Saturday, 19 May 2018

पवारी / भोयरी

*भोयरी पवारी*

The total number of persons speaking Rajasthani is 4 per cent in betul. of the population. It includes several caste Sub-dialects of Rajasthan. dialects spoken in other districts, among which Bhoyari,
Kir, and Katiyai are the most important. Bhoyari is the dialect of the Bhoyars of Betul, Chhindwara and Wardha. It is only provisionally classed by Dr. Grierson as a dialect of Rajasthani.

Thursday, 17 May 2018

पुहमी बुड़ा पुँवार (भाटी गीत)

पुहमी बुड़ा पुँवार
(भाटी गीत)

करि बन्दन सुख के सदन, गौरीनब्द गनेस ।
कथें सुजस पँवार कुल, बर दे बुद्धि बिसेस ।।१।।

मालव धरनी मांह, धार नगर रजधानी ।
बीर तरवत पुँवार, कीरत जगदेव कहानी ।।२।।

विक्रमसा नरबीर, नगर उज्जेणि में नामी ।
मुन्ज अफ नृप भोज, चतुर्दस-विद्या ज्ञानी ।।३।।

जन्म लियो भरतरी जशा, देस भयों चहुँ दण्ड ।
गुरू गोरख सिर कर धन्यो, अमर नाम अखंड ।।४।।

पृथ्वी ठावी उज्जेणिपुर, धरा ठावि गढ़ धार ।
कुल वर्गु पूरू राय को, पुहमी बड़ा पुँवार ||५||

पँवार चक्रवर्ती राजा भोज

संकलन डॉ.ज्ञानवेर टेंभरे

देवर भाभी संवाद (पवारी में)

२. देवर भाभी संवाद

भाभी सावन बरसे भादवो गरज,
मन मरो उडनो काव्य
ओ देवर जी तुम बन पारखी,
साजन ने ढूंढ लाओ
कोनदेशऽमगयातुमराभाई,
कौन बांट गया भूल
जाओ उन व लेख आओ,
तन म उठे है शूल ।।१।।
देवर म काहे को पंख लगाए
उड़ खा जाऊ दूर ।
दूर हय मेरा भैया, ओ भाभी
देऽकोईमन्तरपूर
भाभी आया सावन मेहंदी वाली,
गोरी हथेली लाएं ।
पेरा करना हाथ तुम्हारा,
असोऽ मंतर देहू।
अब देवर जी उड़ जाओ तुम
भैया के लिए तुम ढूंढ ||३||

रचयिता गोपीनाथ कालभोर, रोड़ा, जि.बैतुल.

माँ गढ़कालिका जी की आरती

(माँ गढकालीका की आरती

मैय्या करू गुढळली तोरी आरती हो माँ-२
मैय्या आरती माँ बेल फूल चढाऊ वो मोरीमाय-२
हल्दी कुंकू नारीयल धुप दीप कपूरल सजी थार-२
आरती गुढकालीकी-हो मैय्या-आरती गुढ़काली की ।
गाव हरेक पोवार-२ मैय्या करू गुढ़कली तोरी आरती....
ब्रम्हांड की रखवारी तु धारा जुगर ठिकाण-२
राजा भोजला पायव-२तोला बुध्दी अणा ज्ञाब-२
मैय्या करू गुढकाली..

ये धरती को कोना कोना माँ फैल्या जो पोवार
आवी सब तोराच बेटा-२देजो बुध्दी अणा बाब-२
मैय्या करू गुढकाली,
तोरो दरशन का प्यासा बेटा माँ कुरखेत पुकार-२
कर सबकी मनसा पुरी-ओ मैय्या-२
धन्य होये हर पोवार-२ मैय्या करू गुढकाली.
कुलदेवी माय तु आम्हरी-कर देजो माँ उद्वार-२
गेवरी गाऊ मैय्या कमसे वो काली-२
तोरी महिमा से अपार-२ मैय्या करू गढकाली.....
मैय्या करू गुढकाली तोरी आरती हो माँ
जय माँगड़ालीका॥

