सरस्वतीकंठाभरण (व्याकरण) –
एक विस्तृत समीक्षा
शिवानी पवार (B.Com, पवारी लेखिका)
देवरी, मुलताई
माँ ताप्ती शोध
संस्थान, मुलताई
परिचय
सरस्वतीकंठाभरण, राजा भोज द्वारा
रचित एक प्रमुख संस्कृत व्याकरण ग्रंथ है। राजा भोज, जो मध्यकालीन भारत के प्रसिद्ध परमार सम्राट और
एक प्रखर विद्वान, लेखक एवं कवि थे, ने इस ग्रंथ के माध्यम से संस्कृत भाषा के व्याकरण को सरल, सुव्यवस्थित और
सुसंगठित रूप में प्रस्तुत किया। यह ग्रन्थ व्याकरण शास्त्र के क्षेत्र में एक
महत्वपूर्ण योगदान माना जाता है और आज भी भाषावैज्ञानिकों एवं संस्कृतविदों के लिए
अध्ययन का एक अमूल्य स्रोत है।
इस ग्रंथ की सबसे बड़ी
विशेषता यह है कि इसमें व्याकरण के कठोर नियमों को व्यावहारिक दृष्टांतों और सहज
भाषा में प्रस्तुत किया गया है, जिससे यह न केवल शास्त्रज्ञों के लिए बल्कि
विद्यार्थियों और सामान्य पाठकों के लिए भी उपयोगी हो गया।
रचनाकार: राजा भोज
राजा भोज (11वीं–12वीं सदी) को
महान विद्वान और परमार वंश के गौरव के रूप में जाना जाता है। वे केवल एक पराक्रमी
शासक ही नहीं थे बल्कि साहित्य, विज्ञान, संगीत, खगोल, चिकित्सा, राजनीति और वास्तुकला जैसे विविध क्षेत्रों के
गहन ज्ञाता थे। कहा जाता है कि उनके द्वारा 84 ग्रंथों की रचना हुई थी, जिनमें व्याकरण, साहित्य, दर्शन, आयुर्वेद, स्थापत्य और कला
के विविध विषय सम्मिलित हैं।
सरस्वतीकंठाभरण उनकी विद्वत्ता और भाषावैज्ञानिक दृष्टिकोण का प्रमाण है। यह ग्रंथ केवल
भाषाशास्त्रीय ग्रंथ ही नहीं बल्कि उनके समय के सामाजिक–सांस्कृतिक और शैक्षणिक
वातावरण का भी दर्पण है।
ग्रंथ का उद्देश्य और महत्व
सरस्वतीकंठाभरण का मुख्य
लक्ष्य था संस्कृत भाषा के व्याकरण को एक समग्र और व्यवस्थित रूप में प्रस्तुत
करना। यह ग्रंथ पाणिनीय परंपरा का सम्मान करते हुए भी अपने ढंग से व्याकरण को अधिक
व्यावहारिक और अनुप्रयोगपरक बनाता है।
- विद्यार्थियों के लिए यह नियमावली और मार्गदर्शिका है।
- विद्वानों के लिए यह भाषिक चिंतन का आधार है।
- और संस्कृत के साहित्यकारों के लिए यह सृजन और अनुवाद का उपकरण है।
इस प्रकार यह ग्रंथ केवल नियमों का संग्रह नहीं बल्कि
संस्कृत भाषा के जीवंत प्रयोग का ग्रंथ है।
विषय और संरचना
सरस्वतीकंठाभरण में व्याकरण के प्रमुख विषय सुव्यवस्थित ढंग
से प्रस्तुत किए गए हैं। इसमें शामिल विषय निम्नलिखित हैं:
- श्रुतिसप्तक – स्वर ध्वनियों की
व्याकरणिक संरचना।
- व्यंजन वर्ण – व्यंजनों का वर्गीकरण
एवं प्रयोग।
- समास
– संयुक्त शब्दों की रचना और उनके नियम।
- तिङन्त एवं कृदन्त पदों का ज्ञान।
- कारक और वाक्य संरचना।
- संधि एवं समास के नियम।
- विभक्ति एवं प्रत्यय।
- धातु प्रयोग और रूपांतरण।
- वाक्य रचना एवं लिंग–पुरुष सम्बन्धी नियम।
- अपवादात्मक नियम – सामान्य व्याकरण
नियमों के साथ विशेष अपवाद।
- प्रयोग और पद विन्यास।
