परमार राजवंश का ऐतिहासिक उद्भव और मालवा की जड़ें
एक बहुआयामी विश्लेषण
लेखक परिचय (Author Profile)
राजेश बारंगे पंवार
Rajesh Barange Pawar
Chemistry, Pharmacy, History & Linguistics – Independent Researcher
Chief Editor – Pawari Shodh Patrika
Founder – Maa Tapti Shodh Sansthan, Multai
शिवानी पंवार
Shivani Pawar
Pawari writer – Pawari/Bhoyari Language
Independent Researcher – Pawari Bhoyari Studies
Editor – Pawari Shodh Patrika
Editorial Board – Maa Tapti Shodh Sansthan
सारांश (Abstract)
यह शोध आलेख मध्य भारत के 'भोयर पवार' समुदाय के ऐतिहासिक मूल, परमार राजवंश के उद्भव तथा धार (मालवा) क्षेत्र से उनके गहन ऐतिहासिक एवं सांस्कृतिक संबंधों का विश्लेषण प्रस्तुत करता है।
अध्ययन का प्रमुख केंद्र अग्निवंश सिद्धांत का वैज्ञानिक विवेचन, महाराजा भोज के कालखंड की उपलब्धियां, तथा मालवा से सतपुड़ा क्षेत्र की ओर प्रारंभिक प्रवास की ऐतिहासिक प्रक्रिया है।
इस शोध का उद्देश्य समुदाय की वर्तमान भाषाई (पवारी / भोयरी) तथा सामाजिक संरचना को उनके पैतृक क्षेत्र धार नगरी के ऐतिहासिक संदर्भ में पुनः स्थापित करना है।
1. प्रस्तावना (Introduction)
इतिहास केवल बीती घटनाओं का संकलन नहीं है, बल्कि यह उन सांस्कृतिक पदचिह्नों का संग्रह है जो किसी समाज की वर्तमान पहचान को निर्मित करते हैं।
मध्य प्रदेश के
बैतूल, छिंदवाड़ा तथा महाराष्ट्र के वर्धा और नागपुर जिलों में निवासरत भोयर पवार समाज अपनी ऐतिहासिक जड़ों को मालवा के शक्तिशाली परमार राजवंश से जोड़ता है।
शोध की दृष्टि से यह संबंध केवल परंपराओं ( Traditions) तक सीमित नहीं है, बल्कि यह संबंध निम्न तत्वों में भी स्पष्ट रूप से दिखाई देता है:
- भाषाई संरचना
- गोत्र व्यवस्था
- लोकगीत एवं लोकगाथाएँ
- सामाजिक संरचना
परमार वंश का शासन 9वीं से 14वीं शताब्दी तक मध्यकालीन भारतीय इतिहास का वह कालखंड है जिसमें शस्त्र और शास्त्र का अद्भुत संगम देखने को मिलता है।
प्रस्तुत शोध पत्र इसी गौरवशाली अतीत की उन ऐतिहासिक कड़ियों को जोड़ने का प्रयास है, जो आज के पवार / भोयर पवार समाज की आधारशिला बनीं।
2. परमार वंश की उत्पत्ति
अग्निवंश का वैज्ञानिक एवं प्रतीकात्मक विश्लेषण
भारतीय क्षत्रिय परंपरा में अग्निवंश सिद्धांत अत्यंत महत्वपूर्ण माना जाता है।
पृथ्वीराज रासो,
पद्मगुप्त की नवसाहसांक चरित,
तथा विभिन्न वंशावलियों में परमारों को अग्निकुल क्षत्रिय माना गया है।
2.1 आबू पर्वत का यज्ञीय प्रतीक
पौराणिक कथाओं के अनुसार जब पृथ्वी पर अधर्म और आसुरी शक्तियों का प्रभाव बढ़ गया, तब ऋषि वशिष्ठ ने आबू पर्वत (अर्बुद पर्वत) पर एक महान यज्ञ का आयोजन किया।
इस यज्ञ की अग्नि से चार महान क्षत्रिय वंश उत्पन्न हुए—
- प्रतिहार
- चालुक्य (सोलंकी)
- चौहान
- परमार
इन चारों वंशों को सामूहिक रूप से अग्निवंशी क्षत्रिय कहा गया।
2.2 स्वतंत्र शोधकर्ता का दृष्टिकोण
(Scientific Interpretation)
