Wednesday, 20 April 2022

पँवार/परमार वंश के दानवीर, महाप्रतापी , शौर्यवान राजा, जगदेव पंवार का इतिहास-



महानदानियो मे दो चार नाम ही प्रमुखता से लिए जाते हैं जिनमें जगदेव पँवार का नाम भी आता है । बलि ने अपने राज्य का दान दिया, कर्ण रोज कई मण सौना दान करता था लेकिन कलियुग मे सिर्फ जगदेव के बारे मे ही यह कथा प्रचलित है उन्होंने ने अपने राज्य और शीश दोनों का दान किया था । इसलिए कलियुग मे जगदेव से बड़ा दानी किसे भी नहीं माना गया है ।

 संवत् इग्यारह इकांणवै, चैततीज रविवार ।
 सीस कंकाली भट्टनै, जगदेव दियो उतारि ।।

जगदेव महान परमार शासक उदयादित्य के छोटे पुत्र थे पिता इन्हें राज्य सौपना चाहते थे लेकिन बड़े भाई के रहते राजा बनने मे पाप लगता हैं यह सोचकर राज का त्याग कर गुलबर्गा (कर्नाटक ) चले गये थे । वहाँ के राजा विक्रमादित्य षष्ठ ने उन्हें बहुत सम्मान दिया और अपने भाई के समान मानता था ।

जगदेव महाराज का दूसरा सबसे महत्वपूर्ण दान का प्रसंग शीशे दान का आता है । यह दान जगदेव ने गुजरात के शासक चालुक्य सिद्धराज जयसिंह के काल मे दिया था ।

महाराज विक्रमादित्य के नगरी में उनके वंशज श्री उपेन्द्र परमार ने परमार वंश की स्थापना ने ८०० ईशवी में स्थापना की थी I महाराज उपेन्द्र के बाद महाराज मुंज और चक्रवर्ती राजा भोज ने परमार/पंवार वंश की पराकाष्ठा चरम पर पंहुचा दी राजा भोज ने मध्यभारत के राजवंशो जैसे कलचुरि राजवंश- रतनपुर , गोंड, हैहय, से अच्छे सम्बन्ध रखने की कोशिश की और इन क्षेत्रो पर सीधा नियंत्रन नही रखा I उनकी मृत्यु के पश्चात परमार राजवंश पर जैसे काले बदल छा गए . इसके बाद उनके भतीजे राजा जयसिम्हा ( १०५५ -१०६० ईशवी ) के हार के बाद ऐसा लगा की मनो परमार वंश समाप्त हो गया. उनके भाई राजा उदयादित्य देव पंवार ( १०६० -१०८७ ईशवी ) ने मालवा को पून: संभल कर चालुक्य , होयसल, एंड कलचुरि राजाओ से मालवा की रक्षा कीI उन्होंने धार के पून;स्थापित कर सोने के सिक्के जारी किये. महराज उदयादित्य देव पंवार ने विदिशा जिले के उदैपुर और मांडू नामक स्थानो पर उदयेश्वर मंदिर की स्थापना की I राजा उदयादित्य देव पंवार की दो रनिया थी I पहली रानी सोलन्किनी देवी और दूसरी रानी वघेलिनी देवी थी I 

रानी सोलन्किनी देवी से तीन पुत्र और दो पुत्रिया तथा रानी वघेलिनी देवी से एक पुत्र राजा रणछोड़ देव / रांधेल्ला हुए जिनके वंसज बिहार के डुमराओ , जगदीशपुर और बक्सर के राजा हुए I रानी सोलन्किनी के तीन पुत्र राजा लक्ष्मणदेव ( १०८७-१०९७ ईशवी ), राजा नर्वरमानदेव पंवार ( १०९७-११३४ ईशवी) और राजा जगदेव पंवार बाद में परमार वंश के गौरव को चरम पर ले गए. १०९७ ईश्वी में राजा नरवर्मन देव पंवार धार के राजा बने और उन्होंने अपने भाई राजा लक्ष्मण देव पंवार को विदर्भ का राजा बना दिया I 

