Monday, 25 May 2020

भुजलिया (पंवारो/भोयर/भोयर पंवार का मुख्य त्योहार)

*भुजलिया (पंवारो/भोयर/भोयर पंवार का मुख्य त्योहार)*


सावन माह की पूर्णिमा के अगले दिन बनाया जाने वाला पर्व.....
नागपंचमी अगले दिन गेहूं के दानों को बांस की टोकरी में बोया जाता हैं बेटी के टोकरी व एक टोकरी खेत की, और एक टोकरी देव के लिए बोई जाती हैं


अगले 10 दिनों तक बोई गई टोकरी को अंधेरे में रखा जाता हैं एवम बोवाई की उगाई व स्वरूप देख फसल का अंदाजा लगाया जाता है


रक्षाबंधन के दिन चौक पुरकर पटे पर भुजलिया को रख पूजा की जाती हैं रक्षाबन्धन के अगले दिन भुजलिया को पुजा करके किसी, नदी या किसी जल स्त्रोत पर उजा लिया जाता हैं 


भुजलिया को सबसे पहले समीप के किसी मंदिर में चढ़ाया जाता है उसके बाद आसपास व करीबी रिश्तेदार को दिया जाता है जिसमे बड़े छोटो को आशीर्वाद देते हैं भुजलिया पर्व पर एक दुसरो से मिल परस्पर मेल बढ़ाते हैं


भुजलिया उजाना- बेटी की शादी हो जाने पर प्रथम भुजलिया पर भुजलिया उजा दिए जाते हैं जिसमे बॉस की खाली 5 या 7 या अधिक टोकरी मामा मामी, चाचा चाची , बहन, मौसी, बुआ करीबी रिश्तेदार को दी जाती हैं आखिर में एक टोकरी को ससुराल में ले जाया जाता है


इस तरह बेटी के शादी के बाद भुजलिया उजा दिए जाते है एवम अब अगले साल से बेटी के नाम से भुजलिया बोया नही जाते।


भुजलिया उजना यह कि अब बेटी को ससुराल को समर्पित कर दिया गया हैं मा बाप का कर्तव्य बडे लाड़ प्यार को बड़ा कर पड़ना लिखना अब पूरा हुआ अब ससुराल पक्ष में बेटी अपने कर्तव्यों का निर्वाह करे


