भोयर पवार (क्षत्रिय पवार) समुदाय: औपनिवेशिक दस्तावेजों और ऐतिहासिक यथार्थ का तुलनात्मक विश्लेषण
सार (Abstract) भोयर पवार (क्षत्रिय पवार) समुदाय मध्य भारत (बैतूल, छिंदवाड़ा, वर्धा) का एक प्रमुख सामाजिक समूह है। औपनिवेशिक काल (1900 से पूर्व) के दस्तावेजों में इस समुदाय को अक्सर 'भोयर' नाम से संबोधित किया गया और इनकी उत्पत्ति को लेकर कई भ्रांतियां दर्ज की गईं। हालांकि, आधुनिक शोध और वंशावली साक्ष्यों से यह सिद्ध होता है कि यह समुदाय 72 क्षत्रिय कुलों का एक संघ है जो मुगल काल में मालवा से विस्थापित होकर सतपुड़ा अंचल में बसा। यह आलेख 1900 से पूर्व के दस्तावेजों का विश्लेषण करता है और उपलब्ध शोध स्रोतों के आधार पर उनका औचित्य सिद्ध करता है।
भाग 1: 1900 से पूर्व के दस्तावेजों में उल्लेख (Historical Records Pre-1900)
1900 से पहले के ब्रिटिश और मुगलकालीन दस्तावेजों में इस समुदाय के बारे में निम्नलिखित महत्वपूर्ण जानकारियां मिलती हैं:
1. आइन-ए-अकबरी (16वीं शताब्दी) मुगल बादशाह अकबर के दरबारी अबुल फजल द्वारा लिखित 'आइन-ए-अकबरी' (Vol. II) में गोंड राजा जटबा (देवगढ़) की सैन्य शक्ति का वर्णन मिलता है। इसमें उल्लेख है कि जटबा की सेना में बड़ी संख्या में घुड़सवार और पैदल सैनिक थे। आधुनिक विश्लेषण बताता है कि इस सेना में "पंवार" (Panwar) समुदाय का महत्वपूर्ण योगदान था, जो घुड़सवार सेना (Cavalry) का मुख्य हिस्सा थे,। यह दस्तावेज 1900 से बहुत पहले का है और यह पुष्टि करता है कि पवार समुदाय उस समय एक योद्धा वर्ग के रूप में स्थापित था।
2. रिचर्ड जेनकिन्स की रिपोर्ट (1827) नागपुर के राजा के दरबार में रेजिडेंट रिचर्ड जेनकिन्स ने 1827 में "Report on the Territories of the Raja of Nagpore" प्रस्तुत की। इस रिपोर्ट में लिखा गया है:
"देवगढ़ में मराठा विजय से पहले सभी कृषक वर्ग स्थापित हो चुके थे... क्षत्रिय कृषकों के चार वर्ग बख्त बुलंद के शासनकाल में हिंदुस्तान (उत्तर भारत) से आए थे। इनमें लोधी और पवार (Powars) प्रमुख हैं। पवारों का कहना है कि उनके पूर्वजों को औरंगजेब के शासनकाल में मालवा के धार से निष्कासित किया गया था",। यह दस्तावेज स्पष्ट करता है कि 1827 तक यह समुदाय खुद को मालवा के धार से विस्थापित मानता था।
3. भारत की जनगणना और गजेटियर्स (1891 और 1901) ब्रिटिश कालीन जनगणना रिपोर्ट्स (विशेषकर 1891 और 1901) और सेंट्रल प्रोविंस गजेटियर्स में इस समुदाय के बारे में विस्तृत, लेकिन कई बार भ्रामक, जानकारी दी गई:
- नाम और बोली: 1891 की जनगणना (वॉल्यूम 11) में 'भोयरी' (Bhoyari) को एक बोली के रूप में दर्ज किया गया और इसे पवार जाति की भाषा बताया गया। रिपोर्ट में कहा गया कि यह राजस्थानी हिंदी का एक रूप है जो मालवा से आई है, लेकिन अब इसमें मराठी और स्थानीय शब्दों का मिश्रण है,।
- 'भोयर' शब्द की उत्पत्ति (औपनिवेशिक दृष्टिकोण): 1901 की जनगणना और छिंदवाड़ा गजेटियर में एक कहानी दर्ज है कि जब औरंगजेब ने धार नगरी पर आक्रमण किया, तो पवार राजपूतों ने शहर की रक्षा की। लेकिन वे हार गए और सुबह (भोर) होने पर शहर से भाग निकले, इसलिए अपमानजनक रूप से उन्हें "भोयर" (सुबह भागने वाले) कहा गया।
