Monday, 9 February 2026

भोयरी (पवारी) बोली: एक भाषाई एवं सांस्कृतिक अनुशीलन- शिवानी पवार (बारंगे) -भोयरी / Bhoyari / Pawari

भोयरी (पवारी) बोली: एक भाषाई एवं सांस्कृतिक अनुशीलन

लेखिका: शिवानी पवार (बारंगे)
निवास स्थान: देवरी, मुलताई
संस्था से संबद्धता: माँ ताप्ती शोध संस्थान, मुलताई

(An Anthropological and Linguistic Study)


प्रस्तावना (Introduction)

भाषा केवल संवाद का माध्यम नहीं होती, बल्कि वह किसी समुदाय के ऐतिहासिक प्रवास, भौगोलिक परिस्थितियों और सामाजिक संरचना का एक प्रकार का पुरातात्विक प्रमाण (Archaeological Evidence) होती है। मध्य भारत के सतपुड़ा अंचल में निवासरत भोयर पवार समुदाय की मातृभाषा ‘भोयरी’—जिसे पवारी भी कहा जाता है—इस तथ्य का एक सजीव उदाहरण प्रस्तुत करती है।

भाषावैज्ञानिक दृष्टिकोण से भोयरी को एक सेतु बोली (Bridge Dialect) के रूप में देखा जा सकता है, जो पश्चिमी भारत की राजस्थानी भाषिक परंपरा और मध्य भारत की मराठी एवं हिंदी भाषाओं के बीच एक सांस्कृतिक एवं भाषाई पुल का निर्माण करती है। यह बोली न केवल शब्द-संपदा के स्तर पर, बल्कि ध्वन्यात्मक संरचना, क्रिया-रूपों और सामाजिक प्रयोगों में भी इस संक्रमणशील स्वरूप को स्पष्ट रूप से प्रदर्शित करती है।

प्रस्तुत आलेख का उद्देश्य ‘चनुक-झुनुक’ (पवारी शब्दकोश) तथा ऐतिहासिक तथ्यों के आधार पर भोयरी बोली की भाषिक संरचना, शब्दावली, व्युत्पत्ति और सामाजिक-सांस्कृतिक महत्व का एक गंभीर एवं शोधपरक विश्लेषण प्रस्तुत करना है।




1. ऐतिहासिक पृष्ठभूमि एवं प्रवास का सिद्धांत

(Historical Background & Migration Theory)

भोयरी बोली के उद्भव और विकास को समझने के लिए पंवार वंश के ऐतिहासिक प्रवासन (Migration) को समझना अनिवार्य है। उपलब्ध ऐतिहासिक और भाषाई शोध यह संकेत देते हैं कि भोयर पवार समुदाय का मूल स्थान धार और मालवा क्षेत्र रहा है, जिसे परमार शासक राजा भोज का केंद्र भी माना जाता है।

 मध्य उत्तर और मध्य भारत में हुए राजनीतिक संघर्षों, सत्ता परिवर्तन और अस्थिरता के कारण यह समुदाय मालवा क्षेत्र से विस्थापित होकर धीरे-धीरे सतपुड़ा की घाटियों—बैतूल, छिंदवाड़ा, सिवनी और वर्धा—की ओर अग्रसर हुआ। इस दीर्घकालिक प्रवास ने न केवल समुदाय की सामाजिक संरचना को प्रभावित किया, बल्कि उसकी भाषा को भी नए भाषिक परिवेश में ढाल दिया।

भाषाई रूपांतरण

जब यह समुदाय मालवा क्षेत्र में निवासरत था, तब उनकी भाषा पर मालवी और निमाड़ी बोलियों का गहरा प्रभाव था। जैसे-जैसे यह समुदाय दक्षिण की ओर बढ़ा और विदर्भ (महाराष्ट्र) की सीमाओं पर आकर बसा, वैसे-वैसे उनकी बोली में मराठी शब्दावली, ध्वनियाँ और वाक्य संरचनाएँ सम्मिलित होती चली गईं।

निष्कर्ष

इस प्रकार वर्तमान भोयरी बोली संस्कृत-निष्ठ हिंदी, राजस्थानी (विशेषतः मालवी/मारवाड़ी) और मराठी भाषिक परंपराओं का एक अनूठा त्रिवेणी संगम प्रतीत होती है।


2. भौगोलिक विस्तार एवं भाषाई वर्गीकरण

(Geographical Spread & Classification)

भोयरी बोली का प्रयोग मुख्यतः मध्य प्रदेश और महाराष्ट्र के सीमावर्ती जिलों में किया जाता है। भाषाविज्ञान की दृष्टि से इसे इंडो-आर्यन भाषा परिवार की मध्य भारतीय बोलियों के समूह में रखा जा सकता है।