*लेख - राजेश बारंगे पंवार*
*संशोधन आमंत्रित*


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Wednesday, 13 May 2020

उत्तराखण्ड का परमार वंश या गढ़वाल का पंवार वंश

उत्तराखण्ड का परमार वंश या गढ़वाल का पंवार वंश
➤ गढ़वाल में 54 गढ़ थे। इन 54 गढ़ों पर खश ठकुरियों का अधिकार था। इन गढ़ों में सबसे प्रमुख गढ़ भानू प्रताप द्वारा बसाया गया चाँदपुर गढ़ी था। वर्तमान में सभी गढ़ों में बचा एक मात्र गढ़ चाँदपुर गढ़ी (चमोली) में स्थित है।
➤ गुजरात के राजा कनकपाल ने 888 ई. में गढ़वाल में पंवार वंश की नींव रखी। कनकपाल ने चाँदपुर गढ़ी को अपनी राजधानी बनायी। गढ़वाल पर कुल 60 पवार राजाओं ने शासन किया। पंवार वंश के 34 वें शासक राजा जगतपाल ऐसे प्रथम पंवार शासक हैं जिनकी जानकारी अभिलेख से मिलती है। पंवार वंश के वास्तविक संस्थापक 37 वे शासक अजयपाल को माना जाता है। अजयपाल ने सभी गढ़ों को जीतकर गढ़वाल की सीमा का निर्धारण किया।
➤ अजयपाल ने 1512 में अपनी राजधानी देवलगढ़ (पौढ़ी) स्थानांतरित की। 1517 में अजयपाल ने अलकनन्दा के तट पर स्थित श्रीपुर नामक स्थान की नगर के रूप में नींव रखके उसे अपनी राजधानी बनाया। चाँदपुरगढ़ी-देवलगढ़-श्रीनगर-टिहरी-प्रतापनगर-किर्तीनगर-नरेन्द्रनगर
➤इस वंश के शासक बलभद्रपाल ने सर्वप्रथम शाह की उपाधि प्राप्त की थी। बलभद्रपाल को शाह की उपाधि अकबर ने दी थी। बलभद्र के पश्चात मानशाह शासक बने। मानशाह ने प्रथम गढ़वाली ग्रन्थ मानोदय काव्य की रचना की थी। मानशाह ने कुमाऊँ राजा लक्ष्मी चंद को सात बार हराया था। मानशाह के बाद महीपतिशाह मुख्य शासक हुये। महीपतिशाह के प्रमुख सेनापति माधोसिंह भंडारी थे। माधोसिंह भंडारी को गर्भभंजक कहा जाता है।
➤महीपतिशाह की मृत्यु के पश्चात उनके 7 वर्षीय पुत्र पृथ्वीपति शाह को गढ़वाल का शासक घोषित किया गया। पृथ्वीपति शाह को शासक घोषित कर रानी कर्णावती उनकी संरक्षिता बनी। रानी कर्णावती के समय मुगल सेनापति नवाजद खाँ ने दून क्षेत्र पर आक्रमण किया । रानी कर्णावती ने मुगलों को पराजित कर उनकी सेना के नाक कान कटवा दिये। मुगल सेना के नाक कान काटने के कारण रानी कर्णावती नाककटी रानी कहलायी। मुगल सेना के नाक कान काटने कीक घटना का वर्णन निकोलस मनूची ने हिस्ट्री ऑफ मुगल में किया है। पृथ्वीपति शाह के समय मुगल शहजादा सुलेमान शिकोह (दारा शिकोह का पुत्र) ने गढ़वाल में शरण ली। पृथ्वीपति शाह के पुत्र मेदनीशाह ने सुलेमान शिकोह को जयसिंह को सौंप दिया।
➤ सुलेमान शिकोह को जयसिंह को सौंपने को कारण पृथ्वीपति शाह ने अपने पोते फत्तेपतिशाह को अपना उत्तराधिकारी बनाया। फत्तेपतिशाह के दरबार में नौरत्न मौजूद थे। फत्तेपतिशाह के शासन काल को साहित्य एंव संस्कृति का काल कहा जाता है। फत्तेपतिशाह के समय 1676 में गुरूराम राय श्रीनगर आये।
गुरूरामराय को फत्तेपतिशाह से दून क्षेत्र प्राप्त हुआ जहाँ डेरा डानने के कारण इस स्थान को डेरादून या देहरादून कहा गया।
➤ गुरू रामराय ने धामवाला देहरादून में मुगलशैली पर झण्डा दरबार साहिब गुरूद्वारा बनवाया। गुरूरामराय ने उदासीन पंथ की स्थापना की थी। प्रदीप शाह के समय उनके कवि मेधाकर ने प्रदीपरामायण नामक ग्रन्थ की रचना की। गोरखाओं ने प्रद्युम्न शाह के समय 1791 में गढ़ावाल पर प्रथम आक्रमण किया जिसमें वे असफल रहे । 1804 में गोरखाओं और प्रद्युम्न शाह के मध्य खुड़बुड़ा का युद्ध हुआ जिसमें प्रद्युम्न शाह वीरगति को प्राप्त हो गये। 1804 से 1815 का समय गढ़वाल में गोरख्याड़ी काल रहा।
इसके बाद गढ़वाल नरेश ने अपनी राजधानी टिहरी गढ़वाल में स्थापित की और भारत में विलय के बाद टिहरी राज्य को उत्तर प्रदेश का एक जिला बना दिया गया।