उस समय नगरधन/नन्दिवंधन विदर्भ की राजधानी थी, महराज लक्ष्मणदेव देव पंवार के समय नगरधन मालवा की दूसरी राजधानी के रूप में विकसित हुई I महाराज लक्ष्मण देव पंवार ने मध्यभारत में वास्तविक परमार वंश की नीव राखी थी I वर्तमान गोंदिया, बालाघाट, सिवनी, भंडारा, चंद्रपुर, वर्धा, छिंदवाड़ा, अमरावती, यवतमाळ, आदि क्षतरो तक परमार वंश का वास्तविक शाशन हो चूका था I
महाराज उदयदिय्या देव पंवार के तीसरे पुत्र युवराज जगदेव शुरू में गुजरात में सोलंकी राजा जयसिम्हा सिद्धराजा के साथ सोलंकी राजवंश के लिए अनेक युद्धः लड़े और विजय प्राप्त की Iओ वापस गुजर्Iत आये और उनके पिता राजा उदयादित्य ने उन्हें राजा बनाना चाहा किन्तु आंतरिक पारिवारिक उलझनों के कारन अपना राजयपाठ का त्याग कर भाई नरवर्मन देव को राजा बना दिया. राजा जगदेव विदर्भ राज्य की ओर चले गए. 

मध्यभारत में उस समय के शक्तिशाली राजा कल्याणी चालुक्य राजा विक्रमादित्य VI ( १०७६-११२६ ईशवी) की सेनाप्रमुख बन गए और उन्हें पश्चिमी विदर्भ का चार्ज दिया गया I इस राजा जगदेव ने अपनी बुद्धि, पराक्रम और शक्ति से आंध्र, डोरसमुद्रा और अर्बुदा पर्वत के क्षेत्र को जीत लिया. इशके पश्चात उन्होंने कर्नाटक के राजा किंग कर्ण, आंध्र के राजा, चक्रदुर्गा( चित्रकोट , बस्तर वर्तमान छतीसगृह ) और डोरसमुद्रा के राजा होयसल के पराजित किया ी

११२६ में कल्याणी चालुक्य राजा विक्रमादित्य VI की मृत्यु के पश्चात स्वयं स्वंत्र राजा बनकर इस क्षेत्र में स्वंत्र पंवार राजवंश की स्थापना की I उन्होंने अपनी राजधानी गढ़ चाँदुर ( वर्तमानं राजुरा तालुका, जिला चंद्रपुर महाराष्ट्र) को बनाया I इनके पुरवा राजा लक्ष्मणदेव पंवार ने अपनी राजधानी नगरधन को बनायीं थीी

राजा जगदेव ने पंवार वंश का राज्यपथ गड़चांदुर में स्थानांतरित कर लिया. यह वह क्षेत्र था जन्हा से जगदेव पंवार आंध्र, बस्तर, कर्नाटक, विदर्भ और मध्यभारत के अन्य क्षेत्रो पर आसानी से नियंत्रण रखा सके. इनका मुख्य नियंत्रण वाले क्षेत्र बुलढाणा, अकोला, अमरावती, नागपुर, वर्धा, यवतमाळ ,चंद्रपुर, भंडारा, गोंदिया, और दक्सिनी वर्तमानं मध्यप्रदेश के जिले बालाघाट, सिवनी, छिंदवाड़ा,बैतूल से लेकर मालवा तक थे I
राजा जगदेव ने सात प्रकार के सोने के सिक्के चलाये थे जो नागपुर के केंद्रीय संग्रहालय और हैदराबाद के संग्रहाल में सुरक्षित है I 
कुछ इतिहासकार राजा जगदेव पंवार के उत्तर भारत में बसने की बात कहते है जिन्हीने १०९४ ईशवी में अखनूर में बसने की बात कहते है. इसके बाद इस जगह का नाम वराट नगरी हो गया जिस जगह राजा जगदेव रुके थे उस जगह को अम्बरी कहा गया और इनकी अगली पीडियो को अम्बा रयान कहा गया. राजा जगदेव का क्षेत्र उत्तर, पश्चिम, मध्य और दक्षिण भारत तक फैला हुआ था, 
इतिहासकारो में भले ही मतभेद हो पर राजा भोज के भतीजे महराज जगदेव को आज भी महाराष्ट्र, मध्यप्रदेश, छतीसगृह, गुजरात, राजस्थान, जम्मू कश्मीर, उत्तराखंड, हिमाचलप्रदेश आदि राज्यों में आज भी पूजा जाता है. इनका कार्यक्षेत्र पुरे भारत में फैला था और वे किसी एक जगह पर स्थिर नहीं थे ी

राजा जगदेव की मर्त्यु ११५१ ईशवी के आसपास माना जाता है I उनकी मृत्यु के पस्चात उनके वंशज राजा जगदेव II ने १२ शताब्दी के मध्य तक विदर्भ में शाशन किया किन्तु वे ज्यादा लोकप्रिय नहीं हो सके. बाद में विदर्भ क्षेत्र के पूर्वी और उत्तरी क्षेत्र पर रतनपुर के गोंड राजाओ का कब्ज़ा हो गया. वाकाटक राजवंश के बाद पंवार राजवंश ही सबसे शाक्तिशाली हिन्दू राजवंश रहा पर इतिहासकारो ने विदर्भ के इस महान इतिहास के भुला दिया.