प्रमुख क्षेत्र

भोयरी बोली का सक्रिय प्रयोग बैतूल, छिंदवाड़ा, पांढुर्णा  (मध्य प्रदेश) तथा वर्धा, नागपुर और अमरावती (महाराष्ट्र) जिलों में पाया जाता है।

उच्चारण शैली (Phonology)

इस बोली में ‘ण’ और ‘ळ’ ध्वनियों का प्रचुर प्रयोग देखने को मिलता है—जैसे ‘न’ के स्थान पर ‘ण’ तथा ‘ल’ के स्थान पर ‘ळ’—जो मराठी और राजस्थानी दोनों भाषाओं की साझा विशेषता है। इसके अतिरिक्त क्रियाओं के अंत में ‘नूं’ या ‘ना’ का प्रयोग (जैसे—जानूं, करनूं) गुजराती और राजस्थानी भाषिक प्रभाव की ओर संकेत करता है।


3. शब्द-संपदा एवं व्युत्पत्ति विश्लेषण

(Lexical Analysis & Etymology)

वल्लभ डोंगरे द्वारा संकलित ‘चनुक-झुनुक’ शब्दकोश के विश्लेषण से यह स्पष्ट होता है कि भोयरी शब्दावली को तीन प्रमुख श्रेणियों में विभाजित किया जा सकता है—

(क) कृषि एवं पर्यावरण (Agrarian Vocabulary)

चूंकि भोयर पवार समुदाय मूलतः एक कृषक समाज रहा है, इसलिए उनकी भाषा में कृषि और पर्यावरण से संबंधित शब्द अत्यंत समृद्ध और विशिष्ट हैं—

  • बक्खर (Bakkhar): खेत जोतने का उपकरण; मालवी प्रभाव स्पष्ट।

  • दावन (Daavan): बैलों द्वारा फसल की मड़ाई की प्रक्रिया।

  • रास (Raas): अनाज का ढेर।

  • पनोची (Panochi): मटकों को रखने का लकड़ी का स्टैंड; यह शब्द नितांत स्थानीय और मौलिक (Indigenous) प्रतीत होता है।

(ख) पारिवारिक संरचना (Kinship Terms)

भोयरी बोली में रिश्तों के नामकरण में एक विशिष्ट सामाजिक मनोविज्ञान (Social Psychology) परिलक्षित होता है—

  • लोग–लोगनी (Log–Logni): पति-पत्नी के लिए प्रयुक्त शब्द। यहाँ ‘लोग’ का अर्थ केवल व्यक्ति नहीं, बल्कि ‘समूह’ या ‘समाज’ बन जाता है, जो यह दर्शाता है कि विवाह के बाद व्यक्ति ‘मैं’ से ‘हम’ में रूपांतरित हो जाता है।

(ग) अमूर्त अवधारणाएँ (Abstract Concepts)

  • सुखवाड़ा (Sukhwada): इसका अर्थ केवल ‘समाचार’ नहीं, बल्कि ‘सुख का वाड़ा’ अर्थात ऐसा संदेश जिसमें केवल मंगलकामनाएँ निहित हों।

  • लुहयड़ी (Luhyadi): यह पंजाबी शब्द ‘लोहड़ी’ (अग्नि-पूजन) का सजातीय (Cognate) प्रतीत होता है। भोयरी में इसका अर्थ अलाव या जलती लकड़ी है, जो व्यापक भाषाई संपर्क और सांस्कृतिक आदान-प्रदान को दर्शाता है।


4. लोकोक्तियाँ और सामाजिक दर्शन

(Idioms & Socio-Cultural Philosophy)

किसी भी बोली की वास्तविक समृद्धि उसकी लोकोक्तियों और मुहावरों में निहित होती है। भोयरी लोकोक्तियाँ समाज के व्यावहारिक ज्ञान और जीवन-दर्शन को प्रतिबिंबित करती हैं—

“नद्दी कोदी जानूं”
विश्लेषण: शाब्दिक अर्थ ‘नदी की ओर जाना’ है, किंतु लाक्षणिक अर्थ ‘शौच के लिए जाना’ होता है। यह मुहावरा उस ऐतिहासिक काल का द्योतक है जब मानव जीवन जल स्रोतों के निकट केंद्रित था और स्वच्छता की अवधारणा प्रकृति से जुड़ी हुई थी।

