Saturday, 8 July 2017

कहानी रफ़ कॉपी की📔

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👥जब हम पढ़ते थे तो हर subject की कॉपी अलग थी।
लेकिन एक ऐसी कॉपी📖 थी जो हर subject को संभालती थी।
उसे हम कहते थे "रफ़ कॉपी"📔

यूँ तो रफ़ कॉपी📔 का मतलब खुरदुरा होता है।
लेकिन ये हमारे लिए बहुत ही मुलायम थी..

क्योकि...
1) उसके कवर पर हमारा कोई पसंदीदा चित्र होता था।😛😛
2) उसके पहले पन्ने पर डिजाइन में लिखा हुआ हमारा नाम।😊😊
3) शानदार राइटिंग में लिखा हुआ पहला पेज।😁😁
4) बीच में लिखते तो हिंदी थे पर लगता था जैसे कई भाषाओं का मिश्रण हो।😜😜
5) अपना लिखा खुद नही समझ पाते थे।😂😂

रफ़ कॉपी📔 में हमारी बहुत सी यादें छुपी होती थी🙇
वो अनकहा प्रेम...💑
वो अंजाना सा गुस्सा ...😲
बेमतलब के दर्द...🙁
कुछ उदासी🙇 छुपी होती थी...

हमारे रफ़ कॉपी📔 में कुछ ऐसे code words लिखते थे✍
जो सिर्फ और सिर्फ हम ही समझ सकते थे😂😂

उसके आखिरी पन्नों पर वो राजा, मंत्री, चोर, सिपाही का स्कोर बोर्ड📋
वो दिल💞छू जाने वाली शायरी।
कुछ ऐसे नाम जिन्हें हम मिटने की सोच🤔 भी नहीं सकते थे।

मतलब हमारे बैग🎒में कुछ हो न हो रफ़ कॉपी जरूर रहती थी।

लेकिन अब वो दिन काफी दूर चले गए😥
रफ़ कॉपी📔 हमसे दूर चली गयी😥

शायद पड़ी होगी घर🏠के किसी कोने में...
मेरी यादों को छुपाये हुए..🙁
सबकी नज़रों👀 से बचाये हुए..😥

न जाने कहाँ होंगे वो दोस्त👥
न जाने कहाँ होंगी वो यादें🙁

🤔सोचता हूँ...
जब चार दिन बचेंगे ज़िन्दगी के😓
तब खोलूंगा वो रफ़ कॉपी📔
"देखूंगा चश्मे👓 में छिपे आँखों  से😰"
"पलटूंगा कपकपाती हाथों से😓"
"पढूंगा थरथराती होठों से🙁

क्योंकि अभी तो...
"जो 👀नज़रों-नज़रों👀 से होती थी, वो अल्फ़ाज़ अधूरी है"
"जो दोस्तों 👬 के साथ बिताए, वो याद अधूरी है"
"👲बचपन में जैसे जीता था, वो अंदाज अधूरी है"
"अभी उस रफ़ कॉपी 📔में कई code words, कई सवाल हैं यारों..
जिनकी अभी हिसाब 📝 अधूरी है।"🙇
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अगर आपको भी याद है वो बचपन तो शेयर जरूर करें📲...

Thursday, 6 July 2017

Surnames In Pawar Community Bhoyar Pawar बैतूल छिंदवाड़ा वर्धा पवार गोत्र





Surnames In Pawar (bhoyar) Community 72 gotra

उपरोक्त जानकारी बैतूल छिंदवाड़ा वर्धा पवार (भोयर पवार ) के बारे में दी गयी है 


क्षत्रिय पवार , जिसे पंवार, पवार या भोयर-पवार भी कहा जाता है, एक राजपुत वंश की शाखा है। हिंदू और वैदिक वर्ण व्यवस्था के अनुसार, वे क्षत्रिय वर्ण से हैं [1] [2]। भोयर-पवार मालवा के पंवार राजपूतों के वंशज होने का दावा करते हैं [3] [4]

१५वी से १७वी शताब्दी के बीच, पंवारो की ७२ कुल शाखा का प्रदेशांतर मालवा से होते हुए सतपुड़ा और विदर्भ के क्षेत्रों में हुआ। वे वर्तमान में मुख्य रूप से मध्य भारत के बैतूल, छिंदवाड़ा और वर्धा क्षेत्रों में केंद्रित हैं।