जय महाराज जगदेव पँवार 
जय अग्निवंशीय क्षत्रिय पँवार/परमार राजवंश

अग्निवंशी पंवार

2500 वर्ष पूर्व पवार पंवार (परमार) जाति की उत्पत्ति माउंटआबू (राजस्थान) में अग्निकुंड से हुई। तत्कालीन दानव दैत्यों से परेशान ऋषि-मुनियों ने महर्षि वशिष्ठ के मार्गदर्शन में एक अग्निकुंड तैयार किया और अग्नि प्रज्जवलित कर एक मानय निकाला। इसका नाम परमार रखा और इसे संतों की रक्षा का दायित्व सौंपा। इसके बाद दूसरा मानव पैदा किया और इसका नाम सौलंकी तथा तीसरे मानव को पैदा कर उसका नाम चालुक्य रखा। इस प्रकार ये सभी  अग्निवंशीय व इनके वंशज  परमार कहलाए। गोत्र का अभिप्राय उत्पत्ति से होता है और परमारों की उत्पत्ति वशिष्ठ द्वारा की गई है, इसीलिए इनका गौत्र वशिष्ठ है तथा कुलदेवी धार की गढ़कालिका है।

इस जाति ने जन्म से ही मानव समाज की रक्षा, समृद्धि एवं प्रतिष्ठा को अपना मूल कर्तव्य मानकर आदर्श भूमिका निभाई है। प्रगट होते ही पवार वीरों ने दानव-दैत्यों का संहार कर ऋषि-महर्षि तथा सर्वसाधारण जनमानस को सुरक्षा प्रदान की। मां दुर्गा (महामाया) को आराध्य तथा धार को अपनी कर्मभूमि बनाया। कुछ काल गुमनामी में बिताने के बाद ईसा पूर्व 761 में बौद्धधर्मियों से परेशान होकर महाबाहु नामक ऋषि ने आबू समीप अचलगढ़ व चंद्रावती राज्य की स्थापना की। ईसा पूर्व 400 वर्ष में महाप्रतापी नृपति, आदित्य पवार, विक्रमादित्य आदि ने इस जाति का गौरव चारो ओर फैलाया। इसी परमार वंश ने आगे ईसा 791 से 1310 तक राजा भोज, उपेन्द्र, बैरीसिंह, मंजुदेव, भोजदेव, जयसिंह, उदयादित्य, जगदेव, नर बर्मन ई, महाप्रतापी शूर एवं विद्वान नृपति गण को जन्म दिया। इन्होंने घार, उज्जैन, बागड़, जालौर, आयू तथा भिन्माल में राज्य कर मालवा को समृद्धशाली बनाया। परमार राजवंश का आधिपत मालवा से प्रारंभ होकर देश के कई हिस्सों में फैला था, जिसका प्रामाणिक इतिहास डॉ. गांगुली, डॉ. व्यंकटाचलम और कई विद्वान लेखकों, इतिहासकारों के शोध प्रबंध ग्रंथों में मिलता है। राजा भोज ने राज्य की राजधानी उज्जैन से हटाकर धार में स्थापित की थी। उस काल में धार का नाम धारा नगरी या राजाभोज का किला, भोजशाला इस बात के प्रमाण हैं।

समय बदलता गया राजपूताने और मालवा पर मुगल शासकों का आक्रमण होने लगा। कुछ राजा भोज के शासनकाल में तो कुछ इसके बाद परमारों का बिखराव होता चला गया। पवारों के पूर्वज मुगल सेना के आक्रमण और अत्याचार से परेशान हो गए थे मुगलों ने धार को तहस नहस कर दिया था। वे महिलाओं पर भारी अत्याचार करते थे। फिर भी जांबाज वीर योद्धा होने के कारण पवार काफिले के साथ मुगल सेना का मुकाबला करते हुए धार से

