Sunday, 3 September 2023

पवार समाज अग्निकुंड से उत्पन्न

 

पवार समाज अग्निकुंड से उत्पन्न

इतिहासकारों के अनुसार करीबन 2500 वर्ष ईसा पूर्व पवार (परमार) जाति की उत्पत्ति माउंटआबू (राजस्थान) में अग्निकुंड से हुई। तत्कालीन दानव दैत्यों से परेशान ऋषि-मुनियों ने महर्षि वशिष्ठ के मार्गदर्शन में एक अग्निकुंड तैयार किया और अग्नि प्रज्जवलित कर एक मानव निकाला। इसका नाम परमार रखा और इसे संतों की रक्षा का दायित्व सौंपा। इसके बाद दूसरा मानव पैदा किया और इसका नाम सोलंकी तथा तीसरे मानव को पैदा कर उसका नाम चालुक्य रखा। इस प्रकार ये सभी इनके वंशज अग्निवंशीय परमार कहलाए। गौत्र का अभिप्राय उत्पत्ति से होता है और परमारों की उत्पत्ति वशिष्ठ द्वारा की गई है, इसीलिए इनका गौत्र वशिष्ठ है तथा कुलदेवी धार की गढ़कालिका हैं।

इस जाति ने जन्म से ही मानव समाज की रक्षा, समृद्धि एवं प्रतिष्ठा को अपना मूल कर्त्तव्य मानकर आदर्श भूमिका निभाई है। प्रगट होते ही पवार वीरों ने दानव-दैत्यों का संहार कर ऋषि महर्षि तथा सर्वसाधारण जनमानस को सुरक्षा प्रदान की। मां दुर्गा (महामाया) को आराध्य तथा धार को

अपनी कर्मभूमि बनाया। कुछ काल गुमनामी में बिताने के बाद ईसा पूर्व 761 में बौद्ध धर्मियों से परेशान होकर महाबाहु नामक ऋषि ने आबू समीप अचलगढ़ चंद्रावती राज्य की स्थापना की। ईसा पूर्व 400 वर्ष में महाप्रतापी नृपति, आदित्य पवार, विक्रमादित्य आदि ने इस जाति का ने गौरव चारों ओर फैलाया। इसी परमार वंश ने आगे ईसा 791 से 1310 तक राजा भोज, उपेन्द्र, बैरीसिंह, मंजुदेव, भोजदेव, जयसिंह, उदयादित्य, जगदेव, नर बर्मन , महाप्रतापी शूर एवं विद्वान नृपति गणों को जन्म दिया। इन्होंने धार, उज्जैन, बागड़, जालौर, आबू तथा भिन्माल में राज्य कर मालवा को समृद्धशाली बनाया। परमार राजवंश का आधिपत्य मालवा से प्रारंभ होकर देश के कई हिस्सों में फैला था, जिसका प्रामाणिक इतिहास डॉ. गांगुली, डॉ. व्यंकटाचलम और कई विद्वान लेखकों, इतिहासकारों के शोध प्रबंध ग्रंथों में मिलता है। राजा भोज ने राज्य की राजधानी उज्जैन से हटाकर धार में स्थापित की थी। उस काल में धार का नाम धारा नगरी था। राजाभोज का किला, भोजशाला इस बात के प्रमाण हैं।

समय बदलता गया राजपूताने और मालवा पर मुगल शासकों का आक्रमण होने लगा। कुछ राजा भोज के शासनकाल में तो कुछ इसके बाद परमारों का बिखराव होता चला गया। पवारों के पूर्वज मुगल सेना के आक्रमण और अत्याचार से परेशान

हो गए थे। मुगलों ने धार को तहस- नहस कर दिया था। वे महिलाओं पर भारी अत्याचार करते थे। फिर भी जांबाज वीर योद्धा होने के कारण पवार काफिले के साथ मुगल सेना का मुकाबला करते हुए धार से होशंगाबाद नर्मदा किनारे पहुंचे, यहां से अलग-अलग टुकिड्यां में नर्मदा में जनेऊ विसर्जित करके अलग- अलग स्थानों क्रमशः बैतूल, छिंदवाड़ा, सिवनी, बालाघाट, गोंदिया, भंडारा, नागपुर, छत्तीसगढ़, हिमाचल प्रदेश के टिहरी गढ़वाल क्षेत्र, बिहार, गुजरात, राजस्थान, दक्षिण में महाराष्ट्र और मैसूर तक बिखरते गए और वहां बसते गए। महाराष्ट्र में छत्रपति शिवाजी के सहयोगी योद्धा परमार वंश के लोग आज मराठा पवार कहलाते हैं। उस काल में उन विषम परिस्थितियों में जो जिस भूखंड पर बस गया। उसने उस क्षेत्र की बोली, पहनावा, खानपान अपना लिया। यहां तक कि उनके सरनेम भी बदल गए, किंतु इनके रीति-रिवाजों एवं बोली में मालवा की संस्कृति के अंश आज भी विद्यमान हैं।

