Saturday, 3 January 2026

भोयर पंवार संघ का अल्प इतिहास (1914–1999)

 

भोयर पंवार संघ का अल्प इतिहास (1914–1999)

पवारी शोध पत्रिका (Pawari Research Journal) – शोध लेख प्रारूप

शोध पत्र

Editor: Rajesh Barange Pawar

शोध पत्रिका

पवारी शोध पत्रिका (Pawari Research Journal)

खंड (Vol.): 01 | अंक (Issue): 02 | वर्ष: दिसंबर 2025
प्रकाशक: Maa Tapti Shodh Sansthan, Multai


भोयर पंवार संघ का अल्प इतिहास

(सन् 1914 से 1999 तक 85 वर्ष)

मुलताई (जि. बैतूल), सौसर (जि. छिंदवाड़ा), कारंजा (जि. वर्धा) आदि क्षेत्रों में बसने वाली शाखा ‘भोयर पंवार’ कहीं सन् 1321 से 1425 के बीच हुसैनशाह गौरी के आक्रमण के समय धार से नर्मदाघाटी पार कर सतपुड़ा क्षेत्र में जाती है। यहाँ आने पर उसने अपने को ‘भोयर’ लिखना चालू किया, जो सम्भवतः भोर में पलायन करने, भूमि (धरती) से जुड़े रहने आदि कारणों से नाम रखा गया।

गुरुजी तथा डोंगरे बंधुओं ने समाज की सभा बुलाई। सन् 1914 में ही जौलखेड़ा में दूसरी सभा हुई। 20वीं शताब्दी के आरंभ में इस समाज ने अपना संगठन बनाया। सन् 1914 में ‘बड़ चिचोली’ ग्राम में श्री पांडुरंग देशमुख की अध्यक्षता में ग्राम मोरडोंगरी में सभा हुई। सन् 1921 में बैतूल बाजार, 1922 में पंधराखेड़ी तथा 1920 में रिधोरा में सभा हुई। इसमें तय हुआ कि ‘भोयर’ लिखने के बदले ‘भोयर पंवार’ लिखा जाये। बाद में सन् 1939 में—

खैरवानी की सभा में तय हुआ कि अब केवल ‘पंवार’ लिखा जाये। सन् 1941 में ग्राम सिवनी (त. सौसर) की सभा में अब तक चला आ रहा नाम ‘पंवार समाज सुधार समिति’ बदलकर ‘मध्यप्रांत व विदर्भ क्षत्रिय पंवार-भोयर परिषद’ रखा गया। इस अधिवेशन के अध्यक्ष श्री सूर्यभान धारपुरे, उपाध्यक्ष बालकृष्ण पटेल (खैरवानी) तथा स्वागताध्यक्ष पुनाजी महाजन थे।

इसी अधिवेशन में यह प्रस्ताव पारित हुआ कि ‘वैनगंगा तटीय पंवार क्षत्रिय’ तथा ‘वर्धा तटीय पंवार क्षत्रिय’ का एकीकरण किया जाये। तत्पश्चात सन् 1948 में धंतोली प्राथमिक शाला नागपुर में तथा 1956 में उमरानाला (जि. छिंदवाड़ा) में सभा हुई।

सन् 1961 में वैनगंगा तटीय पंवारों का विशाल अधिवेशन ग्राम अतरी (लालबर्रा) में हुआ, जिसमें वर्धा तटीय पंवार का प्रतिनिधित्व लेकर कुछ सज्जन वहाँ गये, जिसमें श्री दामोदर टेंभरे (अधिवक्ता, बालाघाट) की अध्यक्षता में एक ‘इतिहास समिति’ बनाई गई, जिसमें डॉ. मेघराज बिसेन तथा पन्नालाल बिसेन विशेष रूप से लिये गये।

सन् 1962 के सतोना में आयोजित वैनगंगा तटीय पंवारों के स्वर्णजयंती समारोह में भोयर पंवार संघ के कुछ प्रतिनिधियों ने एकीकरण का प्रस्ताव लाया, जिस पर इतिहास समिति के सज्जनों तथा सर्वश्री चिन्तामनराव गौतम, सूरजलाल बिसेन आदि ने कहा कि पहले आप अपने क्षेत्र के खुले विशाल अधिवेशन में इस आशय का प्रस्ताव पारित कर लें और आपके समाज का खुला जनादेश हमारे समाज के अगले किसी अधिवेशन में लायें। तब तक इतिहास समिति और भी शोध कर लेगी।

फलतः 9 फरवरी 1963 को ग्राम सिवनी (त. सौसर) में भोयर पंवार समाज का विशाल अधिवेशन वैनगंगा तटीय पंवार संघ के तत्कालीन अध्यक्ष श्री दामोदर टेंभरे की अध्यक्षता में हुआ, जिसमें गोपाल पटेल, मीताराम टेंभरे, सूरजलाल बिसेन, पन्नालाल बिसेन, कूर्मराज चौधरी, मेघराज बिसेन आदि के भाषण हुए। वर्धा तटीय समाज की ओर से लेखक किसनलाल काठवले, वित्तूलाल बिसेन, रामचन्द्रराव पराडकर, बालकृष्ण पटेल परिहार, बाबूलाल कडवे, डॉ. बकाराम कालभोर, बाबूलाल पवार आदि के भाषण हुए। सर्वसम्मति से एकीकरण का प्रस्ताव पारित हुआ।