होशंगाबाद नर्मदा किनारे पहुंचे, यहां से अलग-अलग टुड़िया में नर्मदा में जनेऊ विसर्जित करके अलग अलग स्थानों क्रमशः बैतूल, छिंदवाड़ा। महाराष्ट्र में छत्रपति शिवाजी के सहयोगी योद्धा परमार वंश के लोग आज मराठा पंवार कहलाते है। उस काल में उन विषम परिस्थितियों में जो जिस भूखंड पर बस गया। उसने उस क्षेत्र की बोली, पहनावा, खानपान अपना लिया। यहां तक कि उनके सरनेम भी बदल गए किंतु इनके रीति-रिवाजों एवं बोली में मालवा की संस्कृति के अंश आज भी विद्यमान है।

धार मालवा से आये ७२ गोत्र पवार / पंवार के गोत्र (कुल) 
पवारो के यह गोत्र राजपूत सैनिक सरदारों के नाम /पदनाम / पदवी / संकेतित नाम  है 
यह वह ७२ गोत्र है जो धार से आये है कालन्तर में  गोत्र (कुल ) कुछ बदल गए है 
७२ कुली पवार /पंवार मुख्य रूप से मुलताई , पांढुर्ना हुए कारंजा घाडगे में मुख्य रूप निवासरत है

पंवारो की शाखाएं

पंवारो की शाखाएं

                    वर्तमान में परमार वंश की एक शाखा उज्जैन के गांव नंदवासला,खाताखेडी तथा नरसिंहगढ एवं इन्दौर           के गांव बेंगन्दा में निवास करते हैं।धारविया परमार तलावली में भी निवास करते हैंकालिका माता के भक्त होने            के कारण ये परमार कलौता के नाम से भी जाने जाते हैं।धारविया भोजवंश परमार की एक शाखा धार जिल्हे के            सरदारपुर तहसील में रहती है। इनके ईष्टदेव श्री हनुमान जी तथा कुलदेवी माँ कालिका(धार)है|ये अपने यहाँ 
        पैदा होने वाले हर लड़के का मुंडन राजस्थान के पाली जिला के बूसी में स्थित श्री हनुमान जी के मंदिर में करते
         हैं। इनकी तीन शाखा और है;एक बूसी गाँव में,एक मालपुरिया राजस्थान में तथा एक निमच में निवासरत् है।

11वी से 17 वी शताब्दी तक पंवारो का प्रदेशान्तर सतपुड़ा और विदर्भ में हुआ । सतपुड़ा क्षेत्र में उन्हें भोयर पंवार कहा जाता है धारा नगर से 15 वी से 17 वी सदी स्थलांतरित हुए पंवारो की करीब 72 (कुल) शाखाए बैतूल छिंदवाडा वर्धा व् अन्य जिलों में निवास करती हैं।संस्कृत शब्द प्रमार से अपभ्रंषित होकर परमार/पंवार/पोवार/पँवार शब्द प्रचलित हुए ।

पँवारी लोकगीत / भोयरी - संस्कार गीत- पांढरी की ओ माता-माय

पांढरी की ओ माता-माय / पँवारी

पांढरी की ओ माता-माय
मऽ मानू तू हय भोरी।
आओ-आओ माता-माय
करू तोरी बिनती आज की रात
करजो मराअ् घरअ् वास
दिन खऽ लेजो कू-कू को रेला
रात खऽ लेजो सहिर वास।।
पाण्ढरी को रे हनुमान बाबा
मऽ मानू तू हयअ् भोरो
आओ-आओ रे हनुमान बाबा।
करू तोरी बिनती आज की रात
करजो मराअ् घरअ् वास
दिन खऽ लेजो कूक को रेला
रात खऽ लेजो सहिर वास।।

पँवारी लोकगीत   ♦   रचनाकार: अज्ञात

Source -http://kavitakosh.org/kk/पांढरी_की_ओ_माता-माय_/_पँवारी

पँवारी लोकगीत / भोयरी - संस्कार गीत- भैय्या घरअ् भयो नंदलाल / पँवारी

भैय्या घरअ् भयो नंदलाल / पँवारी


भैय्या घरअ् भयो नंदलाल
काहे की डालू घुंगरी
हरो लिलो गहूँ कटाय
ओकी म डाल्हूँ घुंगरी
गांव भर खअ् बुलाहूँ, घुंगरी खिलाहूँ
बीर को बारसा मनाहूँ, बाटहूं मऽ ते घुंगरी
भैय्या घरअ् भयो बारो लाल, बाट्हूँ मऽ ते घुंगरी