“तीन ताल, चौदा भुवान”
विश्लेषण: यह लोकोक्ति अत्यधिक परिश्रम, व्यापक संघर्ष और ब्रह्मांडीय प्रयास की भावना को अभिव्यक्त करती है।


5. सांस्कृतिक पर्व और उनका भाषाई महत्व

भोयरी बोली में पर्व-त्योहारों के नामकरण के पीछे गहरा अर्थशास्त्र और धर्मशास्त्र निहित है—

  • पोला और कर (Pola & Kar): ‘पोला’ बैलों का पर्व है, जो कृषि-प्रधान अर्थव्यवस्था का प्रतीक है। इसके अगले दिन मनाया जाने वाला ‘कर’ (जुआ खेलना) केवल मनोरंजन नहीं, बल्कि नियतिवाद (Fatalism) और कर्म-सिद्धांत का व्यावहारिक प्रशिक्षण है—जिसमें जीवन की हार-जीत को खेल भावना से स्वीकार करना सिखाया जाता है।

  • अखाड़ी और अखेजी: यह ‘अक्षय तृतीया’ का अपभ्रंश है, जिसे कृषि वर्ष के शुभारंभ के रूप में देखा जाता है।


6. निष्कर्ष (Conclusion)

समग्र विश्लेषण के आधार पर यह कहा जा सकता है कि भोयरी (पवारी) केवल एक बोली नहीं, बल्कि एक जीवंत ऐतिहासिक दस्तावेज है। इसमें मालवा के परमारों का शौर्य, निमाड़ का अल्हड़पन और महाराष्ट्र की सामाजिक व्यवस्था का सामंजस्यपूर्ण समावेश दिखाई देता है।

वैश्वीकरण के वर्तमान दौर में, जब अनेक छोटी बोलियाँ विलुप्ति के कगार पर हैं, ‘चनुक-झुनुक’ जैसे शब्दकोशों का निर्माण और भोयरी बोली का संरक्षण केवल भोयर समाज के लिए ही नहीं, बल्कि भारतीय भाषाविज्ञान के लिए भी अत्यंत आवश्यक है। यह बोली प्रमाणित करती है कि संस्कृति स्थिर नहीं होती, बल्कि नदी की भाँति प्रवाहमान रहती है—जो अपने मार्ग में आने वाले प्रत्येक क्षेत्र के रंगों और शब्दों को आत्मसात करती चलती है।


शोध संदर्भ

  • चनुक-झुनुक (पवारी शब्दकोश) — वल्लभ डोंगरे, सतपुड़ा संस्कृति संस्थान, भोपाल।

  • मध्य भारत की जनजातीय एवं जातीय बोलियों का तुलनात्मक अध्ययन।



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Friday, 6 February 2026

भोयर पवार (क्षत्रिय पवार) समुदाय: औपनिवेशिक दस्तावेजों और ऐतिहासिक यथार्थ का तुलनात्मक विश्लेषण, Bhoyar Pawar



भोयर पवार (क्षत्रिय पवार) समुदाय: औपनिवेशिक दस्तावेजों और ऐतिहासिक यथार्थ का तुलनात्मक विश्लेषण

सार (Abstract) भोयर पवार (क्षत्रिय पवार) समुदाय मध्य भारत (बैतूल, छिंदवाड़ा, वर्धा) का एक प्रमुख सामाजिक समूह है। औपनिवेशिक काल (1900 से पूर्व) के दस्तावेजों में इस समुदाय को अक्सर 'भोयर' नाम से संबोधित किया गया और इनकी उत्पत्ति को लेकर कई भ्रांतियां दर्ज की गईं। हालांकि, आधुनिक शोध और वंशावली साक्ष्यों से यह सिद्ध होता है कि यह समुदाय 72 क्षत्रिय कुलों का एक संघ है जो मुगल काल में मालवा से विस्थापित होकर सतपुड़ा अंचल में बसा। यह आलेख 1900 से पूर्व के दस्तावेजों का विश्लेषण करता है और उपलब्ध शोध स्रोतों के आधार पर उनका औचित्य सिद्ध करता है।


भाग 1: 1900 से पूर्व के दस्तावेजों में उल्लेख (Historical Records Pre-1900)

1900 से पहले के ब्रिटिश और मुगलकालीन दस्तावेजों में इस समुदाय के बारे में निम्नलिखित महत्वपूर्ण जानकारियां मिलती हैं:

1. आइन-ए-अकबरी (16वीं शताब्दी) मुगल बादशाह अकबर के दरबारी अबुल फजल द्वारा लिखित 'आइन-ए-अकबरी' (Vol. II) में गोंड राजा जटबा (देवगढ़) की सैन्य शक्ति का वर्णन मिलता है। इसमें उल्लेख है कि जटबा की सेना में बड़ी संख्या में घुड़सवार और पैदल सैनिक थे। आधुनिक विश्लेषण बताता है कि इस सेना में "पंवार" (Panwar) समुदाय का महत्वपूर्ण योगदान था, जो घुड़सवार सेना (Cavalry) का मुख्य हिस्सा थे,। यह दस्तावेज 1900 से बहुत पहले का है और यह पुष्टि करता है कि पवार समुदाय उस समय एक योद्धा वर्ग के रूप में स्थापित था।

2. रिचर्ड जेनकिन्स की रिपोर्ट (1827) नागपुर के राजा के दरबार में रेजिडेंट रिचर्ड जेनकिन्स ने 1827 में "Report on the Territories of the Raja of Nagpore" प्रस्तुत की। इस रिपोर्ट में लिखा गया है:

"देवगढ़ में मराठा विजय से पहले सभी कृषक वर्ग स्थापित हो चुके थे... क्षत्रिय कृषकों के चार वर्ग बख्त बुलंद के शासनकाल में हिंदुस्तान (उत्तर भारत) से आए थे। इनमें लोधी और पवार (Powars) प्रमुख हैं। पवारों का कहना है कि उनके पूर्वजों को औरंगजेब के शासनकाल में मालवा के धार से निष्कासित किया गया था",। यह दस्तावेज स्पष्ट करता है कि 1827 तक यह समुदाय खुद को मालवा के धार से विस्थापित मानता था।

3. भारत की जनगणना और गजेटियर्स (1891 और 1901) ब्रिटिश कालीन जनगणना रिपोर्ट्स (विशेषकर 1891 और 1901) और सेंट्रल प्रोविंस गजेटियर्स में इस समुदाय के बारे में विस्तृत, लेकिन कई बार भ्रामक, जानकारी दी गई:

  • नाम और बोली: 1891 की जनगणना (वॉल्यूम 11) में 'भोयरी' (Bhoyari) को एक बोली के रूप में दर्ज किया गया और इसे पवार जाति की भाषा बताया गया। रिपोर्ट में कहा गया कि यह राजस्थानी हिंदी का एक रूप है जो मालवा से आई है, लेकिन अब इसमें मराठी और स्थानीय शब्दों का मिश्रण है,।
  • 'भोयर' शब्द की उत्पत्ति (औपनिवेशिक दृष्टिकोण): 1901 की जनगणना और छिंदवाड़ा गजेटियर में एक कहानी दर्ज है कि जब औरंगजेब ने धार नगरी पर आक्रमण किया, तो पवार राजपूतों ने शहर की रक्षा की। लेकिन वे हार गए और सुबह (भोर) होने पर शहर से भाग निकले, इसलिए अपमानजनक रूप से उन्हें "भोयर" (सुबह भागने वाले) कहा गया।
  • सामाजिक स्थिति: ब्रिटिश अधिकारियों ने लिखा कि इन लोगों ने राजपूत रीति-रिवाजों को त्याग दिया है और वे अब साधारण कृषक जातियों (जैसे कुर्मी या कुनबी) की श्रेणी में आते हैं, हालांकि उनके पूर्वज निश्चित रूप से 15वीं शताब्दी में होशंग शाह या औरंगजेब के समय राजपूताना से आए थे।

भाग 2: ऐतिहासिक औचित्य और विश्लेषण (Justification & Analysis based on Sources)

1900 से पहले के दस्तावेजों में दी गई जानकारी का आधुनिक शोध और वंशावली रिकॉर्ड्स (Genealogical Records) के आधार पर विश्लेषण करने पर वास्तविक इतिहास कुछ अलग और गौरवशाली रूप में सामने आता है।

1. 'भोयर' नाम का औचित्य: स्थान सूचक ब्रिटिश गजेटियर्स में दी गई (भोर) वाली कहानी को आधुनिक शोध खारिज करते हैं।

  • विश्लेषण: स्रोतों के अनुसार, जब पवारों ने मालवा से पलायन किया, तो वे बैतूल जिले में आए और सबसे पहले 'भंवरगढ़' किले में शरण ली। इस किले को स्थानीय बोली में 'भोयरगढ़' भी कहा जाता था। चूंकि वे इस किले में निवास करते थे, इसलिए स्थानीय आदिवासियों और निवासियों ने उन्हें "भोयर" (भोयरगढ़ वाले) कहना शुरू कर दिया,,।
  • निष्कर्ष: 'भोयर' शब्द उनके प्रारंभिक निवास स्थान (भंवरगढ़ किला) का सूचक है। 20वीं सदी की शुरुआत (1914-1939) में समाज ने इस भ्रांति को दूर करने के लिए आंदोलन चलाया और पुनः 'पवार' शब्द को अपनाया,।