- सामाजिक स्थिति: ब्रिटिश अधिकारियों ने लिखा कि इन लोगों ने राजपूत रीति-रिवाजों को त्याग दिया है और वे अब साधारण कृषक जातियों (जैसे कुर्मी या कुनबी) की श्रेणी में आते हैं, हालांकि उनके पूर्वज निश्चित रूप से 15वीं शताब्दी में होशंग शाह या औरंगजेब के समय राजपूताना से आए थे।
भाग 2: ऐतिहासिक औचित्य और विश्लेषण (Justification & Analysis based on Sources)
1900 से पहले के दस्तावेजों में दी गई जानकारी का आधुनिक शोध और वंशावली रिकॉर्ड्स (Genealogical Records) के आधार पर विश्लेषण करने पर वास्तविक इतिहास कुछ अलग और गौरवशाली रूप में सामने आता है।
1. 'भोयर' नाम का औचित्य: स्थान सूचक ब्रिटिश गजेटियर्स में दी गई (भोर) वाली कहानी को आधुनिक शोध खारिज करते हैं।
- विश्लेषण: स्रोतों के अनुसार, जब पवारों ने मालवा से पलायन किया, तो वे बैतूल जिले में आए और सबसे पहले 'भंवरगढ़' किले में शरण ली। इस किले को स्थानीय बोली में 'भोयरगढ़' भी कहा जाता था। चूंकि वे इस किले में निवास करते थे, इसलिए स्थानीय आदिवासियों और निवासियों ने उन्हें "भोयर" (भोयरगढ़ वाले) कहना शुरू कर दिया,,।
- निष्कर्ष: 'भोयर' शब्द उनके प्रारंभिक निवास स्थान (भंवरगढ़ किला) का सूचक है। 20वीं सदी की शुरुआत (1914-1939) में समाज ने इस भ्रांति को दूर करने के लिए आंदोलन चलाया और पुनः 'पवार' शब्द को अपनाया,।
2. उत्पत्ति: 72 कुलों का संघ (Confederacy Theory) जेनकिन्स (1827) और गजेटियर्स उन्हें केवल "धार के पवार" कहते हैं, लेकिन आंतरिक स्रोत इसे विस्तार देते हैं।
- विश्लेषण: वंशावली लेखकों (भाट/राव) के अनुसार, यह समुदाय केवल परमार वंश का सीधा वंशज नहीं है, बल्कि यह 72 अलग-अलग क्षत्रिय कुलों (जैसे- परमार, चौहान, सोलंकी, परिहार, राठौर, गहलोत, तोमर आदि) का एक संघ (Confederacy) है,,।
- औचित्य: मालवा में मुगलों के खिलाफ शक्ति जुटाने के लिए इन अलग-अलग राजपूत वंशों ने एक संघ बनाया और आपस में विवाह (Endogamy) की प्रथा शुरू की। इसी संघ को सामूहिक रूप से 'पवार' कहा गया। 1900 से पहले के दस्तावेजों में 'पवार' और 'भोयर' दोनों शब्दों का प्रयोग इसी मिश्रित पहचान को दर्शाता है,।
3. "राजपूत रीति-रिवाज त्यागने" के दावे का खंडन ब्रिटिश रिकॉर्ड्स (1891) में कहा गया कि वे "Debased Rajputs" (पतित राजपूत) हैं क्योंकि उन्होंने जनेऊ और तलवार छोड़ दी।
- विश्लेषण: स्रोतों के अनुसार, यह पतन नहीं बल्कि अनुकूलन (Adaptation) था। औरंगजेब और मुगलों के अत्याचारों से बचने के लिए, इन क्षत्रियों ने अपनी पहचान छिपाई। उन्होंने जनेऊ त्यागकर 'करदोड़ा' (कमर का धागा) अपनाया और तलवार की जगह हल (कृषि) को चुना ताकि वे मुगलों की नजरों से बच सकें और अपनी संस्कृति की रक्षा कर सकें,,।
- औचित्य: यह एक रणनीतिक निर्णय था। उन्होंने 'दशहरा पर शस्त्र पूजन' और अपनी विशिष्ट बोली 'पवारी' के माध्यम से अपनी क्षत्रिय जड़ों को जीवित रखा। 1827 की रिपोर्ट में उन्हें "क्षत्रिय कृषक" कहा जाना इस बात का प्रमाण है कि उनकी मूल पहचान सुरक्षित थी,।
4. भाषा (पवारी/भोयरी) का ऐतिहासिक प्रमाण 1891 की जनगणना में भोयरी को "टूटी-फूटी मालवी" कहा गया।
- विश्लेषण: आधुनिक भाषाई विश्लेषण पुष्टि करता है कि पवारी बोली राजस्थानी मालवी का ही रूप है। इसमें प्रवास के दौरान बुंदेली (बैतूल/छिंदवाड़ा में) और मराठी (वर्धा में) का मिश्रण हुआ,,।
- औचित्य: यह तथ्य कि यह बोली केवल इसी समुदाय द्वारा बोली जाती है और इसका मूल मालवा में है, जेनकिन्स (1827) के उस दावे को वैज्ञानिक आधार देता है कि ये लोग मालवा से आए थे।
