Thursday, 5 February 2026

परमार (पंवार) वंश की शाखाएँ : विस्तृत ऐतिहासिक विवरण

 

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परमार (पंवार) वंश की शाखाएँ : विस्तृत ऐतिहासिक विवरण

परमार (पंवार) वंश भारत के प्राचीन और प्रतिष्ठित राजवंशों में से एक रहा है। यह वंश अग्निवंशी क्षत्रियों में गिना जाता है और इसका राजनीतिक, सांस्कृतिक तथा सामाजिक प्रभाव पश्चिम, मध्य और उत्तर भारत के विशाल भू-भाग में दिखाई देता है। समय के साथ परमार वंश की अनेक शाखाएँ बनीं, जो अलग-अलग क्षेत्रों में शासन, सैन्य सेवा और सामाजिक नेतृत्व के रूप में विकसित हुईं।


1. परमार वंश की उत्पत्ति और विस्तार

इतिहासकारों के अनुसार परमार वंश का प्रारंभिक केंद्र मालवा रहा, जहाँ से यह वंश राजस्थान, गुजरात, महाराष्ट्र, विदर्भ, सतपुड़ा, उत्तराखंड (गढ़वाल) तथा सिंध–मरुस्थलीय क्षेत्रों तक फैला।
भौगोलिक विस्तार के कारण भाषा, उच्चारण और स्थानीय परंपराओं के प्रभाव से परमार पंवार पवार पोवार भोयर जैसे रूप विकसित हुए।


2. प्रमुख शाखाएँ और उनके क्षेत्र

(क) मालवा शाखा

मालवा परमारों की सबसे प्रसिद्ध और ऐतिहासिक रूप से सुदृढ़ शाखा रही।

  • क्षेत्र: धार, उज्जैन, मांडू
  • विशेषता: विद्या, स्थापत्य और प्रशासन
  • प्रसिद्ध शासक:
    • राजा भोजविद्वान, साहित्यकार और महान शासक
    • उदादित्य, सिंधुराज
  • धार्मिक केंद्र: महाकालेश्वर (उज्जैन), ओंकारेश्वर
  • कुलदेवी: कालिका माता (धार)

(ख) राजस्थान की परमार शाखाएँ

राजस्थान में परमार वंश की अनेक उप-शाखाएँ विकसित हुईं, जो स्थानीय सत्ता, दुर्गों और धार्मिक केंद्रों से जुड़ी रहीं।

1. सोढ़ा परमार

  • उत्पत्ति: नौकोटी मारवाड़
  • संस्थापक परंपरा: धरणीवराह
  • शासन क्षेत्र: जैसलमेर–बाड़मेर से अमरकोट (वर्तमान पाकिस्तान)
  • विशेषता: मरुस्थलीय किलों और सीमावर्ती रक्षा में भूमिका

2. सांखला परमार

  • संबंध: सोढ़ा परमारों के भाई बाघ के वंशज
  • धार्मिक पहचान: सच्चियाय माता
  • क्षेत्र: नागौर, बीकानेर, जोधपुर क्षेत्र

3. मोरी (मौर्य/मोरी)

  • प्राचीन शाखा
  • संबंध: चित्तौड़ के मान मोरी
  • महत्व: परमार सत्ता से पूर्व के राजनैतिक संक्रमण की कड़ी

4. डोडिया परमार

  • काल: 9वीं शताब्दी से पूर्व
  • क्षेत्र: दक्षिणी राजस्थान और मालवा की सीमाएँ

5. अन्य राजस्थान शाखाएँ

  • कल्लावत
  • धोधिंग
  • बोया
  • देहलावत
    ये शाखाएँ स्थानीय नामों, ग्रामों और सैन्य सेवाओं के आधार पर बनीं।

(ग) गढ़वाल (उत्तराखंड) की पंवार शाखा

  • क्षेत्र: गढ़वाल हिमालय
  • राजनीतिक पहचान: गढ़वाल साम्राज्य
  • प्रसिद्ध शासक: राजा भानु प्रताप
  • विशेषता: पहाड़ी प्रशासन, सीमांत रक्षा और स्थानीय संस्कृति का संरक्षण
  • यहाँ परमार पंवार नाम स्थायी रूप से स्थापित हुआ।

(घ) विदर्भ–सतपुड़ा क्षेत्र : भोयर पंवार

  • क्षेत्र: विदर्भ, सतपुड़ा, बैतूल, छिंदवाड़ा
  • पहचान: भोयर पंवार
  • परंपरा: धार–मालवा से स्थानांतरण की लोकस्मृतियाँ
  • विशेषता: कृषि, सैन्य सेवा और स्थानीय शासन में योगदान

(ङ) अन्य महत्वपूर्ण शाखाएँ

ये शाखाएँ प्रायः स्थान, व्यक्तिनाम या स्थानीय उपाधियों पर आधारित रहीं:

  • चन्ना
  • बीहल
  • बूंटा
  • सुमरा
  • ऊमठ
  • हूण
  • सांवत
  • कुंतल
  • हुरड़
  • सुजान
  • रबड़िया
    इन शाखाओं का उल्लेख विभिन्न क्षेत्रीय इतिहास, वंशावलियों और लोककथाओं में मिलता है।

3. धार्मिक और सांस्कृतिक पहचान

  • कुलदेवी:
    • सच्चियाय माता (मारवाड़ क्षेत्र)
    • कालिका माता (धार–मालवा)
  • कुलदेवता:
    • महाकालेश्वर (उज्जैन)
    • ओंकारेश्वर (नर्मदा तट)

धर्म, शक्ति-उपासना और शिवभक्ति परमार वंश की साझा पहचान रही है।


4. उपाधियाँ और नाम-रूप

क्षेत्रीय भाषाओं और प्रशासनिक अभिलेखों के कारण परमार वंश के नाम कई रूपों में प्रचलित हुए:

  • परमार
  • पंवार
  • पवार
  • पोवार
  • भोयर

ये सभी नाम ऐतिहासिक रूप से एक ही मूल वंश से जुड़े माने जाते हैं।


5. ऐतिहासिक महत्व और विरासत

परमार (पंवार) वंश की शाखाओं ने भारत के विभिन्न हिस्सों में शासन, संस्कृति, साहित्य, धर्म और समाज को गहराई से प्रभावित किया। मालवा के विद्वान शासकों से लेकर मरुस्थल के योद्धाओं और हिमालयी राजाओं तक—इस वंश की विरासत बहुआयामी और समृद्ध रही है।
आज भी विभिन्न क्षेत्रों में रहने वाले पंवार/पवार/भोयर समुदाय अपनी ऐतिहासिक जड़ों, कुलदेवी–कुलदेवता और परंपराओं के माध्यम से इस गौरवशाली विरासत को जीवित रखे हुए हैं।

 

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