भाई का कथन- चल चल बहिना गाय का कोठा
अच्छी-अच्छी गाय निवाड़ ले...बहिना बाई
बहन का कथन- पाँच बरस को बरद मनायो
का करू भैय्या तोरी गाय को
भौजी का कंगना दिला बीरन मखअ्
पाच बरस को बरद मनायो
भाई- भौजी का कंगना ओका, मायका सी आया
कंगना दिया नी जाय ओ बीना बाई
आऊपर कई मांग ले मऽ सीअ्
पाच बरस को बरद मनायो।


पँवारी लोकगीत   ♦   रचनाकार: अज्ञात


Source -http://kavitakosh.org/kk/

Wednesday, 5 May 2021

Pawar surname In betul chhindwada wardha

                                   Pawar surname In betul chhindwada wardha 



Pawar-samaj-surname-betul

उपरोक्त जानकारी बैतूल छिंदवाड़ा वर्धा पवार (भोयर पवार ) के बारे में दी गयी है 

Sunday, 5 July 2020

# भोयरी संस्कृति - ४ #* लोकचित्रकला की अनोखी भोयरी संस्कृति *

# भोयरी संस्कृति - ४ #
* लोकचित्रकला की अनोखी भोयरी संस्कृति *
लोकचित्रकला : तिवार , ब्याह, संस्कार , सुभ घडी पर होन वाली चित्रकारी भोयर समाज मऽ थोडऽबूत फरक सोडकन् येकसारखीच सऽ , मंग वूई महाराष्ट्र का वर्धा - नागपूर जिला रहे या मध्यप्रदेश का बैतूल - छिंदवाडा जिला . 
लोकचित्रकला कला कला को आदिम रूप आय. येनऽ लोकचित्रकला मऽ सूर्व्य , चंदर , पीतर , जनावर , पाखरु , बाई , मानुस , भगवान , गाय - बइल , पोटु - बाटू , भाई - बहिन ,कमल , बेल - फूल - पत्ती , भूमिती की आकृती , सस्तिक , नागोबा , हत्ती , घोडो , रथ , पालखी , झाड काहाडकन् अमूर्त ला मूर्त रूप देन को सार्थक प्रयास करना मऽ आवस. लोकचित्र कला का प्रतिक आनऽ मतलब को अभ्यास इ अलग च चिंतन को विस्यय सऽ , जी आज कऽ जुग मऽ जरुरी सऽ . येमकऽ चितरंग का कई रूप सऽ . येक ही चितरंग का लय मतलब निकरस. येनऽ चित्रकला मऽ अनगढ साजरपन आनऽ अनोखोपन सऽ . येनऽ अनगढता कऽ कारन वोमऽ फयलाव ( विस्तार ) की अनन्त सम्भावना रव्हस. या कला हर बार नवी लागस पर येमऽ कई असा तत्व बी रव्हस जी मूल स्वरूप ला बनायकन् राखस. येनऽ कला को समग्र नजरियो , या बडी बात सऽ . या कला येकलऽ मानुस साठी नही त् समाज साठी रव्हस , जी सहजीवन की प्रेरना देस. येमऽ सहज अभिव्यक्ती , जन - जन की आस्था आनऽ सुखदुख की कथा रव्हस. या कला सिरफ सुभसकुन , उपरी उपरी की सुन्दरता च नही रव्हस तऽ वोमऽ गह्यरो साजरपन , सीख , प्रेरना रव्हस .
चितरंग / चऊक काहाडन की जागा : चवरी जवर की दिवाल , चवरी आघऽ की जागा , दरुजा जवर की दिवाल , दरुजा जवर की जमीन , दाठ्ठो , तुरसी जवर की जागा , आंगनो , ज्यान पूंजा मांडी वा जागा , चवरंग कऽ खलतऽ की जागा , बोहला की जागा , मोह्यतूर की डेर - माथनी जवर की जागा , मोह्यतूर की जागा , दिवा - कलस कऽ भोवताल ....
चितरंग काहाडन को , चऊक पूरन को सामान / साधन : गेरु , चुनो , गहू को पीठ ( आटो ) , तूप , हरद , चऊर को पीठ , रांगोरी , कुंभार को रंग ,  कुची ( बरस ) , रु लपेटी आगकाडी , साच्यो , ठप्पो , आपला बोट ( उंगली ) ना ...