Thursday, 12 May 2022

परमार वंश की प्रमुख शाखाएं

परमार वंश 

        राजा भोज परमार वंश के नवे शासक थे । राजा भोज एक बहुत ही विद्वान, प्रतापी और शक्तिशाली शासक थे। राजा भोज एक सर्वगुण संपन्न शासक थे जिनके दरबार में कई विद्वान रहते थे। मध्य प्रदेश की वर्तमान राजधानी भोपाल को बसाने का श्रेय राजा भोज को ही जाता है। राजा भोज एक अच्छी  कवि भी थे तथा उनके राज दरबार में देश-विदेश से बड़े बड़े कवि आकर अपनी कला का प्रदर्शन करते थे।राजा भोज की मृत्यु के बाद परमार वंश को उदयादित्य ने संभाला और आगे बढ़ाया।

परमार वंश की प्रमुख शाखाएं या खांपे

        वराह, लोदरवा परमार, बूंटा परमार, चन्ना परमार, मोरी परमार, सुमरा परमार, उमट परमार, बीहल परमार,               डोडिया परमार, सोढा परमार, नबा, देवा, बजरंग, उदा, महराण, सादुल, अखैराज, जैतमल, सूरा, मधा, धोधा,              तेजमालोट, करमिया, विजैराण, नरसिंह, सुरताण, नरपाल,गंगदास, भोजराज, आसरवा, जोधा, भायल, भाभा,               हुण, सावंत, बारड, सुजान, कुंतल, बलिला, गुंगा, गहलड़ा, सिंधल, नांगल, भोयर पंवार , पोवार।

Wednesday, 20 April 2022

मध्यप्रदेश के बैतूल जिले के पंवारों का इतिहास एवं वर्तमान:-

मध्यप्रदेश के बैतूल जिले के पंवारों का इतिहास एवं वर्तमान:-

          बैतूल जिले में भाट(रावजी )के मतानुसार पंवार समाज के पूर्वज धार नगरी से बैतूल आए थे। जिले में लगभग पंवारों के 200 गांव है।  बैतूल जिले के पंवार अग्निवंशी है, पहले इन्हें भोयर पंवार से भी जाना जाता था इनका गोत्र वशिष्ठ है, प्रशाखा प्रमर या प्रमार है। ये पूर्ण रूप से परमार (पंवार) राजपूत क्षत्रिय है।

 वेद में इन जातियों को राजन्य और मनुस्मृति में बाहुज, क्षत्रिय, राजपुत्र तथा राजपूत और ठाकुरों के नाम से संबोधित किया है। सभी लोग अपने भाट, रावजी, बड़वाजी (ये तीनों नाम अलग अलग एरिया में अलग अलग नाम से जाने जाते हैं, बैतूल जिले में इन्हें भाट कहते हैं ।)

इनसे  अपने वास्तविक इतिहास की जानकारी अवश्य लें ताकि आने वाली पीढ़ी को भविष्य में यह पता रहे कि वे कौन से पंवार है उनका गोत्र क्या है? हमारे वंश के महापुरूष कौन है। जब मालवा धार से पंवार, मुसलमानों से युद्ध करते हुए नर्मदा के तट  होशंगाबाद तक पहुंचे तब वहां उस समय कि परिस्थितियों के कारण सभी लोगों ने अपने जनेऊ उतारकार नर्मदा नदी में डाल दिए थे। भाट लोगों के अनुसार ये सभी परमार शाकाहारी थे, मांस मदिरे का सेवन नहीं करते थे। 