बैतूल, छिंदवाड़ा और वर्धा के क्षेत्रों को स्थानीय रूप से भोयर-पट्टी कहा जाता है, इसलिए यहां रहने वाले पवारों को भोयर-पवार के नाम से जाना जाता है[5]। यह पवार आज भी राजपूताना की मालवी बोली का भ्रष्ट रूप बोलते हैं, जिसे उनके नाम पर भोयरी कहा जाता है [6]

पंवारो के उपनाम

  • पवार (७२ कुल) :

1.      गिरहारे/गिरारे

2.      पराड़कर/ परिहार/

3.      खरपुसे, (केवल छिंदवाड़ा)

4.      बड़नगरे/ नागरे/ बन्नागरे

5.      घाघरे,

6.      छेरके, शेरके (छिंदवाड़ा)

7.      कडवे

8.      पाठे, पाठा / पाठेकर

9.      डोंगरदिये/ डोंगरे

10.  धारफोड/ धारपूरे

11.  चौधरी,

12.  माटे/माटेकर

13.  फरकाड़े

14.  गाडगे

15.  ढोटे/धोटे

16.  देशमुख,

17.  खौसी/खावसी/कौशिक/खवसी/खवसे

18.  डिगरसे/दिगरसे/ दिग्रसे

19.  भादे/भादेकर

20.  बारंगा/ बारंगे

21.  राऊत,

22.  काटोले/गघड़े/गद्रे

23.  दुखी/दूर्वे

24.  किंकर/किनकर

25.  रबडे,

26.  कसाई/कसलीकर,

27.  मनमाडे/मानमुडे

28.  सवाई,

29.  गोरे,

30.  डाला/डहारे

31.  उकार/ओमकार

32.  उघडे,

33.  करदाते/दाते

34.  करंजकर/किरंजकर

35.  कामडी,

36.  कालभूत/कालभोर,

37.  कोडले/कोरडे

38.  हिंगवे /हिंगवा

39.  खपरिये/ खपरे,

40.  गाडरे,

41.  गाकरे/गाखरे

42.  गोहिते/गोहते

43.  चिकाने,

44.  चोपडे,

45.  टोपलें,

46.  ढोले,

47.  ढोबले/ढोबारे

48.  डंढारे,

49.  देवासे,

50.  ढोंडी

51.  नाडीतोड,

52.  पठाडे,

53.  पिंजारे/ पिंजरकर

54.  बरखाडे,

55.  बिरगाडे,

56.  बारबोहरे,

57.  गोंनदिया

58.  बैगने,

59.  बोबडे,

60.  भोभटकर

61.  बुवाड़े/बोवाड़े

62.  ठवरी

63.  मुने/मुन्ने

64.  रमधम

65.  ठुस्सी

66.  रोडले

67.  लबाड,

68.  लाडके,

69.  लोखंडे,

70.  सवाई,

71.  सरोदे

72.  हजारे

other

73.  Bisen (in Chhindwada)




  • कुछ लोग अपने उपनाम की जगह पंवार या पवार भी लगााते है।

( पंवारो के यह ७२ उपनाम राजपूत सैनिक सरदारों के नाम/पदनाम/पदवी/संकेतित नाम है )