Sunday, 25 February 2018

महाभारत के युद्ध में अर्जुन और कर्ण के बीच घमासान

महाभारत के युद्ध में अर्जुन और कर्ण के बीच घमासान चल रहा था । अर्जुन का तीर लगने पे कर्ण का रथ 25-30 हाथ पीछे खिसक जाता , और कर्ण के तीर से अर्जुन का रथ सिर्फ 2-3 हाथ ।
लेकिन श्री कृष्ण थे की कर्ण के वार की तारीफ़ किये जाते, अर्जुन की तारीफ़ में कुछ ना कहते ।
अर्जुन बड़ा व्यथित हुआ, पूछा , हे पार्थ आप मेरी शक्तिशाली प्रहारों की बजाय उसके कमजोर प्रहारों की तारीफ़ कर रहे हैं, ऐसा क्या कौशल है उसमे ।
श्री कृष्ण मुस्कुराये और बोले, तुम्हारे रथ की रक्षा के लिए ध्वज पे हनुमान जी, पहियों पे शेषनाग और सारथि रूप में खुद नारायण हैं । उसके बावजूद उसके प्रहार से अगर ये रथ एक हाथ भी खिसकता है तो उसके पराक्रम की तारीफ़ तो बनती है ।
कहते हैं युद्ध समाप्त होने के बाद श्री कृष्ण ने अर्जुन को पहले उतरने को कहा और बाद में स्वयं उतरे। जैसे ही श्री कृष्ण रथ से उतरे , रथ स्वतः ही भस्म हो गया । वो तो कर्ण के प्रहार से कबका भस्म हो चूका था, पर नारायण बिराजे थे इसलिए चलता रहा । ये देख अर्जुन का सारा घमंड चूर चूर हो गया ।
कभी जीवन में सफलता मिले तो घमंड मत करना, कर्म तुम्हारे हैं पर आशीष ऊपर वाले का है । और किसी को परिस्थितिवष कमजोर मत आंकना, हो सकता है उसके बुरे समय में भी वो जो कर रहा हो वो आपकी क्षमता के भी बाहर हो ।

लोगों का आंकलन नहीं, मदद करो

Thursday, 22 February 2018

बाबू मु भी पोरी आए तोरी

पवारी कविता ......................बाबू मु भी पोरी आए तोरी
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बाबू मु भी पोरी आए तोरी काहे भैया ख लाड करय ।
भैया ल स्कूल भेजय मोखअ काहे ऐतो काम करावय।।
मु घर को सराय पोतार करू है ,चुल्हा चौका मु करू अन भैया ल काहे लाड करय।।
बाबू मु भी पोरी आए तोरी काहे भैया ख लाड करय।
मोरो ब्याहो कर दियो सासु घरअ बी मिलन नी आवत।
यहा सासु ससरा बी मन की करय मु सबकी सुनु है।
बाबू मु भी पोरी आए तोरी काहे भैया ख लाड करय।
मनअ असो का करियो ते मोखअ असो तज दियो।
अन भैया भाभी ल ऐतो प्यार करे माय भी दुलार करय।।
बाबू मु भी पोरी आए तोरी काहे भैया ख लाड करय।।

रचित- अशोक बारंगे (BDN)

Thursday, 21 December 2017

पंवार राजवंश इतिहास



परमार एक राजवंश का नाम है, जो मध्ययुग के प्रारंभिक काल में महत्वपूर्ण हुआ। चारण कथाओं में इसका उल्लेख राजपूत जाति के एक गोत्र और अग्निकुल के सदस्य के रूप में मिलता है। परमार सिंधुराज के दरबारी कवि पद्मगुप्त परिमल ने अपनी पुस्तक 'नवसाहसांकचरित' में एक कथा का वर्णन किया है। ऋषि वशिष्ठ ने ऋषि विश्वामित्र के विरुद्ध युद्ध में सहायता प्राप्त करने के लिये भाबू पर्वत के अग्निकुंड से एक वीर पुरुष का निर्माण किया। इस वीर पुरुष का नाम परमार रखा गया, जो इस वंश का संस्थापक हुआ और उसी के नाम पर वंश का नाम पड़ा। परमार के अभिलेखों में बाद को भी इस कहानी का पुनरुल्लेख हुआ है। इससे कुछ लोग यों समझने लगे कि परमारों का मूल निवासस्थान आबू पर्वत पर था, 