5. सैन्य इतिहास और देवगढ़ राज्य आइन-ए-अकबरी (16वीं सदी) में जटबा की सेना का जिक्र है, लेकिन उसमें जाति स्पष्ट नहीं थी।
- विश्लेषण: आधुनिक शोध (राजेश बारंगे पवार एवं अन्य) यह स्थापित करते हैं कि जटबा की सेना के "2000 घुड़सवारों" का बड़ा हिस्सा यही भोयर पवार थे। उनकी वीरता के कारण ही गोंड राजाओं ने उन्हें मुलताई, पांढुर्ना और सौसर में बड़ी जागीरें और "महाजन/पटेल" की उपाधियाँ दीं,,।
- औचित्य: यह समुदाय केवल शरणार्थी नहीं था, बल्कि देवगढ़ राज्य का एक प्रमुख सैन्य और जमींदार वर्ग था, जैसा कि 1827 की रिपोर्ट में "सबसे प्रमुख कृषक वर्ग" के रूप में संकेत दिया गया है।
निष्कर्ष (Conclusion) 1900 से पहले के दस्तावेज (विशेषकर ब्रिटिश गजेटियर्स) भोयर पवार समुदाय के प्रवास और मूल स्थान (मालवा/धार) की सही जानकारी देते हैं, लेकिन वे "भोयर" नाम की उत्पत्ति और उनकी सामाजिक स्थिति को समझने में औपनिवेशिक पूर्वाग्रहों के शिकार रहे। आधुनिक शोध और वंशावली साक्ष्यों ने सिद्ध किया है कि:
- यह समुदाय 72 क्षत्रिय कुलों का एक संघ है।
- 'भोयर' नाम भंवरगढ़ किले में निवास के कारण पड़ा
- कृषि और 'करदोड़ा' अपनाना मुगलों से बचने की एक रणनीति थी, न कि क्षत्रिय धर्म का पतन।
अतः, यह समुदाय ऐतिहासिक रूप से "मालवा के 72 कुलों का क्षत्रिय संघ" है, जिसने सतपुड़ा के जंगलों को आबाद किया और अपनी संस्कृति को संरक्षित रखा।
संदर्भ (References):
ऊपर लिखे गए लेख (आर्टिकल) की प्रामाणिकता और विस्तृत अध्ययन के लिए, स्रोतों में उपलब्ध संदर्भों (References) की एक व्यापक सूची यहाँ दी गई है। इन संदर्भों को ऐतिहासिक दस्तावेजों, जनगणना रिपोर्ट्स, और सामुदायिक शोध पुस्तकों में वर्गीकृत किया गया है:
1. ऐतिहासिक दस्तावेज और गजेटियर्स (Historical Documents & Gazetteers)
- रिचर्ड जेनकिन्स (1827): Report on the Territories of the Raja of Nagpore submitted to the Supreme Government of India. (यह दस्तावेज पुष्टि करता है कि पवार औरंगजेब के समय मालवा से आए थे),.
- अबुल फजल: आइन-ए-अकबरी (Ain-i-Akbari), वॉल्यूम II (कर्नल एच.एस. जैरेट द्वारा अनुवादित)। (इसमें देवगढ़ के गोंड राजा जटबा की सेना और सैन्य संरचना का विवरण है),.
- आर.वी. रसेल (1916): The Tribes and Castes of the Central Provinces of India, वॉल्यूम II, मैकमिलन एंड कंपनी, लंदन। (भोयर/पवार जाति का नृवंशविज्ञान विवरण),.
- सेंट्रल प्रोविंस गजेटियर्स:
- Central Provinces District Gazetteers, Volume 9, Part 1 (बैतूल, छिंदवाड़ा, वर्धा का विवरण).
- Betul District Gazetteer (ट्रेंच, सी.जी.सी., 1923 - Final Report on the Re-settlement of the Betul District).
- Chhindwara District Gazetteer.
- Wardha District Gazetteer.
- डब्ल्यू. डब्ल्यू. हंटर (1885): The Imperial Gazetteer of India, ट्रूबनर एंड कंपनी,.
2. भारत की जनगणना रिपोर्ट्स (Census of India Reports)
- 1891 की जनगणना: Census of India, 1891: The Central Provinces and Feudatories, वॉल्यूम 11, पार्ट 1 (लेखक: बी. रॉबर्टसन)। (पवारी/भोयरी बोली और जाति का उल्लेख).
- 1901 की जनगणना: Census of India, 1901, वॉल्यूम 13, पार्ट 1 (लेखक: आर.वी. रसेल)। (पवारों की उत्पत्ति और 72 कुलों का संदर्भ),.