राजा भोज द्वारा कराये गए अविश्वसनीय और अभूतपूर्व निर्माण कार्य -


एक अच्छी पहल - माँ की स्मृति में शुरू की छात्रवृत्ति-

एक अच्छी पहल -
माँ की स्मृति में शुरू की छात्रवृत्ति- 
श्री नत्थूजी डोंगरे बानूर जिला बैतूल द्वारा अपनी माँ की स्मृति में वर्ष 2014 से अपने गांव के हाई स्कूल और हायर सेकेंडरी में अध्ययनरत और कक्षा १० वीं और १२ वीं में अधिकतम अंक प्राप्त एक छात्र और एक छात्रा को प्रतिवर्ष 5000 रूपये की छात्रवृत्ति प्रदान की जाती है। उल्लेखनीय है कि माताश्री का निधन 15 अगस्त को प्रातः 6 बजे हुआ था। हाई स्कूल के एक छात्र और एक छात्रा को 1000 -1000 रूपये की राशि और हायर सेकेंडरी के एक छात्र और एक छात्रा को १५०० -१५०० रूपये की राशि प्रदान की जाती है। इस तरह 5000 रूपये की राशि प्रतिवर्ष 15 अगस्त को शाला में आयोजित गरिमामय कार्यक्रम में प्रदान की जाती है। इस अवसर पर बड़ी संख्या में छात्र छात्राएं और गांव के लोग उपस्थित रहते हैं।शाला में बच्चों को बैठने हेतु बेंच न होने पर श्री नत्थूजी डोंगरे द्वारा 15 बेंच बनाकर शाला को दान किये है ताकि बच्चे सम्मानजनक ढंग से बैठकर अध्ययन कर सके। चित्र उसी अवसर का। श्री नत्थूजी डोंगरे बच्चों को छात्रवृत्ति देते हुए -
हमारे रीति रिवाज़ -
रस्मों में काँसे के बर्तन उपयोग में क्यों लाये जाते हैं ?
हमारे रीति रिवाजों में प्रायः काँसे के बर्तनों का उपयोग ही किया जाता है और दान देने के लिए इन्हें ही प्राथमिकता दी जाती है।विवाह आदि के अवसर पर काँसे के बर्तनों का ही उपयोग किया जाता है। किसी पुरुष परिजन की मृत्यु पर पितर और किसी महिला परिजन की मृत्यु पर पितरीन बनाये जाने का प्रचलन है, जिन्हें भी काँसे के बर्तन ही दानस्वरूप दिए जाते है।
यह वैज्ञानिक रूप से सिद्ध हो चुका है कि काँसे के बर्तन में खाना खाने से बुद्धि तेज होती है, रक्त में शुद्धता आती है, रक्तपित शांत रहता है और भूख बढ़ती है। लेकिन काँसे के बर्तन में खट्टी चीजे नहीं परोसनी चाहिए खट्टी चीजे इस धातु से क्रिया करके विषैली हो जाती है जो नुकसान देती है। कांसे के बर्तन में खाना बनाने से केवल ३ प्रतिशत ही पोषक तत्व नष्ट होते हैं। यही कारण है हमारे रीति रिवाजों में काँसे के बर्तनों का प्रचलन आम है।
"सुखवाड़ा ",सतपुड़ा संस्कृति संस्थान ,भोपाल।

ललित निबंध - ताप्ती संस्कृति

ललित निबंध - 
ताप्ती संस्कृति 
ताप्ती वाक है। असत से सत ,तमस से ज्योति ,अज्ञान से ज्ञान की ओर ले जाने वाले मार्ग का निर्देश करती है। ताप्ती काव्य है, इसमें रामायण- सा औदात्य और महाभारत- सा विस्तार है। ताप्ती रसवंती है ,इसमें सहस्त्र -सहस्त्र महाकाव्यों का रस है। ताप्ती कला है। इसके कटान ,ढलान ,उतार- चढाव उसकी कला कृतिया है। ताप्ती गीत है ,लय है ,नाद है। ताप्ती गति ,यति, आरोह -अवरोह है। ताप्ती सृजन धर्मिणी है। वह हर पल ,हर छण ,हर घड़ी ,हर प्रहर ,हर दिन ,हर मास ,हर वर्ष कुछ न कुछ सिरजती रहती है। कभी चट्टानों से कोई अपूर्व आकृति तो कभी कगारों का बाँकपन और कहीं धाराओं की सहस्त्र-सहस्त्र लट। संगीत रचती ताप्ती की कल -कल की ध्वनि और जलप्रपात से गिरते जल की धार की धारदार ध्वनि मन को मोहित करती है। ताप्ती कल्पदा है ,कामरूपा है ,कला विद्या ,काव्य और संगीत की अधिष्ठात्री है।
ताप्ती प्रेयसी है,अथाह रसभरी है। वह आमंत्रित करती है। उसमें उतर जाने को ,खो जाने को और विलीन हो जाने को। ताप्ती धीरा है, प्रशांता है ,मृदु भाषिणी है। वह चिर यौवना है। उसका यौवन और प्रेम मातृत्व में फलिभूत होता है या मुक्ति में। राम ने सरयू की गोद में जन्म लिया ,उससे प्रेम किया और उसी में समाहित हो गए। ताप्ती अंचल का हर राम ताप्ती की गोद में जन्म लेता है ,ताप्ती से प्रेम करता है और अंत में उसी में समाहित हो जाता है। ताप्ती तालाब और ताप्ती किनारे होने वाले उत्तरकर्म इसका प्रमाण है। ताप्ती केवल धरती के भूगोल में ही नहीं बहती ,वह जन -जन के अंतस में भी बहती है। वह अंतःसलिला है। कार्तिक माह में ताप्ती किनारे लगने वाले मेले उसी अंतर्प्रवाह का बाह्य प्रस्फुटन है।
वल्लभ डोंगरे ,सुखवाड़ा ,सतपुड़ा संस्कृति संस्थान ,भोपाल।