परमार परिवार की मुख्य शाखा नवीं शताब्दी के प्रारंभिक काल से मालव में धारा को राजधानी बनाकर राज्य करती थी और इसका प्राचीनतम ज्ञात सदस्य उपेंद्र कृष्णराज था। इस वंश के प्रारंभिक शासक दक्षिण के राष्ट्रकूटों के सामंत थे। राष्ट्रकूटों के पतन के बाद सिंपाक द्वितीय के नेतृत्व में यह परिवार स्वतंत्र हो गया। सिपाक द्वितीय का पुत्र वाक्पति मुंज, जो 10वीं शताब्दी के अंतिम चतुर्थांश में हुआ, अपने परिवार की महानता का संस्थापक था।

 उसने केवल अपनी स्थिति ही सुदृढ़ नहीं की वरन्‌ दक्षिण राजपूताना का भी एक भाग जीत लिया, और वहाँ महत्वपूर्ण पदों पर अपने वंश के राजकुमारों को नियुक्त कर दिया। उसका भतीजा भोज, जिसने सन्‌ 5000 से 1055 तक राज्य किया और जो सर्वतोमुखी प्रतिभा का शासक था, मध्युगीन सर्वश्रेष्ठ शासकों में गिना जाता था। भोज ने अपने समय के चौलुभ्य, चंदेल, कालचूरी और चालुक्य इत्यादि सभी शक्तिशाली राज्यों से युद्ध किया। बहुत बड़ी संख्या में विद्वान्‌ इसके दरबार में दयापूर्ण आश्रय पाकर रहते थे। वह स्वयं भी महान्‌ लेखक था, और इसने विभिन्न विषयों पर अनेक पुस्तकें लिखी थीं, ऐसा माना जाता है। उसने अपने राज्य के विभिन्न भागों में बड़ी संख्या में मंदिर बनवाए।

भोज की मृत्यु के पश्चात्‌ चोलुक्य कर्ण और कर्णाटों ने मालव को जीत लिया, किंतु भोज के एक संबंधी उदयादित्य ने शत्रुओं को बुरी तरह पराजित करके अपना प्रभुत्व पुन: स्थापित करने में सफलता प्राप्त की। उदयादित्य ने मध्यप्रदेश के उदयपुर नामक स्थान में नीलकंठ शिव के विशाल मंदिर का निर्माण कराया था। 

उदयादित्य का पुत्र जगद्देव बहुत प्रतिष्ठित सम्राट् था। वह मृत्यु के बहुत काल बाद तक पश्चिमी भारत के लोगों में अपनी गौरवपूर्ण उपलब्धियों के लिय प्रसिद्ध रहा। मालव में परमार वंश के अंत अलाउद्दीन खिलजी द्वारा 1305 ई. में कर दिया गया।

परमार वंश की एक शाखा आबू पर्वत पर चंद्रावती को राजधानी बनाकर, 10वीं शताब्दी के अंत में 13वीं शताब्दी के अंत तक राज्य करती रही। इस वंश की दूसरी शाखा वगद (वर्तमान बाँसवाड़ा) और डूंगरपुर रियासतों में उट्ठतुक बाँसवाड़ा राज्य में वर्त्तमान अर्थुना की राजधानी पर 10वीं शताब्दी के मध्यकाल से 12वीं शताब्दी के मध्यकाल तक शासन करती रही। वंश की दो शाखाएँ और ज्ञात हैं। एक ने जालोर में, दूसरी ने बिनमाल में 10वीं शताब्दी के अंतिम भाग से 12वीं शताब्दी के अंतिम भाग तक राज्य किया।