2. उत्पत्ति: 72 कुलों का संघ (Confederacy Theory) जेनकिन्स (1827) और गजेटियर्स उन्हें केवल "धार के पवार" कहते हैं, लेकिन आंतरिक स्रोत इसे विस्तार देते हैं।

  • विश्लेषण: वंशावली लेखकों (भाट/राव) के अनुसार, यह समुदाय केवल परमार वंश का सीधा वंशज नहीं है, बल्कि यह 72 अलग-अलग क्षत्रिय कुलों (जैसे- परमार, चौहान, सोलंकी, परिहार, राठौर, गहलोत, तोमर आदि) का एक संघ (Confederacy) है,,।
  • औचित्य: मालवा में मुगलों के खिलाफ शक्ति जुटाने के लिए इन अलग-अलग राजपूत वंशों ने एक संघ बनाया और आपस में विवाह (Endogamy) की प्रथा शुरू की। इसी संघ को सामूहिक रूप से 'पवार' कहा गया। 1900 से पहले के दस्तावेजों में 'पवार' और 'भोयर' दोनों शब्दों का प्रयोग इसी मिश्रित पहचान को दर्शाता है,।

3. "राजपूत रीति-रिवाज त्यागने" के दावे का खंडन ब्रिटिश रिकॉर्ड्स (1891) में कहा गया कि वे "Debased Rajputs" (पतित राजपूत) हैं क्योंकि उन्होंने जनेऊ और तलवार छोड़ दी।

  • विश्लेषण: स्रोतों के अनुसार, यह पतन नहीं बल्कि अनुकूलन (Adaptation) था। औरंगजेब और मुगलों के अत्याचारों से बचने के लिए, इन क्षत्रियों ने अपनी पहचान छिपाई। उन्होंने जनेऊ त्यागकर 'करदोड़ा' (कमर का धागा) अपनाया और तलवार की जगह हल (कृषि) को चुना ताकि वे मुगलों की नजरों से बच सकें और अपनी संस्कृति की रक्षा कर सकें,,।
  • औचित्य: यह एक रणनीतिक निर्णय था। उन्होंने 'दशहरा पर शस्त्र पूजन' और अपनी विशिष्ट बोली 'पवारी' के माध्यम से अपनी क्षत्रिय जड़ों को जीवित रखा। 1827 की रिपोर्ट में उन्हें "क्षत्रिय कृषक" कहा जाना इस बात का प्रमाण है कि उनकी मूल पहचान सुरक्षित थी,।

4. भाषा (पवारी/भोयरी) का ऐतिहासिक प्रमाण 1891 की जनगणना में भोयरी को "टूटी-फूटी मालवी" कहा गया।

  • विश्लेषण: आधुनिक भाषाई विश्लेषण पुष्टि करता है कि पवारी बोली राजस्थानी मालवी का ही रूप है। इसमें प्रवास के दौरान बुंदेली (बैतूल/छिंदवाड़ा में) और मराठी (वर्धा में) का मिश्रण हुआ,,।
  • औचित्य: यह तथ्य कि यह बोली केवल इसी समुदाय द्वारा बोली जाती है और इसका मूल मालवा में है, जेनकिन्स (1827) के उस दावे को वैज्ञानिक आधार देता है कि ये लोग मालवा से आए थे।

5. सैन्य इतिहास और देवगढ़ राज्य आइन-ए-अकबरी (16वीं सदी) में जटबा की सेना का जिक्र है, लेकिन उसमें जाति स्पष्ट नहीं थी।

  • विश्लेषण: आधुनिक शोध (राजेश बारंगे पवार एवं अन्य) यह स्थापित करते हैं कि जटबा की सेना के "2000 घुड़सवारों" का बड़ा हिस्सा यही भोयर पवार थे। उनकी वीरता के कारण ही गोंड राजाओं ने उन्हें मुलताई, पांढुर्ना और सौसर में बड़ी जागीरें और "महाजन/पटेल" की उपाधियाँ दीं,,।
  • औचित्य: यह समुदाय केवल शरणार्थी नहीं था, बल्कि देवगढ़ राज्य का एक प्रमुख सैन्य और जमींदार वर्ग था, जैसा कि 1827 की रिपोर्ट में "सबसे प्रमुख कृषक वर्ग" के रूप में संकेत दिया गया है।