अतिशयोक्ति नहीं हकीकत - अपने कर्मों से लिखी अपने जीवन की नई इबारत -

अतिशयोक्ति नहीं हकीकत -
अपने कर्मों से लिखी अपने जीवन की नई इबारत -
आज भी भारतीय महिलाएं अच्छे घर और वर के लिए शिव पार्वती का व्रत रखती हैं और उन्हें ही आदर्श गृहस्थ मानती है। आज यदि किसी ऐसी जोड़ी की कल्पना की जा सकती है तो वह जोड़ी है श्री कृष्णकुमार डोबले और श्रीमती निवेदिता डोबले की जिन्होंने अपने कर्मों से अपने जीवन की नई इबारत लिखी है।
श्री कृष्णकुमार डोबले और श्रीमती निवेदिता डोबले द्वारा वर्ष २००७ में सर्वप्रथम अपने गाँव खैरीपेका में सामूहिक विवाह का आयोजन कर समय के साथ चलने हेतु समाज में परिवर्तन की नई लहर उत्पन्न की थी। उसके बाद २०१२ से श्री कृष्णकुमार डोबले और श्रीमती निवेदिता डोबले के मार्गदर्शन में खैरीपेका में प्रतिवर्ष लगातार सामूहिक विवाह का आयोजन हो रहा है।
कुछ दिनों पूर्व ही श्री कृष्णकुमार डोबले की बड़ी बहन श्रीमती गीता कास्लिकार का उज्जैन में आकस्मिक निधन हुआ था तब भी अपने जीजाश्री को सम्बल देने न केवल दोनों युगल श्री कृष्णकुमार डोबले और श्रीमती निवेदिता डोबले उनके पास उपस्थित रहे अपितु उन्होंने तेरवीं का आयोजन न कर केवल श्रृद्धांजलि कार्यक्रम का आयोजन कर दुःख की घडी में भी साहस दिखाने का परिचय दिया।
अभी हाल ही में श्री कृष्णकुमार डोबले खैरीपेका छिंदवाड़ा ने अपनी धर्मपत्नी श्रीमती निवेदिता डोबले पूर्व अध्यक्ष जिला पंचायत छिंदवाड़ा के सम्बल और सहयोग से अपनी माताश्री के देहावसान पर केवल श्रृद्धांजलि कार्यक्रम आयोजित कर क्षेत्र में नई मिसाल कायम की है। श्री डोबले जी ने अपनी माताश्री शांति बाई डोबले का दसक्रिया कार्यक्रम उज्जैन में आयोजित किया और वहाँ की तीन विकलांग संस्थाओं के बच्चों को अपनी शृद्धानुसार अनुदान राशि उपलब्ध कराई। खैरीपेका में तेरहवीं के दिन केवल श्रृद्धांजलि कार्यक्रम का आयोजन किया और तेरहवीं में होने वाले संभावित खर्च की राशि से अपने गांव खैरीपेका के मोक्षधाम में विश्रामगृह बनाने का एक ऐसा उदाहरण प्रस्तुत किया है जिसकी मिसाल दूर दूर तक मिलना मुश्किल है।
उल्लेखनीय है उक्त दोनों दंपत्ति द्वारा समाज सुधार पर भाषण देने के स्थान पर समय समय पर समाज सुधार के काम करके जो उदाहरण प्रस्तुत किये जा रहे है वह अनुकरणीय है। भगवान् इन दोनों को दीर्घायु प्रदान कर इनकी जोड़ी को सलामत रखें।
आप चाहे तो इस दंपत्ति को उनके कार्य के लिए बधाई दे सकते है। उनका मोबाइल न है -9584153816
वल्लभ डोंगरे ,"सुखवाड़ा ",सतपुड़ा संस्कृति संस्थान ,भोपाल।

भोयरी (पवारी) बोली: एक भाषाई एवं सांस्कृतिक अनुशीलन- शिवानी पवार (बारंगे) -भोयरी / Bhoyari / Pawari

भोयरी (पवारी) बोली: एक भाषाई एवं सांस्कृतिक अनुशीलन लेखिका: शिवानी पवार (बारंगे) निवास स्थान: देवरी, मुलताई संस्था से संबद्धता: माँ ताप...