वेदिक सोलह संस्कारों को अपनाते थे किंतु समय और विषम परिस्थितियों के कारण सेना के इस समूह की टुकडिय़ां क्रमश: बैतूल, छिंदवाड़ा, सिवनी, बालाघाट, मंडला, जबलपुर, रायपुर, बिलासपुर, राजनांदगांव, भिलाई, दुर्ग तथा महाराष्ट्र के नागपुर, भंडारा गोंदिया, तुमसर, वर्धा, यवतमाल, अमरावती, बुलढाना आदि जिलों में जाकर बस गए। बैतूल और छिंदवाड़ा के पंवारों को उस समय यहां रहने वाली जातियों के लोगों ने अपनी बोली से भुईहर कहा जो अपभ्रंस होकर भोयर कहलाये। उस समय की भोगौलिक परिस्थिति तथा आर्थिक मजबूरियों के कारण ये समस्त पंवार अपने परिवार का पालन पोषण करने के चक्कर में अपने मूल रीति रिवाज और मूल संस्कार भूलते चले गए। 

सभी ओर क्षेत्रीय भाषा का प्रभाव बढ़ गया इसलिए इन सभी क्षेत्रों में वहां की स्थानीय भाषा का अंश पंवारों की भाषा में देखने आता है किंतु आज भी पंवार समाज की मातृभाषा याने बोली में मालवी भाषा और राजस्थानी भाषा के अधिकांश शब्द मिलते है।   और सभी वर्ण के लोगों की उपत्ति किसी न किसी ऋषि के माध्यम से ही हुई है। हमें गर्व है कि हमारी उत्पत्ति अग्निकुंड से हुई है। और हमारे उत्पत्ति कर्ता ऋषियों में श्रेष्ठ महर्षि वशिष्ठ है, इसलिए हमारा गोत्र वशिष्ठ है। 


बैतूल जिले के पंवारों के गांव की सूची 

बैतूल तहसील क्षेत्र के गांव :-

1. बैतूल नगरीय क्षेत्र 2. बैतूलबाजार नगरीय क्षेत्र, 3. बडोरा 4. हमलापुर, 5. सोनाघाटी, 6. दनोरा, 7. भडूस, 8. परसोड़ा 9. ढोंडबाड़ा, डहरगांव, बाबर्ई, डोल, महदगांव, ऊंचागोहान, रातामाटी, खेड़ी सांवलीगढ़, सेलगांव, रोंढा, करजगांव, नयेगांव, सावंगा, कराड़ी, भोगीतेढ़ा, भवानीतेढ़ा, लोहारिया, सोहागपुर, बघोली, सापना, मलकापुर, बाजपुर, बुंडाला, खंडारा, बोड़ीबघवाड़, ठेसका, राठीपुर, खेड़ी भैंसदेही, शाहपुर, भौंरा, घोड़ाडोंगरी, पाथाखेड़ा, शोभापुर, सारणी क्षेत्र, भारत भारती, जामठी, बघडोना, झगडिय़ा, कड़ाई, मंडई, गजपुर, बाजपुर, पतरापुर, सांपना, खेड़लाकिला, चिखल्या (रोंढा), कोरट, मौड़ी, कनाला, बयावाड़ी

मुलताई तहसील क्षेत्र के गांव:- 

मुलताई नगरीय क्षेत्र, थावर्या, कामथ, चंदोराखुर्द, करपा, परसठानी, देवरी, हरनया, मेलावाड़ी, बूकाखेड़ी, चौथिया, हरदौली, शेरगढ़, मालेगांव, कोल्हया, हथनापुर, सावंगा, डउआ, घाट बिरोली, बरखेड़, पिपरिया, डोब, सेमरिया, पांडरी सिलादेही, जाम, खेड़ी देवनाला, चिचंडा, निंबोरी चिल्हाटी, कुंडई, खंबारा, मल्हारा, कोंढर, जूनापानी, सेमझर, डहरगांव, चैनपुर, तुमड़ी, डोल, मल्हाराखापा, पिपरपानी, नीमदाना, व्हायानिडोरनी, छोटी अमरावती, छिंदखेड़ा, गाडरा, सोमगढ़, झिलपा, नंदबोही, दुनावा, दुनाई, गांगई, मूसाखापा, खल्ला, सोनेगांव, सिपावा, भैंसादंड, मलोलखापा, बालखापा, घाट पिपरिया, सरई, काठी, हरदौली, लालढाना, खामढाना, लीलाझर, बिसखान, मयावाड़ी, थारी, मुंडापार, चिखलीकला, कपासिया, लाखापुर, हिवरा, पारबिरोली, खैरवानी, सावंगी, लेंदागोंदी, मोरखा, तरूणाबुजुर्ग, डुडरिया, पिडरई, जौलखेड़ा, मोही, हेटीखापा, परमंडल, नगरकोट, दिवट्या, बुंडाला, हेटी, खतेड़ाकला, हरनाखेड़ी, अर्रा, बरई, जामुनझिरी, टेमझिरा, बाड़ेगांव, केकड्या, ऐनस, निर्गुण, सेमझिरा, पोहर, सांईखेड़ा, बोथया, ब्राम्हणवाड़ा, खेड़लीबाजार, बोरगांव, बाबरबोह, महतपुर, माथनी, छिंदी, खड़कवार, केहलपुर, तरोड़ा, सोड्ंया, रिधोरा, सोनोरी, सेमरया, जूनावानी, चिचंडा, हुमनपेट, बानूर, खेड़ी बुजुर्ग, उभारिया, खापा, नयेगांव, ससुंद्रा, पंखा, अंधारिया,  सलाई ढाना