  •     उपेन्द्र ( 800 – 818)
  •     वैरीसिंह प्रथम ( 818 – 843)
  •     सियक प्रथम ( 843 – 893)
  •     वाकपति ( 893 – 918)
  •     वैरीसिंह द्वितीय ( 918 – 948)
  •     सियक द्वितीय ( 948 – 974)
  •     वाकपतिराज ( 974 – 995)
  •     सिंधुराज ( 995 – 1010)
  •     भोज प्रथम ( 1010 – 1055), समरांगन सूत्रधार' के रचयिता
  •     जयसिंह प्रथम ( 1055 – 1060)
  •     उदयादित्य ( 1060 – 1087)
  •     लक्ष्मणदेव ( 1087 – 1097)
  •     नरवर्मन ( 1097 – 1134)
  •     यशोवर्मन ( 1134 – 1142)
  •     जयवर्मन प्रथम ( 1142 – 1160)
  •     विंध्यवर्मन ( 1160 – 1193)
  •     सुभातवर्मन ( 1193 – 1210)
  •     अर्जुनवर्मन I ( 1210 – 1218)
  •     देवपाल ( 1218 – 1239)
  •     जयतुगीदेव ( 1239 – 1256)
  •     जयवर्मन द्वितीय ( 1256 – 1269)
  •     जयसिंह द्वितीय ( 1269 – 1274)
  •     अर्जुनवर्मन द्वितीय ( 1274 – 1283)
  •     भोज द्वितीय ( 1283 – ?)
  •     महालकदेव ( ? – 1305)
  •     संजीव सिंह परमार (1305 - 1327)


वर्तमान

    • वर्तमान में परमार वंश की एक शाखा उज्जैन के गांव नंदवासला,खाताखेडी तथा नरसिंहगढ एवं इन्दौर के गांव बेंगन्दा में निवास करते हैं।धारविया परमार तलावली में भी निवास करते हैंकालिका माता के भक्त होने के कारण ये परमार कलौता के नाम से भी जाने जाते हैं।धारविया भोजवंश परमार की एक शाखा धार जिल्हे के सरदारपुर तहसील में रहती है। इनके ईष्टदेव श्री हनुमान जी तथा कुलदेवी माँ कालिका(धार)है|ये अपने यहाँ पैदा होने वाले हर लड़के का मुंडन राजस्थान के पाली जिला के बूसी में स्थित श्री हनुमान जी के मंदिर में करते हैं। इनकी तीन शाखा और है;एक बूसी गाँव में,एक मालपुरिया राजस्थान में तथा एक निमच में निवासरत् है।11वी से 17 वी शताब्दी तक पंवारो का प्रदेशान्तर सतपुड़ा और विदर्भ में हुआ । सतपुड़ा क्षेत्र में उन्हें भोयर पंवार कहा जाता है धारा नगर से 15 वी से 17 वी सदी स्थलांतरित हुए पंवारो की करीब 72 (कुल) शाखाए बैतूल छिंदवाडा वर्धा व् अन्य जिलों में निवास करती हैं। जो कि राजा भोज को अपना पूर्वज मानते हैं । संस्कृत शब्द प्रमार से अपभ्रंषित होकर परमार/पंवार/पोवार/पँवार शब्द प्रचलित हुए ।

भोयरी (पवारी) बोली: एक भाषाई एवं सांस्कृतिक अनुशीलन- शिवानी पवार (बारंगे) -भोयरी / Bhoyari / Pawari

भोयरी (पवारी) बोली: एक भाषाई एवं सांस्कृतिक अनुशीलन लेखिका: शिवानी पवार (बारंगे) निवास स्थान: देवरी, मुलताई संस्था से संबद्धता: माँ ताप...