बेगरऽ बेगरऽ परसंग , सन तिवार ला बेगरो बेगरो रंग को माध्यम आनऽ डिझाईन का चितरंग काहाडन की / चऊक पूरन की भोयरी परम्परा आनऽ संस्कृति सऽ .
१. जीवती : चऊर कऽ पीठ को रंग बनायकन् चवरी / दिवरा कऽ जवर की दिवाल पर डवरो - डुपन , बखर , तिफन ,नागर बंडी असा खेती कऽ काम का साधन को चितरंग काहाडस . वोकऽ संगच बइल जोडी ,गडी मानुसना को बी चितरंग काहाडस . वोनऽ चितरंग ला चवखुटी रेस काहाडकन् फ्रेम बनावस . हरद - कुकू - अकसिद , पिवरं धागा कन् पूंजा करस. 
२. नागपंचमी : नागपंचमी ला चवरी जवर आनऽ दरुजा कऽ दुय बाजू कितऽ तूप येनऽ माध्यम को बापर करकन् नागोबा , बिचू का चितरंग काहाडस / लिखस . हरद - कुकू , अकसिद लगायकन् उनकी पूंजा करस . 
३. पोहती / पोयती ( रक्षाबंधन ) : पोयती कऽ दिन कुंभारी रंग बापरकन् बहुड्डो लेकन पोटी , पालखी , तलवार लेकन घोडापर बस्या भाईना , हत्ती असा दिवाल भर चितरंग काहाडस . उनकी बी हरद - कुकू , अकसिद लगायकन् पूंजा करस.
४. गोकुळाष्टमी / जन्माष्टमी : येनऽ दिन तूप कन् चितरंग काहाडस. भगवान किस्नं , गोप - गोपी , गवळनना , गाय - बासरुना असो गोकुळ को चितरंग काहाडस . येला पन् चवखुटी बाॅर्डर काहाडस . आन् इनकी पूंजा करस.
५. पोरो ( पोळा ) :  पोरा कऽ दिन गेरु कन् जू ला रंगायकन् दाठ्ठा मऽ धरस. चवरी जवर कऽ दिवाल पर जेतरा भाईना होयेन उनका हरद कन् चितरंग काहाडस . आन् वोकी बी पूंजा करस.
६. सराध ( श्राध्द ) : सराध मऽ चौथ , पंचमी , सप्तमी असो जेनऽ दिन जमेन वोनऽ दिन कागुर डावस . पीठ कन् घर मऽ आवनीवाला पीतर का पायना काहाडस . नवमी ला सवासिन पीतर की पूंजा करस. 
७ . अखरपक ( सर्वपित्री दर्श अमावास्या ) : अखरपक कऽ दिन पीठ कन् पीतर का घर कऽ बाहिर जातानी का पायना मांडस . दरुजा ला तूप लगावस . पीठ कनच जमीनपर पीतरना काहाडस . वोकऽ वरतऽ दिवाल मऽ सलाक / सरुता मऽ सवारी - बडो टोचकन् धरस . वोकऽ खलतऽ निवो धरस . बाद मऽ सवारी - बडा परीन तूप सोडस जी ठेंब ठेंब निवा पर पडस . येला पीतर की स्यिदोरी कव्हस. 
८. दिवारी / गायगोंदन : गायगोंदन कऽ दिन दुय हात की मुठना गेरु मऽ भिजायकन् आंगना मऽ वोका ठप्पा मारस. वुई गाय कऽ खुर वानी दिसस . 
९ . रथसप्तमी :  रथसप्तमी पुस मह्यनाकऽ हर इतवार की सूर्व्यपूंजा होन कऽ बाद मऽ आवस . आपलो जीवन सूर्व्याकनच सऽ . येनऽ दिन आंगना मऽ तुरसी जवर रांगोरी कन् रथ पर सवार सूर्व्यदेव को चितरंग काहाडस. पिडा पर वोकऽ नाव्हन धोवन साठी सारो सामान , आयनो , तेल , फनी - कंगवो धरस . वहानच गवरी पर गाडगा मऽ  उतू जायेन असो खीर को निवद / परसाद बनावस . हरद - कुकू , अकसिद कन् सूर्व्यदेव की पूंजा करस .

( स्रोत : सौ . पार्वतीबाई महादेवराव देशमुख )
लेखक : सुरेश महादेवराव देशमुख , नागपूर   मो. 7066911969

भोयरी (पवारी) बोली: एक भाषाई एवं सांस्कृतिक अनुशीलन- शिवानी पवार (बारंगे) -भोयरी / Bhoyari / Pawari

भोयरी (पवारी) बोली: एक भाषाई एवं सांस्कृतिक अनुशीलन लेखिका: शिवानी पवार (बारंगे) निवास स्थान: देवरी, मुलताई संस्था से संबद्धता: माँ ताप...