Source - internet

*जितेन्द्र ठाकरे* *+91 9754628304* *बैनगंगा क्षत्रिय पवार समाज भोपाल*

*पवारी कविता शीर्षक*
*"गांव में देखो पोवारी शान"*
भाऊ गा गांव माँ देखो पोवारी शान।
गुडुर/घोड़ो की खासर जासे सनान।
नवोसाल मा तिर सकरात को मौका आयो- 2
अना नवती बहु गिन बाट सेत बान ।
अगा गांव माँ देखो पवारी शान।
जब टूरा अना टुरी देखन ला जासेती ,
जेव सेती सुवारी न भटा भात को पकवान।
अगा गांव में देखो पवारी शान।
बिह्या बरात माँ जासेती त जीव(मन)
भरके देसेत दान,
अना आपरी टुरी को दहेज़ में देसेति गऊ अना अन्न को दान।
अगा गांव में देखो पवारी शान।
अखाडी को तिहार(त्यौहार) आयो, बुलया भज्या कुसुम का बनीन पकवान,
अना नवती बहु,आरती धर धर
माता माय जवार जासेती,
अना नावन ना कोटवारींन ला बाट सेती दान।
अग गांव माँ देख पवारी शान।
रक्षाबंधन में आपरो भाऊ साठी, राखी धर धर आओ सेती।
अना बहिनी ,भाऊ को कलाई पर बांध सेती रक्षाबंधन महान।
गांव माँ देखो पवारी शान।
गांव माँ देखो पवारी शान।
गांव माँ देखो पवारी शान।
*जितेन्द्र ठाकरे*
*+91 9754628304*
*बैनगंगा क्षत्रिय पवार समाज भोपाल*
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*संशोधन आमंत्रित***
आज की नयी पीढ़ी और पढ़ो लिखो लोगो को ये शायद महत्वपूर्ण न लगे पँर हम इन्हें सहेज कर रखने में लगे है आपके सहयोग की आशा है।
*ऐसी कुछ ही वंश / जाति है जिनकी खुद की अपनी बोली, संस्कृति है।*
आओ इसे पवार जनमानस की भाषा बनाये। पवारी भोयरी को बढ़ाये
पवारी भोयरी भाषा के लेख पत्र पुस्तिकाएं कविता आदि आप मुझे मेल करिये या whatsapp पर सेंड कीजिये

*rajeshbarange00@gmail.com*
*निवेदन*
*_एडमिन पैनल_*
*क्षत्रिय पवार समाज INDIA*

अग्निवंशीय पँवार(परमार) क्षत्रिय !!

अग्निवंशीय पँवार(परमार) क्षत्रिय !!
उज्जैन और धार, पँवार(परमार) वंशियो की प्राचीन राजधानी थी। राजा महलकदेव पँवार मालवा के अंतिम शाशक थे जिनकी १३०५ मे अलाउद्दीन खिलजी के सेनापति आईनुल मुल्क मुल्तानी ने हत्या कर दी और इसके बाद वंहा रह रहे लाखो पँवार भाइयो के लिए जीवन का संकट उत्पन्न हो गया था । यही से ये लोग देश के कोने-कोने में जाकर सुरक्षित क्षेत्रों में चले गए।
सम्राट भोज के भतीजे राजा लक्ष्मणदेव पँवार और राजा जगदेव पँवार ने विदर्भ के क्षेत्रों पर शाशन किया था और मालवा पर मुस्लिमो के आक्रमण के समय इस क्षेत्र पर पँवारो का शाशन था इसीलिए यह क्षेत्र पँवारो के लिए सबसे सुरक्षित क्षेत्र था और हमारे लाखो पँवार भाई नगरधन(नागपुर) के आसपास के क्षेत्रों में आकर बस गए जिन्हे भोयर पवार कहा गया।
कुछ पँवारो के जथ्थे पुना के आसपास जाकर बसे। कालांतर में छत्रपति शिवाजी महाराज के द्वारा हिन्दुशाही मराठा वंश की स्थापना की जिससे वापस शक्तिशाली हिन्दू मराठा वंश का जन्म हुआ और इसके विस्तार में हमारे पँवार योद्धाओं ने पूरा सहयोग दिया जिससे हमें पुना और आसपास के कई क्षेत्रों में सरदार बनाकर रियासतें दी गई। सुपे, फाल्टन आदि प्रसिद्ध पवार रियासते हुयी और पँवारो का विस्तार कोकण, सतारा तक हो गया। यंहा निम्बालकर, जगदाले,विश्वासराव,दळवी, गुढेकर ,वाघ, बागवे, जगदाळे, धारराव, घोसाळकर, बने, धनावडे, सावंत ( पटेल ), राऊळ, पंडित, तळवटकर आदि पँवारो के उपनाम से प्रसिद्ध घराने हुए। ये सभी मराठा कुल में शामिल होकर उनके साथ हर युद्ध में बढ़ चढ़कर हिस्सा लिया और शिवाजी महाराज के अखंड हिंदु राष्ट्र के स्वप्न को पूरा करने के लिए खूब लड़ाईया लड़ी।
विदर्भ के पँवार भाइयों ने भी कई युद्धों में मराठा राजाओ का साथ दिया जिससे भंडारा,गोंदिया और बालाघाट जिलों की जागीरदारी/पटेली प्राप्त हुयी और पँवार भाइयों को अब कृषि के लिए काफी जमीन मिल गयी और वे कुशल कृषक बने।
धीरे-धीरे मराठाओं की शक्तियाँ बढ़ती गयी और दिल्ली हिन्दुस्तान के अधिकांश क्षेत्रों पर मराठाओं का शाशन हो गया। धार और देवास की रियासतें वापस पँवार वंशियो को प्राप्त हुयी। इस प्रकार पँवार वंश मराठाओं का हिस्सा बन चूका था और सम्राट विक्रमादित्य और राजा भोज के वंशजो को अपने पुराने क्षेत्र प्राप्त हुए।
मालवा से विस्थापित पँवारो की कुछ शाखाये गुजरात, बिहार, उत्तराखंड,पंजाब और राजस्थान जाकर बस गए। राजस्थान में ८वी से १०वी शदी के आसपास कई पँवार(परमार) रियासते थी जिनके वंशज कालांतर में राजपूत पँवार कहलायें।
उज्जैनी परमार, गढ़वाली पँवार, मूली परमार, भोयर पवार, मराठा पवार, धार पवार, वैनगंगा पँवार आदि सभी शाखाएं अग्निवंशीय पँवार(परमार) क्षत्रिय ही है और आज भी सभी अपने क्षत्रिय धर्म का पालन करते हुए निरंतर देश की एकता और अखंडता में पूरा सहयोग कर रहे है।
हर हर महादेव!! जय महाकाल!!_
जय माँ सच्चियाय गढ़कालिका भवानी!!
जय सम्राट विक्रमादित्य!! जय राजा भोज!!
जय क्षत्रपति शिवाजी महाराज!!
जय अग्निवंशीय पँवार(परमार) क्षत्रिय!!