एक स्वतंत्र शोधकर्ता के रूप में राजेश बारंगे पंवार ने अपने शोध लेखों में यह प्रतिपादित किया है कि अग्नि से उत्पत्ति का सिद्धांत वास्तव में एक प्रकार की सामाजिक पुनर्गठन प्रक्रिया (Social Re-engineering) का प्रतीक हो सकता है।
संभावना है कि उस समय विभिन्न , राजपुत वंश के योद्धा समूहों को एक संगठित क्षत्रिय व्यवस्था में सम्मिलित करने के लिए इस प्रकार की पौराणिक संरचना विकसित की गई।
“परमार” शब्द का भाषाई विश्लेषण भी इस बात की पुष्टि करता है:
- पर = शत्रु
- मार = नाश करने वाला
अर्थात
“परमार = शत्रु का संहार करने वाला”
यह केवल एक सैन्य पहचान नहीं थी बल्कि एक सांस्कृतिक शुद्धिकरण और सामाजिक संगठन का प्रतीक भी थी, जिसने बिखरे हुए योद्धा समूहों को एक वंश और एक लक्ष्य में संगठित किया।
3. धार नगरी (Dhara Nagari)
शिक्षा, शिल्प और शौर्य का केंद्र
परमार वंश ने अपने शासन का केंद्र मालवा क्षेत्र को बनाया।
प्रारंभ में उज्जैन उनकी शक्ति का प्रमुख केंद्र था, परंतु बाद में धार को राजधानी बनाया गया, जिसे इतिहास में धारा नगरी कहा गया।
3.1 ऐतिहासिक और सामरिक महत्व
धार नगरी का चयन परमारों की रणनीतिक दूरदर्शिता का प्रमाण था।
यह क्षेत्र
- उपजाऊ भूमि से समृद्ध था
- व्यापार मार्गों के निकट था
- विंध्य और सतपुड़ा के प्रवेश द्वार के रूप में कार्य करता था
आज भी भोयर पवार समाज के विवाह और संस्कार गीतों में “धार के पवार” शब्द अत्यंत गौरव के साथ प्रयुक्त होता है।
यह तथ्य इस बात का संकेत देता है कि भौगोलिक दूरी के बावजूद धार नगरी आज भी सामूहिक स्मृति में जीवित है।
4. महाराजा भोज
एक ‘पॉलीमैथ’ सम्राट और शोध की परंपरा
परमार वंश के सबसे महान शासकों में महाराजा भोज (1010–1055 ई.) का नाम अत्यंत सम्मान से लिया जाता है।
वे केवल एक योद्धा राजा नहीं थे बल्कि एक
- वैज्ञानिक
- वास्तुकार
- भाषाविद्
- साहित्यकार
भी थे।
4.1 शोध ग्रंथों का वैज्ञानिक विश्लेषण
महाराजा भोज द्वारा लगभग 84 ग्रंथों की रचना का उल्लेख मिलता है।
विशेष रूप से निम्न ग्रंथ अत्यंत महत्वपूर्ण हैं:
आयुर्वेद सर्वस्व
इस ग्रंथ में जड़ी-बूटियों के गुण तथा उनके औषधीय उपयोगों का विस्तृत विवरण मिलता है।
यह ग्रंथ आज भी फार्मेसी और आयुर्वेदिक चिकित्सा अध्ययन के लिए महत्वपूर्ण स्रोत माना जाता है।
समरांगण सूत्रधार
यह ग्रंथ प्राचीन भारतीय वास्तुकला (Civil Engineering) और यांत्रिक विज्ञान (Mechanics) का अद्भुत उदाहरण है।
इसमें विभिन्न प्रकार के यंत्रों और भवन निर्माण तकनीकों का वर्णन मिलता है।
सरस्वती कंठाभरण
यह ग्रंथ व्याकरण और काव्यशास्त्र का महान ग्रंथ है।
यह सिद्ध करता है कि परमार काल में भाषाविज्ञान (Linguistics) अत्यंत उच्च स्तर पर विकसित था।
4.2 भोजशाला
प्राचीन भारत का “रिसर्च सेंटर”
धार स्थित भोजशाला केवल एक मंदिर या पाठशाला नहीं थी।
यह वास्तव में उस काल का एक शैक्षणिक एवं शोध केंद्र था।
यहाँ देशभर के विद्वान
- खगोल विज्ञान
- गणित
- साहित्य
- दर्शन
पर अध्ययन और शोध करने आते थे।
शिवानी पंवार के शोध लेखों के अनुसार पवार समाज में शिक्षा के प्रति जो स्वाभाविक झुकाव आज दिखाई देता है, वह संभवतः उसी भोजशाला परंपरा की ऐतिहासिक विरासत का परिणाम है।
