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Tuesday, 12 March 2024

पवारों में बहन-बेटी-बहू के चरण स्पर्श

 बहन-बेटी-बहू के चरण स्पर्श पवारों में बहन, बेटी-बहू के चरण स्पर्श करने की प्रथा है। बहन, बेटी-बहू के चरण स्पर्श करने के पीछे यही भावना होती है कि उनके प्रति व्यक्ति के मन में कुभाव उत्पन्न न हो। घर की बहन, बेटी व बहू सदैव पवित्र बनी रहे ताकि उनकी कोख से जन्म लेने वाली पीढ़ियाँ सदैव पवित्र व पावन उत्पन्न हो सके | 

हर शुभ अवसर पर बहन, बेटी व बहू के चरण स्पर्श करके व्यक्ति उनके प्रति अपने मन में सम्मान की भावना बनाए रखने के प्रति संकल्पबद्ध होता है। बहन के चरण स्पर्श कर भाई, बेटी-बहू के चरण स्पर्श कर बाप और ससुर बेटी-बहू के प्रति अपने मन में सम्मान भावना संजोता है और उनकी रक्षा के लिए प्रतिज्ञाबद्ध होता है।

 भाई बहन के चरण स्पर्श कर उसकी रक्षा के प्रति प्रतिज्ञाबद्ध होता है। बहन भी अपने भाई के चिरायु होने की कामना करती है। बेटी के विवाह अवसर पर पिता अपनी बेटी के चरण स्पर्श कर उससे आशीर्वाद की कामना करता है कि उसके जाने के बाद भी पिता का घर भरापूरा रहे और वह जिस घर जा रही है वह भी धन-धान्य से सम्पन्न हो जाए | 

अपने बेटे के लिए बहू लाते समय भी ससुर अपनी होने वाली बहू के चरण स्पर्श कर उससे इसी तरह के आशीर्वाद की कामना करता है कि उसके आगमन से वर और घर दोनों सुखी सम्पन्न हो जाए | बहू ही कुल के उत्तराधिकारी की जन्मदात्री होती है जिसपर वंश परम्परा निर्भर होती है और आगे भी चलती है, इसलिए वह भी पूज्य होती है। 

इस क्षेत्र का भुजलिया पर्व बेटी-बहन के सम्मान का प्रतीक पर्व और सावन गीत बहन व बहू के सम्मान का प्रतीक गीत है। इस सावन गीत के माध्यम से बहन और बहू अपने मायके से मिलती और जीने का संबल प्राप्त करती हैं। इस क्षेत्र में बेटी की विदाई उत्सव है, पर्व है। 

बेटी का घर आना आनंद है, त्योहार है | बेटी जब ससुराल से घर आती है तो उसका बड़ा आदर-सत्कार किया जाता है। इसका एक पृथक से पूरा पर्व ही है भादो माह में महालक्ष्मी ज्येष्ठा और कनिष्ठा दोनों बहनें पुत्री के रूप में मायके आती हैं और ढाई दिनों तक मायके में रहती हैं। 

विदाई के दिन सारा घर उदास हो उठता है। बेटी के प्रति इतना सम्मान अन्यत्र दुर्लभ है। इस क्षेत्र में बेटी के प्रति इतना प्रेम होता है कि उसे शब्दों में अभिव्यक्त कर पाना संभव नहीं है| यही कारण है इस क्षेत्र में कन्या भ्रूण हत्या का अभी तक एक भी प्रकरण सामने नहीं आया है। साथ ही इस क्षेत्र में बेटी को बेटे के बराबर दर्जा व सम्मान दिया जाता है।


वल्‍लभ डोंगरे द्वारा बुक "पवारी परम्पराए एवं प्रथाए"


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Rajesh Barange

क्षत्रिय पवार समाज के इतिहास और संस्कृति का शोध एवं प्रचार।

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