवास) की ओर प्रस्थान किया।
- पूर्वी मालवा में स्थिरता (300 वर्ष): यहाँ यह समुदाय लगभग तीन शताब्दियों तक रहा। यही वह महत्वपूर्ण समय था जब 72 राजपूत सैन्य प्रमुखों ने एक अत्यंत संगठित 'जाति संघ' (Caste Confederation) का रूप लिया।
- नर्मदा पार और सतपुड़ा आगमन: 17वीं शताब्दी में औरंगजेब के शासनकाल के दौरान हुए आक्रमणों के कारण, यह समुदाय नर्मदा नदी पार कर सतपुड़ा के दुर्गम पहाड़ों (बैतूल, छिंदवाड़ा) और वर्धा के मैदानों में बस गया।
- भौगोलिक परिचय का कारण: विद्यार्थियों, यहाँ एक रोचक तथ्य यह है कि वे इन अनजान क्षेत्रों में क्यों आए? ऐतिहासिक शोध बताते हैं कि अपनी प्रथम सैनिक यात्रा (First Sanik Expedition) के दौरान वे इस भूगोल से पहले ही परिचित हो चुके थे, जिसने उन्हें यहाँ बसने का आत्मविश्वास दिया।
इस प्रवास के दौरान ही उन 72 कुलों का संगठन और अधिक सुदृढ़ हुआ, जो आज इस समुदाय की रीढ़ है।
4. 72 क्षत्रिय कुलों का संघ और गोत्र व्यवस्था
पवार समुदाय की सबसे विशिष्ट पहचान उनका '72 गोत्रों' का अटूट संगठन है। विशेषज्ञों के अनुसार, यह वास्तव में विभिन्न महान क्षत्रिय कुलों का एक 'महासंघ' है, जिसमें परिहार, परमार, सोलंकी, चौहान, राठौर और तोमर जैसे वंश शामिल हैं।
भाषाई बदलाव और भ्रम का निवारण: अक्सर गोत्रों की संख्या को लेकर 80, 90 या 100 तक के भ्रम फैलाए जाते हैं। एक शिक्षक के रूप में मैं स्पष्ट कर दूँ कि यह भ्रम केवल क्षेत्रीय बोलियों के प्रभाव और उच्चारण में आए बदलावों के कारण है। जैसे:
स्त्रोतों के अनुसार, अन्य जातियों के कुछ लोगों ने जानबूझकर इन पर्यायवाची नामों को अलग-अलग गोत्र बताकर समुदाय में विभाजन और भ्रामक जानकारी फैलाने का प्रयास किया। वास्तविकता यही है कि मूल रूप से केवल 72 गोत्र ही प्रमाणित हैं।
वर्तमान पवार गोत्र (उदाहरण):
पंवारो के उपनाम
- पवार (७२ कुल) :
1. गिरहारे/गिरारे
2. पराड़कर/ परिहार/
3. खरपुसे, (केवल छिंदवाड़ा)
4. बड़नगरे/ नागरे/ बन्नागरे
5. घाघरे,
6. छेरके, शेरके (छिंदवाड़ा)
7. कडवे
8. पाठे, पाठा / पाठेकर
9. डोंगरदिये/ डोंगरे
10. धारफोड/ धारपूरे
11. चौधरी,
12. माटे/माटेकर
13. फरकाड़े
14. गाडगे
15. ढोटे/धोटे
16. देशमुख,
17. खौसी/खावसी/कौशिक/खवसी/खवसे
18. डिगरसे/दिगरसे/ दिग्रसे
19. भादे/भादेकर
20. बारंगा/ बारंगे
21. राऊत,
22. काटोले/गघड़े/गद्रे
23. दुखी/दूर्वे
24. किंकर/किनकर
25. रबडे,
26. कसाई/कसलीकर,
27. मनमाडे/मानमुडे
28. सवाई,
29. गोरे,
30. डाला/डहारे
31. उकार/ओमकार
32. उघडे,
33. करदाते/दाते
34. करंजकर/किरंजकर
35. कामडी,
36. कालभूत/कालभोर,
37. कोडले/कोरडे
38. हिंगवे /हिंगवा
39. खपरिये/ खपरे,
40. गाडरे,
41. गाकरे/गाखरे
42. गोहिते/गोहते
43. चिकाने,
44. चोपडे,
45. टोपलें,
46. ढोले,
47. ढोबले/ढोबारे
48. डंढारे,
49. देवासे,
50. ढोंडी
51. नाडीतोड,
52. पठाडे,
53. पिंजारे/ पिंजरकर
54. बरखाडे,
55. बिरगाडे,
56. बारबोहरे,
57. गोंनदिया
58. बैगने,
59. बोबडे,
60. भोभटकर
61. बुवाड़े/बोवाड़े
62. ठवरी
63. मुने/मुन्ने
64. रमधम
65. ठुस्सी
66. रोडले
67. लबाड,
68. लाडके,
69. लोखंडे,
70. सवाई,
71. सरोदे
72. हजारे
other
73. Bisen (in Chhindwada)
- कुछ लोग अपने उपनाम की जगह पंवार या पवार भी लगााते है।
( पंवारो के यह ७२ उपनाम राजपूत सैनिक सरदारों के नाम/पदनाम/पदवी/संकेतित नाम है )
कुलों की इस संगठित संरचना ने उन्हें नए क्षेत्रों में एक नई सामाजिक और आर्थिक शक्ति के रूप में स्थापित किया।