इस प्रस्ताव को वहाँ के कुछ प्रतिनिधियों ने वैनगंगा तटीय पंवार संघ के विशाल अधिवेशन ग्राम छपारा (जि. सिवनी) में मई 1963 को लाया। इस पर उपस्थित बुजुर्गों ने तत्कालीन उपमंत्री एवं शोधकर्ता पन्नालाल बिसेन को इस पर प्रकाश डालने कहा। उन्होंने दोनों समाज की समानता तथा एक ही वंश की दो शाखाओं का विस्तारपूर्वक विश्लेषण किया, किन्तु अंत में कहा कि इसे इतनी जल्दी आज पारित न किया जाये तथा दोनों वर्ग और भी शोध कर लें, अन्यथा यदि कहीं त्रुटि हो गई तो दोनों समाज की भावी पीढ़ी क्षमा नहीं करेगी।

उनके इस मत का सर्वश्री गोपाल पटेल, शिवराम बिसेन, फत्तुलाल कटरे, दामोदर टेंभरे, मेघराज बिसेन आदि ने समर्थन किया। फलतः यह प्रस्ताव फिर स्थगित हो गया।

दि. 11 मई 1965 को मेंढा (तिरोड़ा) में आयोजित वैनगंगा तटीय समाज की संस्था अ.भा. पं. क्ष. महासभा के अधिवेशन में वर्धा तटीय समाज ने पुनः यह प्रस्ताव लाया। इस ओर से सर्वश्री पन्नालाल बिसेन, तेजलाल टेंभरे, पी. डी. राहंगडाले, शिवलाल बिसेन, मीताराम टेंभरे, चिन्तामनराव गौतम, जितेन्द्रनाथ बिसेन आदि ने अपने भाषणों में जोर देकर कहा कि आज ही एकीकरण का प्रस्ताव पारित कर लिया जाये।

उस ओर से श्री बाबूलाल पवार ने विरोध किया कि हमारी तरफ छोटी पंगत नहीं है तथा पूरा समाज एक है। इसलिए अभी भी दोनों शाखाओं में अंतर मालूम पड़ता है, अतः इसे पारित किया जाये। जिस पर लेख-प्रस्तुतकर्ता श्री किसनलाल काठवले व अन्य कुछ सज्जनों ने स्पष्ट कहा कि हमारे समाज का स्पष्ट खुला जनादेश है, अतः आज पारित किया जाये।

इधर से श्री सीताराम ठाकरे (नागपुर) तथा लक्ष्मण पटेल (छपारा) ने एकीकरण का विरोध किया। अंत में सभाध्यक्ष श्री झुम्मकलाल बिसेन ने उपस्थित भारी जन-समुदाय से हाथ उठाकर खुला मत प्रकट करने को कहा। सम्पूर्ण समाज ने सर्वसम्मति से हाथ खड़े कर एकीकरण के पक्ष में मत दिया। केवल दो हाथ—सीताराम ठाकरे और लक्ष्मण पटेल—विरोध में उठे।

इस ऐतिहासिक एकीकरण के प्रस्ताव से दोनों पक्ष अब एक हैं तथा दोनों में विवाह-संबंध हो रहे हैं।

इसके पश्चात वर्धा तटीय शाखा के क्षेत्रीय सम्मेलन होते रहे, जिनमें मई 1983 को अ.भा. पं. क्ष. महासभा का सम्मेलन श्री मुनालाल चौहान की अध्यक्षता, तत्कालीन मंत्री श्री तेजलाल टेंभरे के मुख्य आतिथ्य एवं उपाध्यक्ष श्री पन्नालाल बिसेन के संचालन में ग्राम दुनावा (जि. बैतूल) में हुआ। दि. 17 सितम्बर 1995 को ग्राम डहुआ (जि. बैतूल) में अधिवेशन हुआ।

दि. 6 जून 1993 को अ.भा. पं. क्ष. महासभा के अध्यक्ष श्री पन्नालाल बिसेन की अध्यक्षता में बैतूल में ‘राजा भोज समारोह’ आयोजित किया जाना था, किन्तु अध्यक्ष महोदय अपनी अस्वस्थता के कारण उपस्थित नहीं हो सके। इस समारोह के मुख्य अतिथि मध्यप्रदेश के तत्कालीन राज्यपाल कुंवर मोहम्मद अली खान थे, जिनके पूर्वज पंवार थे। उन्होंने भाव-विभोर होकर पंवार जाति के इतिहास एवं संस्कृति की भूरि-भूरि प्रशंसा की।

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