आमला नगरीय क्षेत्र - 

जंबाड़ा, बोडख़ी, नरेरा, छिपन्या, पिपरिया, महोली, उमरिया, सोनेगांव, बोरदेही, चिचोली, भैंसदेही, गुबरैल, डोलढाना आदि। 

बैतूल जिले के वर्तमान में पंवारों के भिन्न-भिन्न सरनेम (उपनाम) जिसे आज ये लोग गोत्र कहते है निम्नानुसार है-

परिहार/पराड़कर, पठाड़े, बारंगे/ बारंगा, बुआड़े/बुवाडे,
पिंजारे, गिरहारे/गिरारे, कालभोर/कालभूत,चौधरी,चिकाने,माटे/माटेकर, ढोंडी,गाडरी/गाडरे, रोलक्या,किरणकार/किनकर/किरंजकार, घाघरे, रबड़े/रबड्या, भोभाट/बोबडे, बड़े,दुखी,बारबुहारे, मुनी,बरखेड्या,बागवान,देवासे/देवास्या, फरकाड्या/फरकाड़े, नाडि़तोड़,भादे/भाद्या, कड़वे/कड़वा, रमधम,राऊत/रावत,करदात्या/करदाते, हजारे/हजारी,गाड़क्या/गाकरे,खरफुस्या/खरफूसे/खसखुसे, खौसी/खवसे/कौशिक, पाठेकर/पाठा, मानमोड्या/मानमोड़े, हिंगवे/हिंगवा, डहारे/डाहरे/डालू, डोंगरदिए/डोंगरे, डिगरसे,ओमकार/उकार, टोपल्या/टोपले, गोंदर्या, धोट्या/धोटे, ठावरी, ठूसी,लबाड़,ढूंढाड्या, ढोबारे,गोर्या/गोरे, काटोले/काटवाले, आगरे,डोबले/ढोबारे      कोलया, हरने, ढंडारे/डंडारे/दंडारे, तागड़ी, सेंड्या,गढढे,वाद्यमारे, सबाई, कोडले/कोरडे, कासलेकर/कसारे


पंवारों का मूल गौत्र तो वशिष्ठ ही है ऊपर दिए गए सभी सरनेम या उपनाम है।
    हमारे भाट(राव जी) श्री भैरोसिंह उर्फ बाबूलाल का संपर्क नंबर मोबा-9928079416 राजस्थान। 

उपरोक्त जानकारी प्रकाशन दिनांक तक प्राप्त ग्रामों के नाम तथा सरनेम इस लेख में दिए गए है। भूल-चूक के लिए आप शंकर पवार पत्रकार को मोबाइल-9479363679 पर अपना सुझाव दे सकते हैं।सरनेम, और गांव के नाम में त्रुटि हो सकती है।आप भी समाज के जिम्मेदार व्यक्ति हैं, सही जानकारी देने की कृपा करें।
 स्त्रोत:-

लेखक शंकर पवार पत्रकार 
संपादक स्वतंत्र अभिव्यक्त                      मोबा-9479363679                                                           बैतूल म.प्र

भोयरी (पवारी) बोली: एक भाषाई एवं सांस्कृतिक अनुशीलन- शिवानी पवार (बारंगे) -भोयरी / Bhoyari / Pawari

भोयरी (पवारी) बोली: एक भाषाई एवं सांस्कृतिक अनुशीलन लेखिका: शिवानी पवार (बारंगे) निवास स्थान: देवरी, मुलताई संस्था से संबद्धता: माँ ताप...