5. सामाजिक संरचना और कृषि अभियांत्रिकी
(Agri-Engineering)
परमार काल का समाज केवल युद्धप्रिय नहीं था बल्कि वह एक उत्पादक और संगठित समाज भी था।
5.1 जल प्रबंधन (Hydrology)
भोपाल का विशाल भोज ताल (बड़ा तालाब) महाराजा भोज की इंजीनियरिंग क्षमता का उत्कृष्ट उदाहरण है।
इतने बड़े जलाशय का निर्माण उस समय
- सिंचाई
- जल संरक्षण
- कृषि विकास
के उद्देश्य से किया गया था।
आज का भोयर पवार समाज, जो कृषि कौशल विशेषकर
- कपास
- संतरा
- अनाज उत्पादन
के लिए प्रसिद्ध है, संभवतः अपने पूर्वजों से ही मिट्टी और जल प्रबंधन की तकनीकी समझ विरासत में प्राप्त करता आया है।
6. विस्थापन के प्रारंभिक संकेत
मालवा से सतपुड़ा की ओर
13वीं शताब्दी के उत्तरार्ध से मालवा क्षेत्र पर विदेशी आक्रमणों का दबाव बढ़ने लगा।
विशेष रूप से
- तुर्क आक्रमण
- अलाउद्दीन खिलजी के अभियान
ने मालवा की सामाजिक व्यवस्था को प्रभावित किया।
6.1 सांस्कृतिक अस्मिता की रक्षा
इतिहास के विभिन्न स्रोतों तथा माँ ताप्ती शोध संस्थान के अभिलेखों के अनुसार पवारों के एक वर्ग ने अपनी सांस्कृतिक और धार्मिक पहचान की रक्षा के लिए दुर्गम क्षेत्रों की ओर प्रस्थान किया।
यह प्रवास वास्तव में
“अस्मिता की रक्षा का संघर्ष”
था।
मालवा से निकलने के बाद इन योद्धाओं ने सतपुड़ा क्षेत्र के भंवरगढ़ किले फिर मुल्ताई को अपना नया केंद्र बनाया।
यहीं से प्रारंभ हुई
“पवार से भोयर पवार”
बनने की ऐतिहासिक यात्रा।
7. भाषा विज्ञान (Linguistics)
मालवी और पवारी का सेतु
स्वतंत्र भाषा शोधकर्ताओं राजेश बारंगे पंवार एवं शिवानी पंवार के अनुसार पवारी / भोयरी बोली में मालवा क्षेत्र की प्राचीन भाषाई परंपराओं के अनेक अवशेष आज भी सुरक्षित हैं।
ध्वन्यात्मक संरचना
पवारी की ध्वन्यात्मक संरचना आज भी
- प्राकृत
- अपभ्रंश
की उस परंपरा के निकट दिखाई देती है जो परमार कालीन मालवा में प्रचलित थी।
यह भाषाई निरंतरता इस शोध को मजबूत आधार प्रदान करती है कि
पवार, / भोयर पवार समाज की ऐतिहासिक जड़ें धार-मालवा राजस्थान से जुड़ी हुई हैं।
8. निष्कर्ष (Conclusion)
परमार राजवंश का इतिहास केवल अतीत का गौरव नहीं बल्कि समाज की भविष्य की बौद्धिक दिशा का आधार भी है।
महाराजा भोज की ज्ञान परंपरा,
धार का सांस्कृतिक वैभव,
और अग्निवंश की संघर्षशील परंपरा —
ये तीनों तत्व मिलकर भोयर पवार समाज की ऐतिहासिक पहचान को निर्मित करते हैं।
आज भले ही इस समाज के लोग
- बैतूल
- छिंदवाड़ा
- वर्धा
में हों, लेकिन इसकी ऐतिहासिक जड़ें आज भी धार नगरी और राजस्थान की पवित्र भूमि में गहराई से जुड़ी हुई हैं।
संदर्भ एवं ग्रंथ सूची
(References & Bibliography)
-
बारंगे, राजेश पंवार
भोयर पवार समाज: एक ऐतिहासिक और सांस्कृतिक शोध यात्रा
माँ ताप्ती शोध संस्थान प्रकाशन, मुलताई। -
ठाकुर, उपेंद्र
History of Parmar Dynasty
दिल्ली यूनिवर्सिटी प्रेस। -
पवार, शिवानी
“पवारी लोक संस्कृति में मालवा के अवशेष”
पावारी शोध पत्रिका, अंक 07। -
G.A. Grierson
Linguistic Survey of India (Vol. IX) -
District Gazetteer
Betul, Chhindwara, Wardha, Dhar.