- 1911 की जनगणना: Census of India, 1911 (ई.ए. गेट द्वारा रिपोर्ट).
- अन्य जनगणना वर्ष: 1921 और 1931 की जनगणना रिपोर्ट्स में पवार जनसंख्या के आंकड़े,.
3. सामुदायिक शोध पुस्तकें और साहित्य (Community Research Books & Literature)
- डॉ. ज्ञानेश्वर टेंभरे (2014): पवारी ज्ञानदीप (Pawari Gyandeep), दूसरा संस्करण, हिमालय पब्लिशिंग हाउस, मुंबई। (पवार समाज का इतिहास, 72 कुल और संस्कृति का विस्तृत विवरण),.
- वल्लभ डोंगरे (2013): सीखो सबक पंवारो (Sikho Sabak Pawaro), सतपुड़ा संस्कृति संस्थान, भोपाल।.
- वल्लभ डोंगरे (1989): पवारी पहेलियाँ, सतपुड़ा संस्कृति संस्थान, भोपाल। (पवारी लोकसाहित्य और पहेलियों का संग्रह).
- पन्नालाल बिसेन (1986): भोजपत्र (Bhojpatra) एवं पवार ज्योति लेख। (पवारों के प्रवास और वैनगंगा पवारों के साथ संबंधों पर),.
- कृष्णराव बालाजी पंवार (1985): पंवार कुल दर्शन (Panwar Kul Darshan), पंवार संदेश।,.
- रामकिशोर पवार (2022): पुस्तक मेरा बैतूल (Pushtak Mera Betul), बीएफसी पब्लिकेशन।.
4. वंशावली और शोध पत्र (Genealogy & Research Papers)
- वंशावली लेखक (भाट): मदनसिंह जी मोरसिंह बड़वाजी (भीलवाड़ा, राजस्थान) और राजकुमार सारोठ (छिंदवाड़ा)। (72 कुलों और गोत्रों की मूल वंशावली के प्रमाण),,.
- राजेश बारंगे पवार (2024):
- "Kshatriya Pawar (72 clan): Journey from Malwa to Satpura" (लैम्बर्ट पब्लिशिंग)।,.
- "A Study of the Pawar Community Gotra (surnames) in Central India" (शोध पत्र)।.
- "Historical Migration and Socio-Cultural Continuity" (शोध पत्र)।.
- प्रणय चोपड़े: भोयर (पवार/भोयर पवार): एक परिचय और संघ से जाति तक (शोध पत्र)।.
5. भाषा और लिपि (Language & Linguistics)
- जी.ए. ग्रियर्सन (1908): Linguistic Survey of India। (पवारी/भोयरी बोली का भाषाई विश्लेषण और इसे राजस्थानी मालवी से जोड़ना).
- डॉ. मंजू अवस्थी (1995): बालाघाट जिले की जन बोलियों का भाषावैज्ञानिक एवं सांस्कृतिक अध्ययन।.
- शिवानी बरखाड़े/पवार: पवारी (भोयरी) बोली: सांस्कृतिक, भाषाई और लोक साहित्यिक विश्लेषण (लेख)।.
यह सूची लेख को ऐतिहासिक, सामाजिक और मानवविज्ञानी दृष्टिकोण से पूरी तरह प्रामाणिक बनाती है।
About the Authors
Shivani Pawar
Researcher – Bhoyari / Pawari Language Researcher, Folk Culture and Satpuda Regional Studies
Co-Editor, Writer & Contributor – Maa Tapti Shodh Sansthan, Multai, Betul & Pawari Shodh Patrika
Shivani Pawar works on the documentation and preservation of Pawari/Bhoyari language, Pawari folk songs, and oral traditions of the Bhoyar Pawar community. Her research focuses on the cultural heritage of the Satpuda region, including Betul traditions, the historical connections of Pawar lineage with Malwa and Rajputana.
📧 Email: barkhede.shivani@gmail.com
Rajesh Barange Pawar
Independent Researcher | Bhoyari / Pawari Language Researcher | Pawar Community History | Rajasthan Malwa Satpuda Regional Studies
Founder & Director – Maa Tapti Shodh Sansthan, Multai, Betul | Chief Editor – Pawari Shodh Patrika
Rajesh Barange Pawar researches Bhoyari/Pawari language, Pawar community history, the 72 gotras of the Pawar community, and the cultural traditions of the Satpuda region. His work also explores the z historical connections between the Pawar (Parmar/Panwar) lineage of Malwa and Rajputana and their migration and settlement in Betul and surrounding Satpuda regions, including traditions associated with Maa Tapti.
🌐 Blog: https://rajeshbarange.blogspot.com/
🌐 Pawari Shodh Patrika: https://sites.google.com/view/pawarishodhpatrika/home
📧 Email: rajeshbarange00@gmail.com
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