प्रत्येक नियम के साथ पर्याप्त उदाहरण दिए गए हैं, जिससे
छात्र–पाठक को व्याकरण के जटिल पहलुओं को समझने में आसानी होती है।
शैली और भाषा
सरस्वतीकंठाभरण की भाषा स्पष्ट, सरल और व्यावहारिक है। राजा भोज ने शास्त्रीय गूढ़ता और कठिन शब्दों के बजाय
सहजता और अनुप्रयोग पर बल दिया। यही कारण है कि यह ग्रंथ केवल शास्त्रीय परंपरा का
विस्तार नहीं बल्कि उसके लोकव्यावहारिक संस्करण के रूप में देखा
जा सकता है।
यह ग्रंथ उस युग की
शैक्षणिक पद्धति को भी दर्शाता है, जिसमें उदाहरण और दृष्टांत के माध्यम से शिक्षा
दी जाती थी।
व्याकरण शास्त्र में योगदान
सरस्वतीकंठाभरण के माध्यम से राजा भोज ने संस्कृत व्याकरण
को तत्कालीन परंपरा से आगे ले जाकर एक समग्र ढांचा प्रदान किया।
- इसमें भाषा की शुद्धता और
सौंदर्य दोनों का संरक्षण है।
- पाणिनि,
पतंजलि और कात्यायन की परंपरा का अनुसरण करते हुए भोज
ने उसे अधिक प्रायोगिक बनाया।
- यह ग्रंथ संस्कृत को लोकभाषा से जोड़ने का भी प्रयास करता है।
इस दृष्टि से यह ग्रंथ व्याकरणशास्त्र की निरंतरता में एक
नया अध्याय जोड़ता है।
तुलनात्मक अध्ययन
यदि सरस्वतीकंठाभरण की तुलना अन्य व्याकरण ग्रंथों से की
जाए तो इसके विशेष गुण स्पष्ट होते हैं:
- पाणिनि की अष्टाध्यायी – अत्यंत वैज्ञानिक एवं
सूत्रात्मक है,
किंतु उसकी कठिनता के कारण सामान्य छात्रों के लिए सहज
नहीं।
- पतंजलि का महाभाष्य – गहन और तर्कपूर्ण, किंतु विस्तृत व जटिल।
- राजा भोज का सरस्वतीकंठाभरण – अपेक्षाकृत सरल, प्रयोगपरक और लोकाभिमुख।
अर्थात भोज का प्रयास था कि शास्त्र और लोक, दोनों के बीच एक सांस्कृतिक सेतु बनाया जाए।
प्रभाव और उपयोगिता
- शैक्षिक प्रभाव – आज भी संस्कृत के
अध्यापन में यह ग्रंथ सहायक है।
- लेखन एवं अनुवाद – संस्कृत काव्य, नाटक और शास्त्रों के अनुवाद में यह ग्रंथ सटीकता प्रदान करता है।
- भाषाविज्ञान संदर्भ – तुलनात्मक भाषाविज्ञान
और ऐतिहासिक व्याकरण अध्ययन में यह ग्रंथ महत्वपूर्ण है, क्योंकि यह संस्कृत की व्यावहारिकता और नियमबद्धता को संतुलित करता है।
- सांस्कृतिक महत्व – यह केवल व्याकरण ग्रंथ
नहीं बल्कि उस समय की बौद्धिक धारा और शैक्षणिक परंपरा का परिचायक भी है।
निष्कर्ष
सरस्वतीकंठाभरण, राजा भोज के विद्वत्ता–संपन्न शासनकाल की महान
देन है। यह ग्रंथ संस्कृत व्याकरण की परंपरा को सरल, व्यवस्थित और जीवंत बनाता है।
- इसकी
सुगम शैली और व्यावहारिक दृष्टिकोण इसे अन्य ग्रंथों से
अलग करते हैं।
- यह केवल भाषा का नहीं बल्कि संस्कृति और शिक्षा का भी ग्रंथ है।
- आधुनिक युग में भी यह अध्ययन, अध्यापन और अनुसंधान
में
अमूल्य संसाधन है।
संस्कृत व्याकरण की परंपरा में यह ग्रंथ एक जीवित धरोहर है, जो राजा भोज की विद्वत्ता और
सांस्कृतिक दृष्टि का साक्ष्य प्रस्तुत करता है।
✍️
शिवानी पवार (B.Com,
पवारी लेखिका)
देवरी, मुलताई
माँ ताप्ती शोध
संस्थान, मुलताई
No comments:
Post a Comment