कॉपीराइट सूचना
यह आलेख माँ ताप्ती शोध संस्थान, मुलताई तथा पवारी शोध पत्रिका के सौजन्य से शोध उद्देश्यों हेतु प्रकाशित है।
वर्तमान पवार गोत्र (उदाहरण):
पंवारो के उपनाम
- पवार (७२ कुल) :
1. गिरहारे/गिरारे
2. पराड़कर/ परिहार/
3. खरपुसे, (केवल छिंदवाड़ा)
4. बड़नगरे/ नागरे/ बन्नागरे
5. घाघरे,
6. छेरके, शेरके (छिंदवाड़ा)
7. कडवे
8. पाठे, पाठा / पाठेकर
9. डोंगरदिये/ डोंगरे
10. धारफोड/ धारपूरे
11. चौधरी,
12. माटे/माटेकर
13. फरकाड़े
14. गाडगे
15. ढोटे/धोटे
16. देशमुख,
17. खौसी/खावसी/कौशिक/खवसी/खवसे
18. डिगरसे/दिगरसे/ दिग्रसे
19. भादे/भादेकर
20. बारंगा/ बारंगे
21. राऊत,
22. काटोले/गघड़े/गद्रे
23. दुखी/दूर्वे
24. किंकर/किनकर
25. रबडे,
26. कसाई/कसलीकर,
27. मनमाडे/मानमुडे
28. सवाई,
29. गोरे,
30. डाला/डहारे
31. उकार/ओमकार
32. उघडे,
33. करदाते/दाते
34. करंजकर/किरंजकर
35. कामडी,
36. कालभूत/कालभोर,
37. कोडले/कोरडे
38. हिंगवे /हिंगवा
39. खपरिये/ खपरे,
40. गाडरे,
41. गाकरे/गाखरे
42. गोहिते/गोहते
43. चिकाने,
44. चोपडे,
45. टोपलें,
46. ढोले,
47. ढोबले/ढोबारे
48. डंढारे,
49. देवासे,
50. ढोंडी
51. नाडीतोड,
52. पठाडे,
53. पिंजारे/ पिंजरकर
54. बरखाडे,
55. बिरगाडे,
56. बारबोहरे,
57. गोंनदिया
58. बैगने,
59. बोबडे,
60. भोभटकर
61. बुवाड़े/बोवाड़े
62. ठवरी
63. मुने/मुन्ने
64. रमधम
65. ठुस्सी
66. रोडले
67. लबाड,
68. लाडके,
69. लोखंडे,
70. सवाई,
71. सरोदे
72. हजारे
other
73. Bisen (in Chhindwada)
- कुछ लोग अपने उपनाम की जगह पंवार या पवार भी लगााते है।
( पंवारो के यह ७२ उपनाम राजपूत सैनिक सरदारों के नाम/पदनाम/पदवी/संकेतित नाम है )
कुलों की इस संगठित संरचना ने उन्हें नए क्षेत्रों में एक नई सामाजिक और आर्थिक शक्ति के रूप में स्थापित किया।
5. जीवन शैली में परिवर्तन: तलवार से हल तक (योद्धा से भूमि स्वामी)
सतपुड़ा और विदर्भ की धरती पर बसने के बाद, इस योद्धा समुदाय ने अपनी ऊर्जा को सृजन की ओर मोड़ा। उन्होंने अपनी संगठित शक्ति और अनुशासन का उपयोग कृषि और भूमि प्रबंधन में किया।
- योद्धा से जमींदार: वे न केवल साहसी सैनिक बने रहे, बल्कि अपनी मेहनत से कुशल किसान और शक्तिशाली जमींदार बनकर उभरे।
- 'भोयर' पहचान का रहस्य: वर्धा क्षेत्र में प्रचलित 'भोयर' नाम उनके प्रथम बसावट स्थल 'भोरगढ़ किले' से उत्पन्न हुआ है। यद्यपि 20वीं शताब्दी के आरंभ में समुदाय ने अपने मूल नाम 'पवार' की ओर लौटने के लिए आंदोलन किए, लेकिन 'भोयर' आज भी उनकी ऐतिहासिक पहचान का एक अभिन्न हिस्सा बना हुआ है।
आज यह समुदाय अपनी क्षत्रिय विरासत को आधुनिक कृषि और उद्यमिता के साथ जोड़कर प्रगति कर रहा है।
6. निष्कर्ष: अपनी जड़ों को समझना