निष्कर्ष (Conclusion) 1900 से पहले के दस्तावेज (विशेषकर ब्रिटिश गजेटियर्स) भोयर पवार समुदाय के प्रवास और मूल स्थान (मालवा/धार) की सही जानकारी देते हैं, लेकिन वे "भोयर" नाम की उत्पत्ति और उनकी सामाजिक स्थिति को समझने में औपनिवेशिक पूर्वाग्रहों के शिकार रहे। आधुनिक शोध और वंशावली साक्ष्यों ने सिद्ध किया है कि:

  1. यह समुदाय 72 क्षत्रिय कुलों का एक संघ है।
  2. 'भोयर' नाम भंवरगढ़ किले में निवास के कारण पड़ा
  3. कृषि और 'करदोड़ा' अपनाना मुगलों से बचने की एक रणनीति थी, न कि क्षत्रिय धर्म का पतन।

अतः, यह समुदाय ऐतिहासिक रूप से "मालवा के 72 कुलों का क्षत्रिय संघ" है, जिसने सतपुड़ा के जंगलों को आबाद किया और अपनी संस्कृति को संरक्षित रखा।


संदर्भ (References):

ऊपर लिखे गए लेख (आर्टिकल) की प्रामाणिकता और विस्तृत अध्ययन के लिए, स्रोतों में उपलब्ध संदर्भों (References) की एक व्यापक सूची यहाँ दी गई है। इन संदर्भों को ऐतिहासिक दस्तावेजों, जनगणना रिपोर्ट्स, और सामुदायिक शोध पुस्तकों में वर्गीकृत किया गया है:

1. ऐतिहासिक दस्तावेज और गजेटियर्स (Historical Documents & Gazetteers)

  • रिचर्ड जेनकिन्स (1827): Report on the Territories of the Raja of Nagpore submitted to the Supreme Government of India. (यह दस्तावेज पुष्टि करता है कि पवार औरंगजेब के समय मालवा से आए थे),.
  • अबुल फजल: आइन-ए-अकबरी (Ain-i-Akbari), वॉल्यूम II (कर्नल एच.एस. जैरेट द्वारा अनुवादित)। (इसमें देवगढ़ के गोंड राजा जटबा की सेना और सैन्य संरचना का विवरण है),.
  • आर.वी. रसेल (1916): The Tribes and Castes of the Central Provinces of India, वॉल्यूम II, मैकमिलन एंड कंपनी, लंदन। (भोयर/पवार जाति का नृवंशविज्ञान विवरण),.
  • सेंट्रल प्रोविंस गजेटियर्स:
    • Central Provinces District Gazetteers, Volume 9, Part 1 (बैतूल, छिंदवाड़ा, वर्धा का विवरण).
    • Betul District Gazetteer (ट्रेंच, सी.जी.सी., 1923 - Final Report on the Re-settlement of the Betul District).
    • Chhindwara District Gazetteer.
    • Wardha District Gazetteer.
  • डब्ल्यू. डब्ल्यू. हंटर (1885): The Imperial Gazetteer of India, ट्रूबनर एंड कंपनी,.

2. भारत की जनगणना रिपोर्ट्स (Census of India Reports)

  • 1891 की जनगणना: Census of India, 1891: The Central Provinces and Feudatories, वॉल्यूम 11, पार्ट 1 (लेखक: बी. रॉबर्टसन)। (पवारी/भोयरी बोली और जाति का उल्लेख).
  • 1901 की जनगणना: Census of India, 1901, वॉल्यूम 13, पार्ट 1 (लेखक: आर.वी. रसेल)। (पवारों की उत्पत्ति और 72 कुलों का संदर्भ),.
  • 1911 की जनगणना: Census of India, 1911 (ई.ए. गेट द्वारा रिपोर्ट).
  • अन्य जनगणना वर्ष: 1921 और 1931 की जनगणना रिपोर्ट्स में पवार जनसंख्या के आंकड़े,.

3. सामुदायिक शोध पुस्तकें और साहित्य (Community Research Books & Literature)

  • डॉ. ज्ञानेश्वर टेंभरे (2014): पवारी ज्ञानदीप (Pawari Gyandeep), दूसरा संस्करण, हिमालय पब्लिशिंग हाउस, मुंबई। (पवार समाज का इतिहास, 72 कुल और संस्कृति का विस्तृत विवरण),.
  • वल्लभ डोंगरे (2013): सीखो सबक पंवारो (Sikho Sabak Pawaro), सतपुड़ा संस्कृति संस्थान, भोपाल।.
  • वल्लभ डोंगरे (1989): पवारी पहेलियाँ, सतपुड़ा संस्कृति संस्थान, भोपाल। (पवारी लोकसाहित्य और पहेलियों का संग्रह).
  • पन्नालाल बिसेन (1986): भोजपत्र (Bhojpatra) एवं पवार ज्योति लेख। (पवारों के प्रवास और वैनगंगा पवारों के साथ संबंधों पर),.
  • कृष्णराव बालाजी पंवार (1985): पंवार कुल दर्शन (Panwar Kul Darshan), पंवार संदेश।,.
  • रामकिशोर पवार (2022): पुस्तक मेरा बैतूल (Pushtak Mera Betul), बीएफसी पब्लिकेशन।.