Source fb

Friday, 1 May 2020

गोत्र और बरग (पवार) - राजेश बारंगे पंवार


About the Authors
Shivani Pawar
Researcher – Bhoyari / Pawari Language Researcher, Folk Culture and Satpuda Regional Studies
Co-Editor, Writer & Contributor – Maa Tapti Shodh Sansthan, Multai, Betul & Pawari Shodh Patrika
Shivani Pawar works on the documentation and preservation of Pawari/Bhoyari language, Pawari folk songs, and oral traditions of the Bhoyar Pawar community. Her research focuses on the cultural heritage of the Satpuda region, including Betul traditions, the historical connections of Pawar lineage with Malwa and Rajputana.
📧 Email: barkhede.shivani@gmail.com
Rajesh Barange Pawar
Independent Researcher | Bhoyari / Pawari Language Researcher | Pawar Community History | Rajasthan Malwa Satpuda Regional Studies
Founder & Director – Maa Tapti Shodh Sansthan, Multai, Betul | Chief Editor – Pawari Shodh Patrika
Rajesh Barange Pawar researches Bhoyari/Pawari language, Pawar community history, the 72 gotras of the Pawar community, and the cultural traditions of the Satpuda region. His work also explores the z historical connections between the Pawar (Parmar/Panwar) lineage of Malwa and Rajputana and their migration and settlement in Betul and surrounding Satpuda regions, including traditions associated with Maa Tapti.
🌐 Blog: https://rajeshbarange.blogspot.com/
🌐 Pawari Shodh Patrika: https://sites.google.com/view/pawarishodhpatrika/home
📧 Email: rajeshbarange00@gmail.com

नजरिये


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इंसान अपने नजरिये से ही ऊँचा उठता है
उसकी सोच एक ऐसे नजरिये को विकसित करती है
जिससे वो आगे बढ़ाता है
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विचार गतिशील व भिन्न होते है...
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इसका जीवंत उदाहरण है..
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सब्जी की टोकरी में से हर व्यक्ति सब्जी छाटता है
और मजे की बात है कि
बिक भी पूरी जाती है..!
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राजेश बारंगे पवार
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#राजेश_बारंगे_पवार
सुखवाड़ा अप्रैल 2017 अंक से