5. जीवन शैली में परिवर्तन: तलवार से हल तक (योद्धा से भूमि स्वामी)
सतपुड़ा और विदर्भ की धरती पर बसने के बाद, इस योद्धा समुदाय ने अपनी ऊर्जा को सृजन की ओर मोड़ा। उन्होंने अपनी संगठित शक्ति और अनुशासन का उपयोग कृषि और भूमि प्रबंधन में किया।
- योद्धा से जमींदार: वे न केवल साहसी सैनिक बने रहे, बल्कि अपनी मेहनत से कुशल किसान और शक्तिशाली जमींदार बनकर उभरे।
- 'भोयर' पहचान का रहस्य: वर्धा क्षेत्र में प्रचलित 'भोयर' नाम उनके प्रथम बसावट स्थल 'भोरगढ़ किले' से उत्पन्न हुआ है। यद्यपि 20वीं शताब्दी के आरंभ में समुदाय ने अपने मूल नाम 'पवार' की ओर लौटने के लिए आंदोलन किए, लेकिन 'भोयर' आज भी उनकी ऐतिहासिक पहचान का एक अभिन्न हिस्सा बना हुआ है।
आज यह समुदाय अपनी क्षत्रिय विरासत को आधुनिक कृषि और उद्यमिता के साथ जोड़कर प्रगति कर रहा है।
6. निष्कर्ष: अपनी जड़ों को समझना
पवार समुदाय का इतिहास हमें सिखाता है कि कठिन परिस्थितियों में भी अपनी एकता और संस्कृति को कैसे जीवित रखा जाता है। मालवा के राजमहलों से सतपुड़ा की कंदराओं तक की यह यात्रा उनके अडिग आत्मविश्वास का प्रतीक है।
विद्यार्थियों, इस विरासत के तीन सबसे महत्वपूर्ण स्तंभों को सदैव स्मरण रखें:
- अग्निवंशी क्षत्रिय गौरव: 2,500 ईसा पूर्व से निरंतर चली आ रही प्राचीन वंशावली।
- 72 कुलों की एकता: विभिन्न राजपूत शाखाओं का एक संगठित और अटूट महासंघ।
- अनुकूलन की क्षमता: समय के अनुसार स्वयं को योद्धा से कुशल भूमि स्वामी (जमींदार) के रूप में सफलतापूर्वक परिवर्तित करना।
यह इतिहास केवल बीते हुए कल की कथा नहीं है, बल्कि आपकी पहचान और भविष्य की एकता का आधार है। अपनी जड़ों को जानें, ताकि आप एक मजबूत भविष्य का निर्माण कर सकें।
About the Authors
Shivani Pawar
Researcher – Bhoyari / Pawari Language, Folk Culture and Satpuda Regional Studies
Co-Editor, Writer & Contributor – Maa Tapti Shodh Sansthan, Multai, Betul & Pawari Shodh Patrika
Shivani Pawar works on the documentation and preservation of the Pawari/Bhoyari language, Pawari folk songs, and oral traditions of the Bhoyar Pawar community. Her research focuses on the cultural heritage of the Satpuda region, including Betul traditions, and the historical connections of Pawar lineage with Malwa and Rajputana.
📧 Email: barkhede.shivani@gmail.com
Rajesh Barange Pawar
Independent Researcher | Bhoyari / Pawari Language Researcher | Pawar Community History | Rajasthan–Malwa–Satpuda Regional Studies
Founder & Director – Maa Tapti Shodh Sansthan, Multai, Betul
Chief Editor – Pawari Shodh Patrika
Rajesh Barange Pawar researches the Bhoyari/Pawari language, Pawar community history, the 72 gotras of the Pawar community, and the cultural traditions of the Satpuda region. His work explores the historical connections between the Pawar (Parmar/Panwar) lineage of Malwa and Rajputana and their migration and settlement in Betul and surrounding Satpuda regions, including traditions associated with Maa Tapti.
🌐 Blog: https://rajeshbarange.blogspot.com/
🌐 Pawari Shodh Patrika: https://sites.google.com/view/pawarishodhpatrika/home
📧 Email: rajeshbarange00@gmail.com

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