4. वंशावली और शोध पत्र (Genealogy & Research Papers)

  • वंशावली लेखक (भाट): मदनसिंह जी मोरसिंह बड़वाजी (भीलवाड़ा, राजस्थान) और राजकुमार सारोठ (छिंदवाड़ा)। (72 कुलों और गोत्रों की मूल वंशावली के प्रमाण),,.
  • राजेश बारंगे पवार (2024):
    • "Kshatriya Pawar (72 clan): Journey from Malwa to Satpura" (लैम्बर्ट पब्लिशिंग)।,.
    • "A Study of the Pawar Community Gotra (surnames) in Central India" (शोध पत्र)।.
    • "Historical Migration and Socio-Cultural Continuity" (शोध पत्र)।.
  • प्रणय चोपड़े: भोयर (पवार/भोयर पवार): एक परिचय और संघ से जाति तक (शोध पत्र)।.

5. भाषा और लिपि (Language & Linguistics)

  • जी.ए. ग्रियर्सन (1908): Linguistic Survey of India। (पवारी/भोयरी बोली का भाषाई विश्लेषण और इसे राजस्थानी मालवी से जोड़ना).
  • डॉ. मंजू अवस्थी (1995): बालाघाट जिले की जन बोलियों का भाषावैज्ञानिक एवं सांस्कृतिक अध्ययन।.
  • शिवानी बरखाड़े/पवार: पवारी (भोयरी) बोली: सांस्कृतिक, भाषाई और लोक साहित्यिक विश्लेषण (लेख)।.

यह सूची लेख को ऐतिहासिक, सामाजिक और मानवविज्ञानी दृष्टिकोण से पूरी तरह प्रामाणिक बनाती है।

Thursday, 5 February 2026

परमार (पंवार) वंश की शाखाएँ : विस्तृत ऐतिहासिक विवरण

 

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परमार (पंवार) वंश की शाखाएँ : विस्तृत ऐतिहासिक विवरण

परमार (पंवार) वंश भारत के प्राचीन और प्रतिष्ठित राजवंशों में से एक रहा है। यह वंश अग्निवंशी क्षत्रियों में गिना जाता है और इसका राजनीतिक, सांस्कृतिक तथा सामाजिक प्रभाव पश्चिम, मध्य और उत्तर भारत के विशाल भू-भाग में दिखाई देता है। समय के साथ परमार वंश की अनेक शाखाएँ बनीं, जो अलग-अलग क्षेत्रों में शासन, सैन्य सेवा और सामाजिक नेतृत्व के रूप में विकसित हुईं।


1. परमार वंश की उत्पत्ति और विस्तार

इतिहासकारों के अनुसार परमार वंश का प्रारंभिक केंद्र मालवा रहा, जहाँ से यह वंश राजस्थान, गुजरात, महाराष्ट्र, विदर्भ, सतपुड़ा, उत्तराखंड (गढ़वाल) तथा सिंध–मरुस्थलीय क्षेत्रों तक फैला।
भौगोलिक विस्तार के कारण भाषा, उच्चारण और स्थानीय परंपराओं के प्रभाव से परमार पंवार पवार पोवार भोयर जैसे रूप विकसित हुए।


2. प्रमुख शाखाएँ और उनके क्षेत्र

(क) मालवा शाखा

मालवा परमारों की सबसे प्रसिद्ध और ऐतिहासिक रूप से सुदृढ़ शाखा रही।

  • क्षेत्र: धार, उज्जैन, मांडू
  • विशेषता: विद्या, स्थापत्य और प्रशासन
  • प्रसिद्ध शासक:
    • राजा भोजविद्वान, साहित्यकार और महान शासक
    • उदादित्य, सिंधुराज
  • धार्मिक केंद्र: महाकालेश्वर (उज्जैन), ओंकारेश्वर
  • कुलदेवी: कालिका माता (धार)