पवार समुदाय का इतिहास हमें सिखाता है कि कठिन परिस्थितियों में भी अपनी एकता और संस्कृति को कैसे जीवित रखा जाता है। मालवा के राजमहलों से सतपुड़ा की कंदराओं तक की यह यात्रा उनके अडिग आत्मविश्वास का प्रतीक है।
विद्यार्थियों, इस विरासत के तीन सबसे महत्वपूर्ण स्तंभों को सदैव स्मरण रखें:
- अग्निवंशी क्षत्रिय गौरव: 2,500 ईसा पूर्व से निरंतर चली आ रही प्राचीन वंशावली।
- 72 कुलों की एकता: विभिन्न राजपूत शाखाओं का एक संगठित और अटूट महासंघ।
- अनुकूलन की क्षमता: समय के अनुसार स्वयं को योद्धा से कुशल भूमि स्वामी (जमींदार) के रूप में सफलतापूर्वक परिवर्तित करना।
यह इतिहास केवल बीते हुए कल की कथा नहीं है, बल्कि आपकी पहचान और भविष्य की एकता का आधार है। अपनी जड़ों को जानें, ताकि आप एक मजबूत भविष्य का निर्माण कर सकें।
भोयर समाज के इतिहास, वंशावली, भाषा, संस्कृति एवं सामाजिक दस्तावेजीकरण के लिए समर्पित
About the Authors
Shivani Pawar
Researcher – Bhoyari / Pawari Language, Folk Culture and Satpuda Regional Studies
Co-Editor, Writer & Contributor – Maa Tapti Shodh Sansthan, Multai, Betul & Pawari Shodh Patrika
Shivani Pawar works on the documentation and preservation of the Pawari/Bhoyari language, Pawari folk songs, and oral traditions of the Bhoyar Pawar community. Her research focuses on the cultural heritage of the Satpuda region, including Betul traditions, and the historical connections of Pawar lineage with Malwa and Rajputana.
📧 Email: barkhede.shivani@gmail.com
Rajesh Barange Pawar
Independent Researcher | Bhoyari / Pawari Language Researcher | Pawar Community History | Rajasthan–Malwa–Satpuda Regional Studies
Founder & Director – Maa Tapti Shodh Sansthan, Multai, Betul
Chief Editor – Pawari Shodh Patrika
Rajesh Barange Pawar researches the Bhoyari/Pawari language, Pawar community history, the 72 gotras of the Pawar community, and the cultural traditions of the Satpuda region. His work explores the historical connections between the Pawar (Parmar/Panwar) lineage of Malwa and Rajputana and their migration and settlement in Betul and surrounding Satpuda regions, including traditions associated with Maa Tapti.
🌐 Blog: https://rajeshbarange.blogspot.com/
🌐 Pawari Shodh Patrika: https://sites.google.com/view/pawarishodhpatrika/home
📧 Email: rajeshbarange00@gmail.com
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— पवारी शोध पत्रिका
माँ ताप्ती शोध संस्थान, मुलताई
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