(ख) राजस्थान की परमार शाखाएँ

राजस्थान में परमार वंश की अनेक उप-शाखाएँ विकसित हुईं, जो स्थानीय सत्ता, दुर्गों और धार्मिक केंद्रों से जुड़ी रहीं।

1. सोढ़ा परमार

  • उत्पत्ति: नौकोटी मारवाड़
  • संस्थापक परंपरा: धरणीवराह
  • शासन क्षेत्र: जैसलमेर–बाड़मेर से अमरकोट (वर्तमान पाकिस्तान)
  • विशेषता: मरुस्थलीय किलों और सीमावर्ती रक्षा में भूमिका

2. सांखला परमार

  • संबंध: सोढ़ा परमारों के भाई बाघ के वंशज
  • धार्मिक पहचान: सच्चियाय माता
  • क्षेत्र: नागौर, बीकानेर, जोधपुर क्षेत्र

3. मोरी (मौर्य/मोरी)

  • प्राचीन शाखा
  • संबंध: चित्तौड़ के मान मोरी
  • महत्व: परमार सत्ता से पूर्व के राजनैतिक संक्रमण की कड़ी

4. डोडिया परमार

  • काल: 9वीं शताब्दी से पूर्व
  • क्षेत्र: दक्षिणी राजस्थान और मालवा की सीमाएँ

5. अन्य राजस्थान शाखाएँ

  • कल्लावत
  • धोधिंग
  • बोया
  • देहलावत
    ये शाखाएँ स्थानीय नामों, ग्रामों और सैन्य सेवाओं के आधार पर बनीं।

(ग) गढ़वाल (उत्तराखंड) की पंवार शाखा

  • क्षेत्र: गढ़वाल हिमालय
  • राजनीतिक पहचान: गढ़वाल साम्राज्य
  • प्रसिद्ध शासक: राजा भानु प्रताप
  • विशेषता: पहाड़ी प्रशासन, सीमांत रक्षा और स्थानीय संस्कृति का संरक्षण
  • यहाँ परमार पंवार नाम स्थायी रूप से स्थापित हुआ।

(घ) विदर्भ–सतपुड़ा क्षेत्र : भोयर पंवार

  • क्षेत्र: विदर्भ, सतपुड़ा, बैतूल, छिंदवाड़ा
  • पहचान: भोयर पंवार
  • परंपरा: धार–मालवा से स्थानांतरण की लोकस्मृतियाँ
  • विशेषता: कृषि, सैन्य सेवा और स्थानीय शासन में योगदान

(ङ) अन्य महत्वपूर्ण शाखाएँ

ये शाखाएँ प्रायः स्थान, व्यक्तिनाम या स्थानीय उपाधियों पर आधारित रहीं:

  • चन्ना
  • बीहल
  • बूंटा
  • सुमरा
  • ऊमठ
  • हूण
  • सांवत
  • कुंतल
  • हुरड़
  • सुजान
  • रबड़िया
    इन शाखाओं का उल्लेख विभिन्न क्षेत्रीय इतिहास, वंशावलियों और लोककथाओं में मिलता है।

3. धार्मिक और सांस्कृतिक पहचान

  • कुलदेवी:
    • सच्चियाय माता (मारवाड़ क्षेत्र)
    • कालिका माता (धार–मालवा)
  • कुलदेवता:
    • महाकालेश्वर (उज्जैन)
    • ओंकारेश्वर (नर्मदा तट)

धर्म, शक्ति-उपासना और शिवभक्ति परमार वंश की साझा पहचान रही है।


4. उपाधियाँ और नाम-रूप

क्षेत्रीय भाषाओं और प्रशासनिक अभिलेखों के कारण परमार वंश के नाम कई रूपों में प्रचलित हुए:

  • परमार
  • पंवार
  • पवार
  • पोवार
  • भोयर

ये सभी नाम ऐतिहासिक रूप से एक ही मूल वंश से जुड़े माने जाते हैं।


5. ऐतिहासिक महत्व और विरासत

परमार (पंवार) वंश की शाखाओं ने भारत के विभिन्न हिस्सों में शासन, संस्कृति, साहित्य, धर्म और समाज को गहराई से प्रभावित किया। मालवा के विद्वान शासकों से लेकर मरुस्थल के योद्धाओं और हिमालयी राजाओं तक—इस वंश की विरासत बहुआयामी और समृद्ध रही है।
आज भी विभिन्न क्षेत्रों में रहने वाले पंवार/पवार/भोयर समुदाय अपनी ऐतिहासिक जड़ों, कुलदेवी–कुलदेवता और परंपराओं के माध्यम से इस गौरवशाली विरासत को जीवित रखे हुए हैं।

 

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